तुलसीदास जयंती : महान संत गोस्वामी तुलसीदास विश्व के श्रेष्ठम कवियों में एक....
जन-जन के कवि गोस्वामी तुलसीदास
तुलसी जयंती : श्रावण शुक्ल सप्तमी
- कितनी रचना है तुलसीदास जी की, उनमें क्या है ?
- आज भी प्रासंगिक है तुलसीदासजी के दोहे-
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-रा.पाठक अवैतनिक संपादक 9752404020
गोस्वामी तुलसीदास, महान संत एवं विश्व के श्रेष्ठम कवियों में एक, जिन्होंने कई अमर काव्यों में एक- श्रीरामचरित मानस की रचना की। यह तुलसीदासजी की पांच बड़े रचनाओं में एक है। सर्वाधिक ख्याति श्रीरामचरित मानस को मिली। इस महान ग्रंथ की रचना गोस्वामी तुलसीदास जी ने अवधी भाषा में की। यह भाषा जन-साधारण की भाषा है। इसीलिए उन्हें जन-जन का कवि कहा जाता है। उनके द्वारा रचित रचनाओं और दोहों में जीवन का रहस्य छिपा है। उन्होंने श्री रामचरितमानस के साथ 12 महान ग्रंथों की रचना की। इनमें मुख्य रूप से हनुमान चालीसा, कवितावली, गीतावली, विनय पत्रिका, जानकी मंगल और बरवै रामायण हैं।
मान्यता है कि श्री रामचरितमानस का पाठ करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बना रहता है और परिवार में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म उत्तर प्रदेश के राजापुर गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी था। इनका विवाह रत्नावली से हुआ। पत्नी के उपदेश से उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ। गोस्वामी तुलसीदास के गुरु बाबा नरहरिदास थे, जिन्होंने इन्हें दीक्षा दी।
गोस्वामी तुलसीदासजी ने हनुमान जी एवं श्रीराम-लक्ष्मण के साथ भगवान शिव-पार्वती के साक्षात दर्शन प्राप्त किए थे। कहा जाता है कि जन्म लेने के बाद तुलसीदास रोए नहीं बल्कि उनके मुख से राम शब्द निकला। बाल्यवास्था में इनका नाम रामबोला था। गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस की रचना दो वर्ष, सात महीने व 26 दिन में पूरी की। यह ग्रंथ लेकर तुलसीदासजी काशी गए। रात में उन्होंने यह ग्रंथ भगवान विश्वनाथ के मंदिर में रख दिया। सुबह जब मंदिर के कपाट खुले तो उस पर लिखा था, सत्यम शिवम सुंदरम्।
गोस्वामी तुलसीदासजी ने अपने 126 वर्ष के दीर्घ जीवन-काल में कुल 22 कृतियों की रचना की है जिनमें से पाँच बड़ी एवं छह मध्यम श्रेणी में आती हैं। इन्हें संस्कृत विद्वान् होने के साथ ही हिन्दी भाषा के प्रसिद्ध और सर्वश्रेष्ठ कवियों में एक माना जाता है। तुलसीदास जी को महर्षि वाल्मीकि का भी अवतार माना जाता है जो मूल आदिकाव्य रामायण के रचयिता थे।
श्रीरामचरित मानस- “रामचरित” (राम का चरित्र) तथा “मानस” (सरोवर) शब्दों के मेल से “रामचरितमानस” शब्द बना है। अतः रामचरितमानस का अर्थ है “राम के चरित्र का सरोवर”। सर्वसाधारण में यह “तुलसीकृत रामायण” के नाम से जाना जाता है तथा यह हिन्दू धर्म की महान् काव्य रचना है।
