होलाष्टक 22 मार्च से, होलिका दहन 28 को : मान्यता व कथा


क्यों वर्जित होते हैं होलाष्टक में शुभ कार्य ? 


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होलाष्टक इस वर्ष सोमवार (22 मार्च) से लगेगा एवं रविवार (28 मार्च) को होलिका दहन के दिन तक इसका प्रभाव रहेगा। रंगों की होली फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। इस बार 29 मार्च को रंग खेला जाएगा।

होलाष्टक की मान्यता-
होलाष्टक को लेकर मान्यता है, कि इस अवधि में अवधि में मुंडन संस्कार, शादी-विवाह, गृह प्रवेश, भवन निर्माण व नया व्यापार जैसे कोई भी शुभ कार्य नहीं करने चाहिए। कथा है, कामदेव ने भगवान शिव की तपस्या इसी दौरान भंग कर दी थी जिससे क्रोधित होकर फाल्गुन की अष्टमी तिथि को ही भगवान शिव ने प्रेम के देवता को भस्म कर दिया था। इसके बाद से पूरी सृष्टि नीरस हो गयी थी। कामदेव की पत्नी रति ने शिव जी की अराधना करके दोबारा अपने पति कामदेव को पुनर्जीवित करवाया। इसी मान्यता के चलते होलाष्टक में कोई शुभ कार्य नहीं किए जाते।

होलिका दहन मुहूर्त-
28 मार्च को होली दहन का मुर्हूत शाम 6:21 बजे से रात्रि 8:41 बजे तक है। होलिका की परिक्रमा करके होलका दहन किया जाता है। आचार्य आनंद दुबे ने बताया कि शुभ मुहूर्त में गुलाब व बेला की खुशबू युक्त गुलाल अर्पित करना उत्तम होगा।

होलिका दहन (फाइल फोटो) Twitter- @DharmNagari 
होलिका दहन रविवार (28 मार्च) को है। होलिका दहन के दिन लोग अपनी बुराइयों को दूर करने तथा सद्गुणों को ग्रहण करने का प्रण लेते हैं और अगले दिन रंगवाली होली खेलते हैं। मित्रों, संबंधियों और ​परिजनों को होली की शुभकामनाएं भी देते हैं। होलिका दहन से जुड़ी हुई 3 पौराणिक कथाएं है। इनके अतिरिक्त लोकप्रिय कथा भक्त प्रह्लाद की है, जिसे हिरण्यकश्यप की बहन होलिका आग में लेकर बैठ जाती है, लेकिन श्रीहरि की कृपा से प्रह्लाद बच जाते हैं और होलिका मर जाती है। जागरण अध्यात्म में आज हम आपको हो​लिका दहन से जुड़ी उन 3 कथाओं के बारे में बता रहे हैं।
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शिव तथा कामदेव की कथा-
पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती को भगवान शिव के साथ परिणय सूत्र में बंधना था, लेकिन वे ध्यान और तप में बेहद लीन थे। इस बात से चिंतित माता पार्वती ने कामदेव से मदद ली। वे प्रेम के देवता माने जाते हैं। माता की मदद करने के लिए कामदेव ने भगवान शिव पर पुष्प बाण से प्रहार कर दिया। पुष्प बाण के प्रहार से लोग प्रेम के वशीभूत हो जाते हैं, लेकिन भगवान शिव के साथ ऐसा नहीं हुआ।

तप भंग होने से भगवान भोलेनाथ इतने क्रोधित हो गए कि उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोला और काम देव को अपने क्रोधाग्नि से जलाकर भस्म कर दिया। कामदेव की ऐसी हालत देखकर उनकी पत्नी रति भगवान शिव से क्षमा मांगने लगीं और उनको मूल स्वरूप में लौटाने की प्रार्थना करने लगीं। तब तक भगवान शिव शांत हो चुके थे। उन्होंने कामदेव को फिर जीवित कर दिया। जिस​ दिन वे भस्म हुए उस दिन होलिका दहन होने लगा। अगले दिन उनको प्राणदान मिला था, इसलिए होलिका दहन के अगले दिन रंगों का त्योहार होली मनाई जाने लगी।

पूतना वध कथा-
कंस को पता था कि वह अपने भांजे श्रीकृष्ण के हाथों मारा जा सकता है। इस वजह से उसने कई बार भगवान ​श्रीकृष्ण को मारने का प्रयास किया। इसी क्रम में उसने एक बार पूतना नाम की एक राक्षसी को श्रीकृष्ण को मारने के लिए गोकुल भेजा। तय योजना के अनुसार, पूतना बाल श्रीकृष्ण को लेकर चली गई और स्तनपान कराने लगी। उसी दौरान भगवान श्रीकृष्ण ने उसका वध कर दिया। उस दिन फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि थी, इसलिए हर वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन होने लगा।

ढुण्ढा राक्षसी वध-

भविष्य पुराण के अनुसार, एक ढुण्ढा राक्षसी ने अपने कठोर तप से भगवान शिव को प्रसन्न दिया और उनसे वरदान प्राप्त कर लिया। वरदान के प्रभाव का उसने गलत प्रयोग करना शुरु कर दिया। वह बालकों को डराने लगी। उसका अत्याचार बढ़ गया। तब महामुनि वशिष्ठ जी ने महाराज रघु को ढुण्ढा राक्षसी के वध का उपाय बताया।

उसके अनुसार, राजा ने उप्पलें, सूखी लकड़ी आदि एकत्रित कराए और हवन करके उसमें आग लगा दी। उसके बाद किल-किल उच्चारण करते हुए ताली बजाई। फिर उस अग्नि की तीन बार परिक्रमा की। वहां एकत्र लोगों ने दान दिया और हास्य-परिहास किया। ऐसा करने से ही ढुण्ढा राक्षसी का अंत हो गया। इसके बाद से ही होलिका दहन प्रचलित हो गया।
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