Social_Media : फिर कोई नई टूल किट बनाने गए हैं राहुल गाँधी ! श्रीलंका के आपातकाल को एक अन्य दृष्टिकोण से देखें



आज के चुनिंदा पोस्ट्स, ट्वीट्स, वीडियो, कमेंट्स, वायरल...20220715  
- अजमेर में, अजमेर की दरगाह में पसरा सन्नाटा
- श्रीलंका के आपातकाल को एक अन्य दृष्टिकोण से देखें
अजमेर के बाद अब देश के अन्य राज्यों में भी हिन्दुओं का विरोध...
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.धर्म नगरी / DN News
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फिर कोई नई टूल किट बनाने गए हैं राहुल गाँधी !
कल राहुल गाँधी फिर विदेश यात्रा पर निकल पड़ें है किसी अज्ञात स्थान के लिए, लेकिन कोई "खोजी पत्रकार" मालूम नहीं कर सकेगा कि कहां गया है-

पिछली 23 मई को लंदन यात्रा खत्म करके 4 जून तक कहां रहा ? किसी को पता नहीं चला, लेकिन 3 जून को कानपूर में हयात जफ़र हाश्मी के किये गए और उसके बाद लगातार 2 "पत्थरवारो" को हुए दंगों ने इशारा दे दिया कोई टूल किट विदेश में बनी थी 

लंदन में राहुल गाँधी ने कहा था- "...देश में केरोसिन फैला हुआ है, बस माचिस की एक तिल्ली
से बहुत कुछ हो सकता है"

वो दंगे तो हुए ही, साथ में ED के सामने पेशी में भी कांग्रेस में फर्जी गाँधी परिवार के गुलाम
सड़कों पर तांडव करते रहे थे. यानि एक साथ दंगे भी किये गए और कांग्रेसी भी पगलाए रहे -

अब सोनिया गाँधी को ED ने 21 जुलाई को बुलाया है और युवराज निकल पड़ा है फिर से
गुप्त स्थान की यात्रा पर-

इस महीने पहले ही सुप्रीम कोर्ट की नूपुर शर्मा पर गैर-जरूरी टिप्पणियों की वजह से माहौल
गरमाया हुआ है, ऐसे में सोनिया के ED के सामने पेश होने पर क्या गुल खिला सकता है राहुल,
उसके लिए सतर्क रहना चाहिए-

मुझे ज्यादा जानकारी तो नहीं है, मगर अनेक ज्योतिषविद मंगल के मेष राशि में 28 जून को आने
से मंगल राहु युति मान कर चल रहे है जबकि राहु उस दिन 27 अंश पर था और मंगल जीरो पर
और इतनी दूरी से युति नहीं होती-

असली युति मंगल राहु की तब होगी जब दोनों के बीच अंतर 5 अंश होगा और ये 27 जुलाई से शुरू होगा जब मंगल 20 अंश और राहु 25 अंश पर होंगे और ये युति 10 अगस्त तक चलेगी

जब मंगल मेष से निकल रहा होगा और राहु 24 अंश पर होगा

ये 2 हफ्ते के कालखंड में दंगा उपद्रव होने की सम्भावना होगी, क्यूंकि मुझे लगता है इस समय
में माँ बेटे की गिरफ़्तारी न हो जाये जो कांग्रेस बर्दाश्त नहीं कर सकती और उसी के लिए तैयारी करने वो गया है -
(सुभाष चन्द्र)
"मैं वंशज श्री राम का" 13/07/2022

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अजमेर दरगाह में पसरा सन्नाटा...      
जियारत करने वाले हिंदुओं की संख्या 90% घटी 
- टाइम्स ऑफ इंडिया और लगभग सभी अखबारों और वेबसाइट में ये खबर छपी है कि अजमेर दरगाह पर जाने वाले हिंदुओं की संख्या में भारी गिरावट हुई है

- आज तक की वेबसाइट पर छपी खबर के मुताबिक अजमेर के होटलों में इक्का-दुक्के कमरे ही भरे हैं। आज तक ने बताया कि उदयपुर हत्याकांड के बाद जायरीनों में दहशत भर गई और लोग अजमेर आने से घबरा रहे हैं। आज तक के ही मुताबिक एक होटल कारोबारी ने बताया कि पहले रमजान के महीने को छोड़कर बाकी दिनों में 90 फीसदी होटल के कमरे बुक रहते थे लेकिन अब हालात बदतर हो चुके हैं। 

- इसी वेबसाइट के मुताबिक अजमेर दरगाह के अंदर मौजूद फूलों की दुकानें वीरान पड़ी हैं यहां तक कि गुलाब की दुकानों पर भी जाले लग रहे हैं गुलाब मुरझा चुके हैं, क्योंकि उन्हें कोई खरीदने वाला ही नहीं है। 

- अजमेर के दरगाह क्षेत्र में व्यापार 70 फीसदी कम हो गया है। एक कारोबारी ने बताया- उदयपुर कांड के बाद और पूरे मामले में अजमेर दरगाह के खादिमों का नाम आने के बाद अजमेर में पूरा व्यापार तबाह हो गया है 