दोहावली- दोहावली में 573 दोहा और सोरठा है। इन दोहों में से अनेक दोहे तुलसीदास के अन्य ग्रंथों में भी मिलते हैं और उनसे लिये गये है।
कवितावली- सोलहवीं शताब्दी में रची "कवितावली" में श्रीरामचन्द्र जी के इतिहास का वर्णन कवित्त, चौपाई, सवैया आदि छंदों में की गई है। श्री रामचरितमानस के जैसे ही कवितावली में सात काण्ड हैं।
गीतावली- गीतावली, जो कि सात काण्डों वाली एक और रचना है, में रामचन्द्र जी की कृपालुता का वर्णन है। सम्पूर्ण पदावली राम-कथा तथा रामचरित से सम्बन्धित है। मुद्रित संग्रह में 328 पद हैं।
विनय पत्रिका- विनय पत्रिका में 279 स्तुति गान हैं, जिनमें से प्रथम 43 स्तुतियाँ विविध देवताओं की हैं और शेष रामचन्द्र जी की।
कृष्ण गीतावली- कृष्ण गीतावली में श्रीकृष्ण जी 61 स्तुतियाँ है। कृष्ण की बाल्यावस्था और 'गोपी - उद्धव संवाद' के प्रसंग कवित्व व शैली की दृष्टि से अत्यधिक सुंदर हैं।
रामलला नहछू- यह रचना सोहर छ्न्दों में है और राम के विवाह के अवसर के नहछू का वर्णन करती है। नहछू नख काटने एक रीति है, जो अवधी क्षेत्रों में विवाह और यज्ञोपवीत के पूर्व की जाती है।
वैराग्य संदीपनी- यह चौपाई - दोहों में रची हुई है। दोहे और सोरठे 48 तथा चौपाई की चतुष्पदियाँ 14 हैं। इसका विषय नाम के अनुसार वैराग्योपदेश है।
रामाज्ञा प्रश्न- रचना अवधी में है और तुलसीदास की प्रारम्भिक कृतियों में है। यह एक ऐसी रचना है, जो शुभाशुभ फल विचार के लिए रची गयी है, किंतु यह फल-विचार तुलसीदास ने राम-कथा की सहायता से प्रस्तुत किया है।
जानकी मंगल- इसमें गोस्वामी तुलसीदास जी ने आद्याशक्ति भगवती श्री जानकी जी तथा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के मंगलमय विवाहोत्सव का बहुत ही मधुर शब्दों में वर्णन किया है।
सतसई- दोहों का एक संग्रह ग्रंथ है। इन दोहों में से अनेक दोहे 'दोहावली' की विभिन्न प्रतियों में तुलसीदास के अन्य ग्रंथों में भी मिलते हैं और उनसे लिये गये है।
पार्वती मंगल- इसका विषय शिव-पार्वती विवाह है। 'जानकी मंगल' की भाँति यह भी सोहर और हरिगीतिका छन्दों में रची गयी है। इसमें सोहर की 148 द्विपदियाँ तथा 16 हरिगीतिकाएँ हैं। इसकी भाषा भी 'जानकी मंगल की भाँति अवधी है।
बरवै रामायण- बरवै रामायण रचना के मुद्रित पाठ में स्फुट 69 बरवै हैं, जो 'कवितावली' की ही भांति सात काण्डों में विभाजित है।
हनुमान चालीसा- इसमें प्रभु राम के महान् भक्त हनुमान के गुणों एवं कार्यों का चालीस (40) चौपाइयों में वर्णन है। यह अत्यन्त लघु रचना है जिसमें पवनपुत्र हनुमानजी की सुन्दर स्तुति की गई है।
आज भी प्रासंगिक है तुलसीदासजी के दोहे-
