AAP की खुल गई "झाडू", पंजाब में 2022 की राह पर भाजपा, AAP में विद्रोह के बाद...

...आक्रामक हुई रणनीति, असंतुष्ट नेताओं पर है पैनी नजर
प्रेस कांफ्रेंस में संदीप पाठक, संजय चड्ढा, अशोक मित्तल
नई दिल्ली ब्यूरो : धर्म नगरी / 
DN News
(कवरेज, फ्री कॉपी मंगवाने या अपने नाम से बटवाने हेतु- 810910 7075 -वा.एप)

राज्यसभा के 10 सांसदों में सात का एकसाथ आम आदमी पार्टी AAP छोड़ देना साधारण घटना नहीं है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में हार के बाद AAP के लिए राज्यसभा सांसदों का भाजपा में शामिल होना सबसे बड़ा झटका है। राघव चड्ढा के विद्रोह से AAP में उत्पन्न राजनीतिक संकट के साथ अरविंद केजरीवाल (पार्टी संयोजक) की नेतृत्व क्षमता पर प्रश्न उठ रहे हैं। एक और प्रश्न उठ रहा है- क्या पंजाब में AAP के विधायक (बागी होंगे) भी टूटेंगे ? 

वैसे सात राज्यसभा सांसदों (हरभजन सिंह, स्वाति मालीवाल, राघव चड्ढा,
अशोक मित्तल, संदीप पाठक, विक्रम साहनी, राजिंदर गुप्ता) द्वारा AAP छोड़ने से कांग्रेस को बड़ी राहत मिली होगी, क्योंकि दिल्ली के बाद पंजाब में AAP ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया था। दिल्ली में AAP सत्ता से बाहर हो गई है, वहीं पंजाब में कांग्रेस को आशा है, कि AAP में जितनी टूट होगी, उतना उसके पंजाब की सत्ता में वापस लौटने के संभावना बढ़ेगी। यही कारण है, कि कांग्रेस नेताओं के लगातार बयान आ रहे है।

सांसद राघव चड्ढा ने (24 अप्रैल) कहा- "राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के 10 सांसद हैं, जिनमें से दो तिहाई से अधिक इस मामले में हमारे साथ हैं। उन्होंने हस्ताक्षर किए हैं और आज सुबह हमने हस्ताक्षरित पत्र और दस्तावेज राज्यसभा अध्यक्ष को सौंप दिए हैं... उनमें से तीन आपके सामने उपस्थित हैं। हमारे अलावा हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, विक्रम साहनी और स्वाति मालीवाल भी हैं।"
सुनें-


संदीप पाठक AAP के "चाणक्य"
AAP में संदीप पाठक भाजपा के खिलाफ सबसे मुखर आवाजों में एक रहे हैं। आंकड़ों, सर्वेक्षणों और क्रियान्वयन के माहिर खिलाड़ी संदीप पाठक कभी केजरीवाल के "चाणक्य" या कहें तो AAP के अपने "अमित शाह" थे।पर्दे के पीछे रहकर काम करने वाले संदीप पाठक ने 2022 से एक सख्त संगठनात्मक व्यक्ति के रूप में अपनी पहचान बनाई थी। संदीप पाठक केवल राजनीतिक रणनीति ही जानते थे। जब चुनावी योजनाओं को धरातल पर उतारने की बात आती, तो वो बहुत कठोर हो जाते। 
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सात राज्यसभा सांसदों के भाजपा में जाने को पार्टी की बड़ी राजनीतिक सफलता माना जा रहा है। अब तक केजरीवाल ही लोगों को AAP से बाहर का रास्ता दिखा देते थे, लेकिन इसके विपरीत 7 सांसदों AAP को छोड़ दिया। AAP की शुरुआत 2012 में शांति भूषण, प्रशांत भूषण जैसी बड़ी हस्तियों के साथ हुई, लेकिन जैसे-जैसे पार्टी आगे बढ़ती रही, पार्टी के भीतर के मतभेद और रणनीतिक निर्णय कुछ नेताओं को असहज करने लगे। AAP के राष्ट्रीय पार्टी तक की यात्रा में कई बड़े चेहरों की विदाई हुई। इसकी शुरुआत संस्थापक सदस्य प्रशांत भूषण हुई। फिर कुमार विश्वास, आशुतोष, आशीष खेतान, शाजिया इल्मी आदि को पार्टी से हटा दिए गये या लोगों  ने विवश होकर अपना अलग अलग रास्ता चुन लिया। 

पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण प्रश्न ये, कि अरविंद केजरीवाल अपने पुराने एवं विश्वस्त साथी राघव चड्ढा के तेवर एवं तौर-तरीकों से अच्छी तरह परिचित रहे होंगे। फिर अचानक केजरीवाल ने चड्ढा को राज्यसभा में उपनेता पद से क्यों हटाया ? 

पद से हटाए जाने के बाद राघव चड्ढा का बयान- "घायल हूं इसलिए घातक हूं। मेरी चुप्पी को मेरी खामोशी मत समझ लेना" के मायने अब शायद केजरीवाल सहित पार्टी के सभी नेताओं को समझ आ गया होगा ! पहले से राजनीतिक संकटों से गुजर चुके अरविंद केजरीवाल को, पूरी पार्टी को इस विद्रोह ने पूरी तरह हिला दिया है। तो क्या वह इससे राष्ट्रीय राजनीति में बैकफुट पर आ सकते हैं ?

