#Collegium : कॉलेजियम प्रणाली योग्य जजों के साथ अन्याय जनहित के खिलाफ, वजह बताए बिना जज नियुक्त करने से आते हैं अयोग्य लोग : जस्टिस भुइयां
किसी जज को क्यों चुना, नहीं बताना बाकी के लिए अन्याय
क्या यह पारदर्शिता के सिद्धांत से पीछे हटना है या नहीं ?
क्या यह पारदर्शिता के सिद्धांत से पीछे हटना है या नहीं ?
‘कारण न बताकर अच्छे जजों के साथ हो रहा अन्याय’
क्या यह पारदर्शिता के सिद्धांत से पीछे हटना है या नहीं?
‘नागरिकों को जानने का अधिकार’
क्या यह पारदर्शिता के सिद्धांत से पीछे हटना है या नहीं?
‘नागरिकों को जानने का अधिकार’
नियुक्तियों की सिफारिशों (recommendation) के पीछे कारण सार्वजनिक नहीं करना न केवल योग्य न्यायाधीशों के साथ अन्याय है, बल्कि यह जनहित के भी खिलाफ है। कॉलेजियम के प्रस्तावों में कारण नहीं दिए जाने से ऐसे लोगों के न्यायपालिका में आने की गुंजाइश बन जाती है, जो बाद में संविधान-विरोधी टिप्पणियां करते हैं।
पहले कॉलेजियम के प्रस्तावों में भले ही संक्षिप्त या औपचारिक कारण दिए जाते थे, लेकिन कम से कम यह स्पष्ट होता था कि किसी व्यक्ति की सिफारिश क्यों की गई है। कॉलेजियम उन अनेक न्यायाधीशों के साथ अन्याय करती है, जिन्होंने असाधारण और उल्लेखनीय कार्य किया है। दूसरी ओर, कारण छिपाकर हम ऐसे लोगों के न्यायपालिका में प्रवेश की गुंजाइश भी बना देते हैं, जो बाद में लोगों के किसी समुदाय की तुलना 'चींटियों' से करते हैं और जो संविधान तथा उसके मूल्यों के पूरी तरह विपरीत और असंवैधानिक टिप्पणियां करते हैं।
नई दिल्ली ब्यूरो (धर्म नगरी / DN News)
(न्यूज / कवरेज कराने, फ्री कॉपी मंगवाने या धर्म नगरी से जुड़ने हेतु- W.app- 810 910 7075)
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पहले सब कुछ स्पष्ट होता था
जस्टिस भुइयां ने कहा, मैंने देखा है कि पिछले तीन कॉलेजियम प्रस्तावों में सिफारिशों के पीछे के कारण नहीं बताए गए। नियुक्तियों व पदोन्नति के कारण उजागर न करने से अयोग्य उम्मीदवारों को न्यायपालिका में प्रवेश करने का मौका मिलता है। कॉलेजियम की पिछली कुछ सिफारिशें एक ही ढर्रे पर नजर आती हैं।
उन्होंने पूछा, क्या कारण न बताना पारदर्शिता के सिद्धांत से पीछे हटने जैसा नहीं है ? उन्होंने कहा, कॉलेजियम प्रस्तावों में कारण न बताने की मौजूदा प्रवृत्ति पारदर्शिता के सिद्धांत से पीछे हटने जैसा है। पहले कॉलेजियम के प्रस्तावों में भले ही संक्षिप्त या औपचारिक कारण दिए जाते थे, लेकिन कम से कम यह स्पष्ट होता था, कि किसी व्यक्ति की सिफारिश क्यों की गई है। न्यायपालिका में जनता का विश्वास बनाए रखने और असांविधानिक सोच वाले लोगों को सिस्टम में आने से रोकने के लिए जरूरी है, कि सिफारिशों पर खुली चर्चा हो।
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न्यायाधीशों के साथ अन्याय !