लगभग पाँच सदी हो पहले गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचे दोहे आज भी प्रासंगिक हैं। साधु-संतों कथा व्यास, धर्माचार्यों के अतिरिक्त हमारे बड़े-बुजुर्ग या वरिष्ठजन प्रायः वार्तालाप में, चर्चा में, किसी भी तरह के प्रसंग (बहस आदि) में तुलसीदासजी के दोहे बोलते हैं। आपने भी उनके अनेक दोहे पढ़े-सुने होंगे, जिनमें आज की परिस्थियां दिखाई देती हैं। इनमें कुछ दोहे ऐसे हैं, जिनमें जीवन जीने की सीख दी गई है, जो आज के समय में भी पूरी तरह लागू होती है। जैसे-
मान सम्मान
आवत ही हरषै नहीं नैनं नहीं सनेह।
तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह।।
अर्थात, अपने सम्मान के प्रति सजग रहने की सीख देते हुए गोस्वामीजी कहते हैं, जिस जगह आपके जाने से लोग प्रसन्न नहीं होते हों, जहां लोगों की आंखों में आपके लिए प्रेम या स्नेह ना हो, वहां हमें कभी नहीं जाना चाहिए। फिर चाहे वहां धन की बारिश ही क्यों न हो रही हो।
धर्म और पाप
दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान।
तुलसी दया न छांड़िए, जब लग घट में प्राण।।
अर्थात, गोस्वामी तुलसीदासजी मानव मात्र को यह समझाना चाहते हैं कि मनुष्य को दया करना कभी नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि दया ही हर धर्म का मूल यानी जड़ है। जबकि सभी पापों के मूल में अभिमान होता है। अभिमान के आते मनुष्य का विवेक समाप्त हो जाता है और वह पाप के गर्त में गिरता जाता है।
पण्डित और मूर्ख
काम क्रोध मद लोभ की, जौ लौं मन में खान।
तौ लौं पण्डित मूरखौं, तुलसी एक समान।।
भावार्थ: इस दोहे के माध्यम से तुलसीदासजी आम मनुष्य को समझाते हैं कि जब किसी व्यक्ति पर काम यानी कामेच्छा, क्रोध यानी गुस्सा, अहंकार और लालच हावी हो जाता है तो एक पढ़ा-लिखा और समझदार व्यक्ति भी अनपढ़ों के समान व्यवहार करने लगता है। इसलिए मनुष्य को इन अवगुणों से दूर रहना चाहिए।
मीठी वाणी
तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुं ओर ।
बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर।।
भावार्थ: तनावपूर्ण संबंधों और माहौल से बाहर आने का रास्ता बताते हुए तुलसीदास जी कहते हैं कि मीठी वाणी बोलना एक व्यक्ति के लिए हुनर है। क्योंकि मीठे बचन वशीकरण का काम करते हैं। मीठी वाणी से आप किसी को भी अपना बना सकते हैं। इसलिए कठोर वचन छोड़कर मीठा बोलना चाहिए।
जीवन चित्रकूट, काशी, अयोध्या में
तुलसीदासजी का जन्म संवत 1589 को उत्तर प्रदेश के बाँदा ज़िले के राजापुर नामक गाँव में हुआ। पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी था। विवाह दीनबंधु पाठक की पुत्री रत्नावली से हुआ था। अपनी पत्नी रत्नावली से अत्याधिक प्रेम के कारण तुलसी को रत्नावली की फटकार "लाज न आई आपको दौरे आएहु नाथ" सुननी पड़ी, जिससे इनका जीवन ही परिवर्तित हो गया। पत्नी के उपदेश से तुलसी के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया। इनके गुरु बाबा नरहरिदास थे, जिन्होंने इन्हें दीक्षा दी। इनका अधिकाँश जीवन चित्रकूट, काशी तथा अयोध्या में बीता।