- वहीं न्यूज नेशन ने भी अपने स्रोतों से जो खबर छापी है, उसके अनुसार पिछली बार के मुकाबले इस बार अजमेर दरगाह में सिर्फ 10 फीसदी कमाई हुई है। 
दरगाह के खादिम एनुद्दीन चिश्ती ने बताया- 15-20 हजार लोग यहां रोज आते थे, लेकिन अब यहां सूनसान हो गया है। उदयपुर की घटना के बाद से ही लोगों ने बुकिंग रद्द करने शरू कर दिए थे
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किसने हक दिया तुम हमारे देवी-देवताओं के बारे में उल्टा-पुल्टा बोलो...
सुनें- 
- दरगाह के 3 खादिम अब तक दे चुके हैं भड़काऊ बयान... सलमान चिश्ती ने तो यहां तक कहा था कि जो नूपुर की गर्दन लाकर देगा उसे वो अपना घर ही दे देगा। पुलिस की जांच में कन्हैया लाल का सिर कलम करने वालों से भी दरगाह के रिश्ते सामने आए हैं। 

- दरगाह की सलाना कमाई 200 करोड़ है और 70 प्रतिशत हिंदू ही यहां पर आते हैं। मुसलमान दरगाह में इसलिए नहीं आते, क्योंकि तसव्वुफ यानी सुफियाना विचार को शरीयत मान्यता देता ही नहीं है। ऐसे में अब जब हिंदुओं ने ही दरगाह से मुंह मोड़ लिया है तो ये अजमेर के चिश्तियों के लिए एक बहुत बड़ा झटका है. धन्यवाद !
यह बहिष्कार, सन्नाटा अच्छा लगा, ऐसा ही सन्नाटा बारह महिने बना रहे ऐसी सेक्युलर हिंदुओं से अपेक्षा करते हैं, जय सनातन, जय श्रीराम  
33 कोटि (प्रकार) देवी देवताओं को छोड़कर अजमेर मजार, दरगाह पर माथा फोड़ने वाले बेशर्म हिन्दुओ तक ये खबर जरूर पहुंचाए शायद आंखे खुल जाए... 
पढ़ें- दैनिक जागरण में 9 जुलाई 2022को प्रकाशित रिपोर्ट-
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सुनें- 
अजमेर के बाद अब देश के अन्य राज्यों में भी हिन्दुओं का विरोध...
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इसे भी पढ़ें-
श्रावण माह : कावड़ यात्रा में जा रहे हैं तो रखें इनका ध्यान... कांवड़ आशय व प्रकार
http://www.dharmnagari.com/2022/07/Kawad-Yatra-4-crore-kanwariyas-nikalenge-Kawad-Yatra-ke-niyam.html 

Shri Amarnath Yatra : 43-day-long pilgrimage
http://www.dharmnagari.com/2022/06/43-days-Amarnath-Yatra-from-tomorrow-1st-batch-of-pilgrims-left-the-base-camp-for-Kashmir-Valley.html
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श्रीलंका के आपातकाल को एक अन्य दृष्टिकोण से देखें 
वर्तमान समय में 2.2 करोड़ जनसँख्या वाले श्री लंका पर 5100 करोड़ डॉलर का विदेशी उधार है। पिछले वर्ष जीडीपी थी 8500 करोड़ डॉलर। 9 मार्च तक एक अमेरिकी डॉलर का 202 श्रीलंकन रूपया मिलता था। आज 365 रुपये मिल रहा है।

आखिरकार क्यों नहीं श्रीलंका यह घोषणा कर देता है, कि इस शुक्रवार मध्य रात्रि से डॉलर एक श्रीकन रुपये का बराबर हो गया है। अर्थात सरकार श्रीलंकन रुपये का दाम स्वयं फिक्स कर दे; डॉलर से बराबरी कर दे। नए नोट छापकर न केवल कुछ क़र्ज़ चुका दे, बल्कि "उस" डॉलर बराबर श्री लंकन रुपये से पेट्रोल, अन्न, खाद इत्यादि खरीद कर अपनी अर्थव्यवस्था को रातो-रात ठीक कर दे ?

श्री लंका सरकार ने ऐसा करने का, अर्थात नोट छापकर आर्थिक संकट से निपटने का प्रयास किया भी। परिणाम क्या निकला ? रुपया क्रैश कर गया; रातो-रात मंहगाई बढ़ गयी। कारण यह है कि नोट अधिक है; उत्पादन, उत्पादकता, वस्तु (गुड्स) एवं सेवाएं कम है।

उदहारण के लिए, चावल की मात्रा सीमित है; लेकिन जेब में रुपये अधिक हो गए। अतः हर व्यक्ति उस सीमित मात्रा वाले चावल के लिए नोट फेंक रहा है जिससे चावल के दाम तेजी से बढ़ गए।

करेंसी की विनिमय दर में उस राष्ट्र के आयात-निर्यात, अर्थव्यवस्था का मैनेजमेंट तथा वैश्विक आर्थिक और राजनैतिक परिस्थितियों का बहुत बड़ा हाथ होता है।