जस्टिस उज्जवल उज्जल भुइयां ने कहा, कारण नहीं बताकर कॉलेजियम वास्तव में उन अनेक न्यायाधीशों के साथ अन्याय करती है, जो वास्तव में उत्कृष्ट हैं, जिन्होंने असाधारण और उल्लेखनीय कार्य किया है।
जस्टिस उज्जवल उज्जल भुइयां ने कहा, कारण नहीं बताकर कॉलेजियम वास्तव में उन अनेक न्यायाधीशों के साथ अन्याय करती है, जो वास्तव में उत्कृष्ट हैं, जिन्होंने असाधारण और उल्लेखनीय कार्य किया है।
दूसरी ओर, कारण छिपाकर हम ऐसे लोगों के न्यायपालिका में प्रवेश की गुंजाइश भी बना देते हैं, जो बाद में लोगों के किसी समुदाय की तुलना 'चींटियों' से करते हैं और जो संविधान तथा उसके मूल्यों के पूरी तरह विपरीत और असंवैधानिक टिप्पणियां करते हैं।
पर्याप्त चर्चा और स्पष्ट कारण आवश्यक
जस्टिस भुइयां ने अपने विचार व्यक्त करते हुए वर्ष 2024 में विश्व हिंदू परिषद (VHP) के एक कार्यक्रम में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश द्वारा दिए विवादास्पद भाषण का उल्लेख किया। उस भाषण में मुस्लिम समुदाय को लेकर की गई टिप्पणियों पर आपत्ति जताते हुए उन्होंने कहा- न्यायिक नियुक्तियों में पर्याप्त चर्चा और स्पष्ट कारण होना आवश्यक है। उन्होंने सवाल किया-
कार्यप्रणाली में पारदर्शिता दिखाएं
किसी नाम को अस्वीकार या लंबित रखने के कारण भी शायद ही कभी पूरी तरह सार्वजनिक किए जाते हैं। इसके अलावा चयन के मानदंड भी किसी सार्वजनिक दस्तावेज में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं हैं। उन्होंने कहा कि नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि अदालतों में क्या हो रहा है, उनके न्यायाधीश कौन हैं और उन्होंने किस प्रकार के निर्णय दिए हैं। न्यायपालिका में जनता का विश्वास तभी मजबूत होगा जब वह अपनी कार्यप्रणाली में अधिक पारदर्शिता दिखाए।
विशेष व्यक्ति को ही क्यों चुना गया ?
जस्टिस भुइयां ने वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ किरपाल की दिल्ली हाई कोर्ट में न्यायाधीश नियुक्ति के लिए कॉलेजियम की अनुशंसा (सिफारिश) का उल्लेख करते हुए कहा- उस मामले में कॉलेजियम ने विस्तृत और संतोषजनक कारण दिए थे, लेकिन दोबारा सिफारिश किए जाने के बावजूद केंद्र सरकार ने नियुक्ति को मंजूरी नहीं दी। पैनल चर्चा में शामिल वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ किरपाल ने भी कहा, कि कॉलेजियम को नियुक्तियों के पीछे ऑब्जेक्टिव और वास्तविक कारण बताने चाहिए। इससे बार और आम जनता समझ सकेगी, कि किसी विशेष व्यक्ति को ही क्यों चुना गया। उनके अनुसार इससे कॉलेजियम की कार्यप्रणाली पर भी एक संस्थागत निगरानी बनी रहेगी और मनमाने फैसलों पर अंकुश लगेगा।
किसी नाम को अस्वीकार या लंबित रखने के कारण भी शायद ही कभी पूरी तरह सार्वजनिक किए जाते हैं। इसके अलावा चयन के मानदंड भी किसी सार्वजनिक दस्तावेज में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं हैं। उन्होंने कहा कि नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि अदालतों में क्या हो रहा है, उनके न्यायाधीश कौन हैं और उन्होंने किस प्रकार के निर्णय दिए हैं। न्यायपालिका में जनता का विश्वास तभी मजबूत होगा जब वह अपनी कार्यप्रणाली में अधिक पारदर्शिता दिखाए।
विशेष व्यक्ति को ही क्यों चुना गया ?