तुलसी का बचपन बड़े कष्टों में बीता। माता-पिता दोनों चल बसे और इन्हें भीख मांगकर अपना पेट पालना पड़ा था। इसी बीच इनका परिचय राम-भक्त साधुओं से हुआ और इन्हें ज्ञानार्जन का अनुपम अवसर मिल गया। पत्नी के व्यंग्यबाणों से विरक्त होने की लोकप्रचलित कथा को कोई प्रमाण नहीं मिलता। तुलसी भ्रमण करते रहे और इस प्रकार समाज की तत्कालीन स्थिति से इनका सीधा संपर्क हुआ। इसी दीर्घकालीन अनुभव और अध्ययन का परिणाम तुलसी की अमूल्य कृतियां हैं, जो उस समय के भारतीय समाज के लिए तो उन्नायक सिद्ध हुई ही, आज भी जीवन को मर्यादित करने के लिए उतनी ही उपयोगी हैं। तुलसीदास द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या 39 बताई जाती है। इनमें रामचरित मानस, कवितावली, विनयपत्रिका, दोहावली, गीतावली, जानकीमंगल, हनुमान चालीसा, बरवै रामायण आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
शिष्य परम्परा
गोस्वामीजी श्रीसम्प्रदाय के आचार्य रामानन्द की शिष्यपरम्परा में थे। इन्होंने समय को देखते हुए लोकभाषा में 'रामायण' लिखा। इसमें ब्याज से वर्णाश्रमधर्म, अवतारवाद, साकार उपासना, सगुणवाद, गो-ब्राह्मण रक्षा, देवादि विविध योनियों का यथोचित सम्मान एवं प्राचीन संस्कृति और वेदमार्ग का मण्डन और साथ ही उस समय के विधर्मी अत्याचारों और सामाजिक दोषों की एवं पन्थवाद की आलोचना की गयी है। गोस्वामीजी पन्थ व सम्प्रदाय चलाने के विरोधी थे। उन्होंने व्याज से भ्रातृप्रेम, स्वराज्य के सिद्धान्त , रामराज्य का आदर्श, अत्याचारों से बचने और शत्रु पर विजयी होने के उपाय; सभी राजनीतिक बातें खुले शब्दों में उस कड़ी जासूसी के जमाने में भी बतलायीं, परन्तु उन्हें राज्याश्रय प्राप्त न था। लोगों ने उनको समझा नहीं। रामचरितमानस का राजनीतिक उद्देश्य सिद्ध नहीं हो पाया। इसीलिए उन्होंने झुँझलाकर कहा-
"रामायण अनुहरत सिख, जग भई भारत रीति।
तुलसी काठहि को सुनै, कलि कुचालि पर प्रीति।"
आदर्श सन्त कवि
उनकी यह अद्भुत पोथी इतनी लोकप्रिय है कि मूर्ख से लेकर महापण्डित तक के हाथों में आदर से स्थान पाती है। उस समय की सारी शंक्काओं का रामचरितमानस में उत्तर है। अकेले इस ग्रन्थ को लेकर यदि गोस्वामी तुलसीदास चाहते तो अपना अत्यन्त विशाल और शक्तिशाली सम्प्रदाय चला सकते थे। यह एक सौभाग्य की बात है कि आज यही एक ग्रन्थ है, जो साम्प्रदायिकता की सीमाओं को लाँघकर सारे देश में व्यापक और सभी मत-मतान्तरों को पूर्णतया मान्य है। सबको एक सूत्र में ग्रंथित करने का जो काम पहले शंकराचार्य स्वामी ने किया, वही अपने युग में और उसके पीछे आज भी गोस्वामी तुलसीदास ने किया।
