7 वर्षीय बच्ची के रेपिस्ट व हत्यारे पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर फूटा जन सामान्य का आक्रोश
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं...
दो दिन पहले भाजपा सांसद डॉ. #निशिकांत_दुबे ने #सुप्रीम_कोर्ट में गंभीर आरोप लगाते हुए कहा: "अगर इस देश में #धार्मिक_हिंसा भड़काने के लिए कोई जिम्मेदार है, तो वह #सुप्रीमकोर्ट और उसके जज हैं!"
1. कश्मीर मुद्दे पर दोहरे मापदंड
सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को हटाने के खिलाफ विपक्षी दलों की याचिकाओं पर तुरंत विचार किया। लेकिन जब 1990 के दशक में कश्मीरी हिंदुओं के खिलाफ़ अत्याचारों के बारे में याचिकाएँ दायर की गईं - जैसे जबरन विस्थापन, घरों पर कब्ज़ा, मंदिरों को तोड़ना, हत्याएँ, बलात्कार और सामूहिक पलायन - तो उन्हें कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि, "यह बहुत पहले हुआ था।"
क्या यह दोहरा मापदंड नहीं है ?
क्या इससे हिंदुओं में गुस्सा नहीं पैदा होता ?
क्या यह धार्मिक संघर्ष का कारण नहीं बनता ?
2. वक्फ बोर्ड के दुरुपयोग पर चुप्पी
सुप्रीम कोर्ट अब वक्फ बोर्ड के सुधारों को लेकर चिंतित है। लेकिन पिछले 30 वर्षों में, वक्फ बोर्ड ने अवैध रूप से संपत्ति जब्त की, करों taxes से परहेज किया और एक समानांतर न्यायिक प्रणाली संचालित की - फिर भी कोर्ट चुप रहा। यदि सुधारों को इस्लाम के लिए खतरा माना जाता है, तो हिंदू भूमि पर मस्जिद और दरगाह बनाना कैसे स्वीकार्य था?
वक्फ बोर्ड ने 2 मिलियन से अधिक हिंदुओं की संपत्ति जब्त की। सुप्रीम कोर्ट चुप रहा। अगर यह धार्मिक पक्षपात नहीं है, तो क्या है ?
3. `मंदिरों का धन कहीं और खर्च किया जाता है, हिंदुओं पर प्रतिबंध:` हिंदू मंदिरों पर सरकार का नियंत्रण है। उनकी आय का उपयोग मदरसों, हज यात्राओं, वक्फ बोर्ड, इफ्तार दावतों और ऋणों के लिए किया जाता है। लेकिन हिंदू धार्मिक गतिविधियों पर प्रतिबंध हैं। हिंदू अधिकारों से संबंधित याचिकाएँ अक्सर खारिज कर दी जाती हैं। अल्पसंख्यकों को हमेशा विशेष प्राथमिकता दी जाती है।
क्या यह उचित है ? या यह हिंदुओं के गुस्से को भड़काने का एक तरीका है ?
4. `हिंदुओं के खिलाफ शिक्षा में भेदभाव:` शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत, हिंदू स्कूलों को अल्पसंख्यकों के लिए 25% सीटें आरक्षित करनी पड़ती है । लेकिन मुस्लिम और ईसाई संस्थानों को इस नियम से छूट दी गई है। हजारों हिंदू स्कूलों को बंद करना पड़ा, और हिंदू बच्चे अब गैर-हिंदू संस्थानों में पढ़ते हैं।
क्या यह धर्म परिवर्तन को बढ़ावा नहीं दे रहा है ?
5. स्वतंत्र भाषण का पाखंड
जब हिंदू बोलते हैं, तो इसे “घृणास्पद भाषण” कहा जाता है। जब दूसरे बोलते हैं, तो इसे "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" कहा जाता है। नुपुर शर्मा ने केवल हदीस से उद्धरण दिया, तब न्यायालय ने इसे घृणास्पद भाषण कहा। लेकिन जब स्टालिन और अन्य नेताओं ने सनातन धर्म को "बीमारी" कहा, तो न्यायालय चुप रहा।
ये न्यायालय का कैसा न्याय है ?