जस्टिस भुइयां ने वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ किरपाल की दिल्ली हाई कोर्ट में न्यायाधीश नियुक्ति के लिए कॉलेजियम की अनुशंसा (सिफारिश) का उल्लेख करते हुए कहा- उस मामले में कॉलेजियम ने विस्तृत और संतोषजनक कारण दिए थे, लेकिन दोबारा सिफारिश किए जाने के बावजूद केंद्र सरकार ने नियुक्ति को मंजूरी नहीं दी। पैनल चर्चा में शामिल वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ किरपाल ने भी कहा, कि कॉलेजियम को नियुक्तियों के पीछे ऑब्जेक्टिव और वास्तविक कारण बताने चाहिए। इससे बार और आम जनता समझ सकेगी, कि किसी विशेष व्यक्ति को ही क्यों चुना गया। उनके अनुसार इससे कॉलेजियम की कार्यप्रणाली पर भी एक संस्थागत निगरानी बनी रहेगी और मनमाने फैसलों पर अंकुश लगेगा।
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कॉलेजियम प्रणाली भारत के सर्वोच्च न्यायालय (SC) और उच्च न्यायालयों (HC) में न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं स्थानांतरण के तंत्र को संदर्भित करती है। संविधान में इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के माध्यम से इसका विकास हुआ है।
सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालय कॉलेजियम
सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और SC के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश सम्मिलित होते हैं। जबकि,
उच्च न्यायालय कॉलेजियम का नेतृत्व HC के मुख्य न्यायाधीश और उसके दो वरिष्ठतम न्यायाधीश करते हैं।
न्यायिक नियुक्तियों के लिये संवैधानिक प्रावधान
अनुच्छेद 124- SC के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा, आवश्यकतानुसार मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों के परामर्श से की जाती है।
अनुच्छेद 217- HC के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश, राज्य के राज्यपाल और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से की जाती है।
सरकार की भूमिका- सरकार आपत्ति उठा सकती है या स्पष्टीकरण मांग सकती है। यद्यपि, यदि कॉलेजियम अपनी अनुशंसाओं को दोहराती है, तो सरकार उनका अनुपालन करने के लिये बाध्य है।
न्यायिक नियुक्तियों के लिये प्रक्रिया
99वाँ संविधान संशोधन अधिनियम- 2014 के माध्यम से राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) प्रस्तावित किया गया। इसमें मुख्य न्यायाधीश (अध्यक्ष), सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठ न्यायाधीश, विधि एवं न्याय मंत्री और दो प्रतिष्ठित या विशिष्ट व्यक्ति (इनमें एक सदस्य कोई महिला या SC / ST / OBC या अल्पसंख्यक समुदाय का हो) सम्मलित थे। प्रतिष्ठित व्यक्तियों की नियुक्ति तीन वर्ष के लिए की जाती, जो पुनः नामांकन के लिए पात्र नहीं होते।
NJAC को पुनर्जीवित करने की मांग को लेकर 2015 में दायर याचिका में कहा गया, कि न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया पारदर्शी और खुली होनी चाहिए, जिसमें रिक्तियों की अधिसूचना और बेंच में सम्मिलित होने के लिए सभी पात्र और इच्छुक उम्मीदवारों से आवेदन आमंत्रित करना शामिल हो तथा जनता को इन उम्मीदवारों के विरुद्ध आपत्ति जताने की अनुमति दी जानी चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय ने (2015 में) न्यायिक चयनों में राजनीतिक कार्यकारी की भागीदारी से संविधान के बुनियादी संरचना सिद्धांतों और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के खंडन का तर्क (न्यायिक स्वतंत्रता और संविधान के आधारभूत संरचना के उल्लंघन का हवाला देते) देते हुये NJAC को असंवैधानिक घोषित कर दिया।
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