रामचरितमानस की कथा का आरम्भ ही उन शंकाओं से होता है, जो कबीरदास की साखी पर पुराने विचार वालों के मन में उठती हैं। तुलसीदासजी स्वामी रामानन्द की शिष्यपरम्परा में थे, जो रामानुजाचार्य के विशिष्टद्वैत सम्प्रदाय के अन्तर्भुक्त है। परन्तु गोस्वामीजी की प्रवृत्ति साम्प्रदायिक न थी। उनके ग्रन्थों में अद्वैत और विशिष्टाद्वैत का सुन्दर समन्वय पाया जाता है। इसी प्रकार वैष्णव, शैव, शाक्त आदि साम्प्रदायिक भावनाओं और पूजापद्धतियों का समन्वय भी उनकी रचनाओं में पाया जाता है। वे आदर्श समुच्चयवादी सन्त कवि थे।
प्रखर बुद्धि के स्वामी
भगवान शंकरजी की प्रेरणा से रामशैल पर रहने वाले श्री अनन्तानन्दजी के प्रिय शिष्य श्री नरहर्यानन्द जी (नरहरि बाबा) ने इस बालक को ढूँढ़ निकाला और उसका नाम रामबोला रखा। उसे वे अयोध्या ले गये और वहाँ संवत् 1561 माघ शुक्ल पंचमी शुक्रवार को उसका यज्ञोपवीत-संस्कार कराया। बिना सिखाये ही बालक रामबोला ने गायत्री-मन्त्र का उच्चारण किया, जिसे देखकर सब लोग चकित हो गये। इसके बाद नरहरि स्वामी ने वैष्णवों के पाँच संस्कार करके रामबोला को राममन्त्र की दीक्षा दी और अयोध्या ही में रहकर उन्हें विद्याध्ययन कराने लगे। बालक रामबोला की बुद्धि बड़ी प्रखर थी।
एक बार गुरुमुख से जो सुन लेते थे, उन्हें वह कंठस्थ हो जाता। वहाँ से कुछ दिन बाद गुरु-शिष्य दोनों शूकरक्षेत्र (सोरों) पहुँचे। वहाँ नरहरि जी ने तुलसीदास को रामचरित सुनाया। कुछ दिन बाद वह काशी चले आये। काशी में शेष सनातन जी के पास रहकर तुलसीदास ने पन्द्रह वर्ष तक वेद-वेदांग का अध्ययन किया। इधर उनकी लोकवासना कुछ जाग्रत् हो उठी और अपने विद्यागुरु से आज्ञा लेकर वे अपनी जन्मभूमि को लौट आये। वहाँ आकर उन्होंने देखा, कि उनका परिवार सब नष्ट हो चुका है। उन्होंने विधिपूर्वक अपने पिता आदि का श्राद्ध किया और वहीं रहकर लोगों को भगवान राम की कथा सुनाने लगे।
इधर पण्डितों ने जब यह बात सुनी तो उनके मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई। वे दल बाँधकर तुलसीदास जी की निन्दा करने लगे और उस पुस्तक को नष्ट कर देने का प्रयत्न करने लगे। उन्होंने पुस्तक चुराने के लिये दो चोर भेजे। चोरों ने जाकर देखा कि तुलसीदास जी की कुटी के आसपास दो वीर धनुषबाण लिये पहरा दे रहे हैं। वे बड़े ही सुन्दर श्याम और गौर वर्ण के थे। उनके दर्शन से चोरों की बुद्धि शुद्ध हो गयी। उन्होंने उसी समय से चोरी करना छोड़ दिया और भजन में लग गये।
तुलसीदास जी ने अपने लिये भगवान को कष्ट हुआ जान कुटी का सारा समान लुटा दिया, पुस्तक अपने मित्र टोडरमल के यहाँ रख दी। इसके बाद उन्होंने एक दूसरी प्रति लिखी। उसी के आधार पर दूसरी प्रतिलिपियाँ तैयार की जाने लगीं। पुस्तक का प्रचार दिनों दिन बढ़ने लगा। इधर पण्डितों ने और कोई उपाय न देख मधुसूदन सरस्वती जी को उस पुस्तक को देखने की प्रेरणा की। मधुसूदन जी ने उसे देखकर बड़ी प्रसन्नता प्रकट की और उस पर यह सम्मति लिख दी-
आनन्दकानने ह्यस्मिंजङ्गमस्तुलसीतरुः।
कविता मञ्जरी भाति रामभ्रमर भूषिता॥

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