AAP में अब तक की सबसे बड़ी टूट के बीच अरविंद केजरीवाल का 13 मई 2024 का पुराना बयान वायरल हो रहा है, जब वे जेल से बाहर आने के बाद AAP कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा था- "दूसरी पार्टी वाले तो यूं टूट जाते हैं। हमारे वाले पूरी कोशिश के बावजूद न पैसे से बिकते और न ED के डर से छूटते, हमारे वालों को कोई तोड़ ही नहीं सकता"

भाजपा आगामी चुनाव से पहले संगठन विस्तार और राजनीतिक बढ़त पाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। वहीं, AAP के कई बड़े नेताओं के अलग होने से संगठन कमजोर दिख रहा है, जिसका प्रभाव पंजाब तक पहुंचने की संभावना व्यक्त किया जा रहा है। 

उल्लेखनीय है, पंजाब में AAP की जीत के शिल्पकार राघव और संदीप पाठक रहे हैं। अब राघव ने उन्हें इतना बड़ा राजनीतिक झटका देकर साबित कर दिया, कि वह भी राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं। वैसे संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने अरविन्द केजरीवाल को "सबसे बड़ा सरप्राइज" दिया है, क्योंकि संदीप AAP विचारधारा और संगठन के पुराने व्यक्ति थे, तो अशोक मित्तल को राघव चड्ढा की जगह केजरीवाल ने राज्यसभा में डिप्टी लीडर बनाया।  

कुछ दिनों पहले जब पंजाब सरकार ने उनकी सुरक्षा वापस ले ली थी, पर दिल्ली सरकार ने उन्हें अपनी ओर से सुरक्षा दे दी। इस बगावत में स्वाति मालीवाल की भूमिका भी अहम मानी जा रही। उनकी केजरीवाल से पहले से ठन गई थी। माना जा रहा है कि उन्होंने भी इस बगावत को अंजाम तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।  

2022 की राह पर भाजपा
भाजपा पंजाब में विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर सक्रिय हो गई है। AAP में हुए विद्रोह के बाद भाजपा और आक्रामक दिख रही है और AAP के असंतुष्ट नेताओं को लेकर विपक्ष की पार्टियों में बेचैनी बढ़ गई है। 2022 से पहले भाजपा शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन में रही और तीन बार सरकार का हिस्सा बनी। पिछली बार पार्टी ने अकेले चुनाव लड़कर अपनी रणनीति बदली और कांग्रेस व शिअद में सेंधमारी कर कई बड़े नेताओं को अपने साथ जोड़ा। अब भाजपा इसी रणनीति को फिर दोहराती हुई दिख रही है, क्योंकि लगभग नौ महीने बाद फरवरी 2027 में पंजाब में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं।

सात राज्यसभा सांसदों द्वारा AAP छोड़ने के बाद AAP और भाजपा में जुबानी जंग और बयान जारी है। AAP के वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने कहा,कि वो राज्यसभा के तीन सदस्यों- राघव चड्ढा, अशोक मित्तल और संदीप पाठक के भाजपा  में शामिल होने के बाद औपचारिक रूप से अयोग्य घोषित करने की प्रक्रिया शुरू करेंगे। सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर करते हुए कहा, कि पार्टी राज्यसभा के पीठासीन अधिकारी से संविधान की 10वीं अनुसूची लागू करने के लिए संपर्क करेगी , जिसमें दलबदल के आधार पर अयोग्यता के प्रावधानों का विवरण दिया गया है। 

क्या है भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची ?
भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची, जिसे दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) कहा जाता है, 1985 में 52वें संशोधन द्वारा लागू किया गया। इसका उद्देश्य राजनीतिक दल-बदल पर अंकुश लगाने और सरकार की स्थिरता बनाए रखना है। इस कानून के अंतर्गत यदि कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी छोड़ता है या पार्टी के निर्देश (व्हिप) के विरुद्ध मतदान करता है, तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है।

अयोग्यता के आधार
स्वैच्छिक त्याग
यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है।

व्हिप का उल्लंघन
यदि कोई सदस्य सदन में अपनी पार्टी द्वारा जारी निर्देशों के विपरीत मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है।

स्वतंत्र सदस्य
यदि कोई निर्दलीय सदस्य चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।

मनोनीत सदस्य
यदि कोई मनोनीत सदस्य अपना पद ग्रहण करने के छह महीने बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।

अपवाद (विलय)
यदि किसी विधायक का उसकी मूल राजनीतिक पार्टी का किसी अन्य पार्टी में विलय हो जाता है, तो वह अयोग्य नहीं होता है, बशर्ते कि पार्टी के कम से कम दो-तिहाई विधायक विलय के लिए सहमत हों।

निर्णय लेने का अधिकार
सदन के पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष/चेयरमैन) अयोग्यता याचिकाओं पर अंतिम निर्णय लेते हैं।

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