6. हिंदू परंपराओं पर पक्षपातपूर्ण प्रतिबंध
सर्वोच्च न्यायालय ने दशहरा पशु बलि जैसी हिंदू प्रथाओं पर प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन ईद के दौरान सामूहिक हलाल पशु वध के बारे में कोई सवाल नहीं उठाया गया। जन्माष्टमी के दौरान, दही हांडी समारोह में ऊंचाई प्रतिबंध का सामना करना पड़ता है। लेकिन मुहर्रम से संबंधित हिंसा के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाती है। दीपावाली के पटाखों को पर्यावरण के लिए हानिकारक कहा जाता है, लेकिन क्रिसमस की आतिशबाजी की कोई आलोचना नहीं होती।
क्या यह भेदभाव नहीं है ?
7. हिंदू पुनर्स्थापना को रोकता है पूजा स्थल अधिनियम
1991 के पूजा स्थल अधिनियम में यह अनिवार्य किया गया है कि 15 अगस्त, 1947 तक के स्थानों के धार्मिक चरित्र को नहीं बदला जाना चाहिए। यह कानून हिंदुओं को उन प्राचीन मंदिरों को पुनः प्राप्त करने से रोकता है जिन्हें मुस्लिमों शासकों ने नष्ट कर दिया था या परिवर्तित कर दिया था। राम मंदिर के लिए कई दशकों तक लड़ाई लड़नी पड़ी। कई अन्य मंदिरों पर अतिक्रमण जारी है।
क्या यह ऐतिहासिक अन्याय नहीं है ?
8. केवल हिंदू परंपराओं को निशाना बनाना
सबरीमाला मामले में, न्यायालय ने हिंदू भावनाओं को ठेस पहुँचाई। कुछ हिंदू मंदिरों में केवल पुरुषों या केवल महिलाओं के रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है। लेकिन न्यायालय ने केवल हिंदू परंपराओं पर सवाल उठाया। इस्लाम में, महिलाएँ मस्जिदों में प्रवेश नहीं कर सकती हैं या कुछ खास परिस्थितियों में कुरान नहीं पढ़ सकती हैं। ईसाई धर्म में, महिलाएँ पुजारी नहीं बन सकती हैं।
न्यायालय ने उन धर्मों पर सवाल क्यों नहीं उठाया ?
9. सीएए विरोधी प्रदर्शनों के दौरान निष्क्रियता
सुप्रीम कोर्ट ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। प्रदर्शनकारियों ने सार्वजनिक सड़कें जाम कर दीं, लेकिन न्यायालय ने इसे नहीं रोका।
क्या यह कानून का मज़ाक नहीं है ?
----
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं...
सुप्रीम कोर्ट क़ो मनमोहन सिंह की तरह स्पष्ट रुप से कह देना चाहिए की इस देश पर पहला हक़ मुसलमानों का हैं। किश्तों में हिन्दुओं को दबाना और टॉर्चर करना बंद कर देना चाहिए। @janardanspeaks-
केवल 7 साल की थी वो मासूम जब 38 साल के अख्तर अली ने उसके कपड़े फाड़े, उसे दातों से काटा, उसके गुप्तांग में नाखून घुसेड़े, उसके होठों को काट काट के खून पिया... जी हाँ 11 साल पहले पिथौरागढ़ की 7 साल की मासूम के रेपिस्ट को हल्द्वानी कोर्ट ने तो मौत की सजा सुनाई लेकिन सुप्रीम कोठे ने आज उसे रिहा कर दिया जिसके बाद लोगों का गुस्सा फूटा और हज़ारों महिलाएं पुरुष इस फैसले के खिलाफ सड़कों पे उतर आये... आज पिथौरागढ़ की बेटी थी कल को ये तुम्हारे या तुम्हारी बहन बेटी के साथ भी होगा
जागो हिन्दू जागो
-@SonOfBharat7
-"पिथौरागढ़ में नन्ही परी केस: आरोपी की सुप्रीम कोर्ट से रिहाई पर लोगों का सड़कों पर प्रदर्शन, न्याय व रिव्यू पिटीशन की मांग"-
और ये सोशल मीडिया से. ..
-


Post a Comment