किसी भी करेंसी की विनिमय दर एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया का अंग है। ऐसा नहीं होता कि आप रातों-रात यह कह दे कि ₹1 का $1 मिलेगा। क्योंकि इसका परिणाम फिर यह हुआ कि दिल्ली में आप की मेट्रो यात्रा लगभग $10 के बराबर हो गयी जबकि न्यू यॉर्क में उसी मेट्रो के लिए लगभग $3 देना पड़ता है।

पूर्व में जिंबाब्वे और अर्जेंटीना ने रातों-रात अपनी करेंसी का भाव डॉलर के मुकाबले बढ़ा दिया। परिणाम यह हुआ कि उन देशों की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गई। एक समय अमेरिकी डॉलर के बदले जिंबाब्वे में आप 10 लाख से ज्यादा लोकल करंसी ले सकते थे जिसका मूल्य कूड़े के बराबर था। अर्जेंटीना की अर्थव्यवस्था करेंसी की विनिमय दर कृत्रिम तरीके से निर्धारित करने के बाद पिछले 18 वर्षो में कभी भी संभल नहीं पायी। इस कड़ी में वेनेज़ुएला एक अन्य उदहारण है।

1987-91 में भारत की अर्थव्यवस्था का गलत मैनेजमेंट होने के कारण हमारे उद्योग-धंधों के निर्यात का बिजनेस चौपट हो रहा था, क्योंकि उस समय 100 रुपए का भारतीय सामान अमेरिका में $5 का पड़ता था जबकि वही माल चीन से $3 से $4 में मिल जाता था। लेकिन जुलाई 1991 में रुपए की वैल्यू 26 करते ही वही माल अब अमेरिका में $4 के अंदर मिलने लगा था।

दूसरी तरफ हमें तेल डॉलर में खरीदना पड़ता था और रुपए की कीमत गिरने से वही तेल रातोंरात महंगा हो गया जिससे हमारे उद्योगों में खपने वाले कच्चे माल और ट्रांसपोर्ट की लागत बढ़ गई।

हमारे पूंजीपति देश से पैसा निकाल कर विदेशों में जमा करा रहे थे क्योंकि रुपए की कृत्रिम कीमत होने के कारण विदेशों में उन्हें ब्याज दर से ज्यादा लाभ मिल रहा था। इसीलिए उस समय सोना गिरवी रखने की नौबत आ गई थी। अतः मनमोहन सिंह को जुलाई 1991 के पहले सप्ताह में डॉलर के मुकाबले रुपए का दाम ₹21 से गिरा कर ₹26 करना पड़ा था।

यह लिखने से मेरा तात्पर्य है कि रुपए की कीमत अगर आप डॉलर से निर्धारित करेंगे तो हर समय आप चाहेंगे कि किसी भी तरह से रुपए महंगा हो जाए। क्योंकि एक तगड़ा रुपए कहीं ना कहीं हमारी समझ में एक तगड़े राष्ट्र की पहचान है।

आज जापान में 1 डॉलर के बदले 138 येन मिल रहा है; वर्ष 2018 में 110 येन मिलता था। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या वहां की अर्थव्यवस्था भारत से कमजोर है ?

वर्ष 2007 में एक यूरो का 1.60 डॉलर मिलता था। कल एक यूरो का भाव एक डॉलर हो गया।

इसलिये अर्थशास्त्री किसी भी करेंसी की कीमत केवल डॉलर की तुलना में नहीं जांचते हैं और इसके लिए करेंसी की वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (real effective exchange rate) देखी जाती है, जो विश्व की कई करेंसियों की प्रभावी दर से तुलना करके प्राप्त की जाती है। रुपए की वास्तविक प्रभावी विनिमय दर विश्व की 40 मुद्राओं की तुलना में निर्धारित की जाती है।

अमेरिका में ब्याज की दर बढ़ रही है, जिससे निवेशक कई देशों से पैसा निकालकर अब अमेरिकी बैंकों में डाल रहे हैं। इससे सभी देशों की विनिमय दर में गिरावट आई है। लेकिन चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि एक तो भारत के पास 600 बिलियन (अरब) डॉलर से अधिक विदेशी मुद्रा है। दूसरा, मोदी सरकार वी पी सिंह सरकार की तरह खिचड़ी सरकार नहीं है; ना ही पिछली सरकार की तरह भ्रष्ट है। तीसरा अर्थव्यवस्था की डोर जिन व्यक्तियों ने संभाली है उनकी सत्य निष्ठा और व्यक्तिगत आचरण पर संदेह नहीं किया जा सकता है। चौथा, प्रधानमंत्री और उनके करीबी सहयोगियों की सत्ता की डोर किसी इटैलियन के हाथ में नहीं है।

याद दिलाने के लिए, सोनिया सरकार के समय के भ्रष्टाचार और अर्थव्यवस्था के खराब मैनेजमेंट का प्रभाव रुपये पे दिखाई देता था। 2 जनवरी 2013 को रुपये की वैल्यू 54.24 थी; जो 28 अगस्त 2013 को गिरकर 68.80 हो गयी थी। अर्थात, 8 माह में 14 रुपये की गिरावट।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पे भरोसा रखे।

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