कल्कि जयंती : कब, कहां, कैसा होगा अवतार ? वेद पुराण आदि ग्रंथों में कल्कि व कलयुग के बारे में क्या लिखा है ?
संभल में भगवान कल्कि की मूर्ति को पुजारी के अलावा कोई छू नहीं सकता
- कलियुग का प्रारंभ 3102 ई.पूर्व से हुआ, जब पांच ग्रह मेष राशि पर 0 डिग्री पर हो गए
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-राजेशपाठक अवैतनिक संपादक
सम्भलग्राममुख्यस्य ब्राह्मणस्य महात्मनः।
भवने विष्णुयशसः कल्किः प्रादुर्भविष्यति।। -श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कंद-12, श्लोक-24
अर्थात, संभल-ग्राम में विष्णु यश नामक एक ब्राह्मण होंगे। उनका हृदय बड़ा उदार और भगवत भक्ति से पूर्ण होगा। उन्हीं के घर कल्कि भगवान अवतार लेंगे।
श्रीमद्भागवत महापुराण में उल्लेख स्थान वर्तमान उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में संभल नाम से है। यहीं पर भगवान विष्णु अपना कल्कि अवतार लेंगे। पुराण के अनुसार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवान कल्कि अवतार लेंगे, इसलिए इस दिन कल्कि जयंती का पर्व मनाया जाता है। श्री कल्कि अवतार जयंती श्रावण शुक्ल षष्ठी तिथि (3 अगस्त 2022) है।
कलियुग में कल्कि पाप हरेंगे। हमारे धर्म शास्त्रों में भगवान कल्कि की दसवें अवतार के रूप में चर्चा है। भगवान विष्णु के अब तक नौ अवतार हो चुके हैं, जिनमें पहला अवतार “मत्स्य” के रूप में दूसरा "कूर्म” तीसरा “वराह” चौथा अवतार “नरसिंह” पांचवां अवतार “वामन” छठा अवतार “परशुराम” सातवाँ “राम” और आठवां “कृष्ण” नौवां “बुद्ध है, जबकि दसवां “कल्कि” अवतार होगा। ऐसा धार्मिक ग्रंथों का कहना है। कल्कि अवतार लोगों के लिए रहस्य है। लोगों के मन में विभिन्न जिज्ञासाएं हैं- भगवान विष्णु अपना कल्कि अवतार कब, कहां लेंगे ? उनका रूप कैसा होगा ? उनका वाहन क्या होगा ? ऐसे सभी प्रश्नों के उत्तर श्रीमद भागवत महापुराण के 12 वें स्कन्द में हैं।
कलियुग में कल्कि पाप हरेंगे। हमारे धर्म शास्त्रों में भगवान कल्कि की दसवें अवतार के रूप में चर्चा है। भगवान विष्णु के अब तक नौ अवतार हो चुके हैं, जिनमें पहला अवतार “मत्स्य” के रूप में दूसरा "कूर्म” तीसरा “वराह” चौथा अवतार “नरसिंह” पांचवां अवतार “वामन” छठा अवतार “परशुराम” सातवाँ “राम” और आठवां “कृष्ण” नौवां “बुद्ध है, जबकि दसवां “कल्कि” अवतार होगा। ऐसा धार्मिक ग्रंथों का कहना है। कल्कि अवतार लोगों के लिए रहस्य है। लोगों के मन में विभिन्न जिज्ञासाएं हैं- भगवान विष्णु अपना कल्कि अवतार कब, कहां लेंगे ? उनका रूप कैसा होगा ? उनका वाहन क्या होगा ? ऐसे सभी प्रश्नों के उत्तर श्रीमद भागवत महापुराण के 12 वें स्कन्द में हैं।
पुराणों के अनुसार, कलयुग में भगवान विष्णु कल्कि रूप में अवतार लेंगे। सतयुग के पुनरुत्थान और अधर्म को खत्म करने के लिए ये अवतार होगा। भगवान के दसवें अवतार की जो तिथि बताई है, उसके अनुसार भगवान सावन महीने के शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि को जन्म लेंगे। इसी लिए हर वर्ष सावन महीने के शुक्ल पक्ष को कल्कि जयंती मनाई जाती है। यह बात सत्य है, ऐसा जरूर होगा।
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लगभग 300 वर्षों से कल्कि अवतार जयंती भी मनाई जा रही है। जयंती को विधिवत मनाने का शुभारंभ राजस्थान के मावजी नामक संत ने किया, जिन्होंने बिजली, वायुयान, उपग्रह को लेकर सच्ची भविष्यवाणी की थी। इस दिन भगवान विष्णु, कृष्ण के साथ-साथ कल्कि अवतार की भी पूजा-अर्चना की जाती है। राजस्थान के जयपुर में कल्कि का बहुत बड़ा मंदिर है, जहाँ इस दिन पूजा-अर्चना आदि कर भंडारा आदि किया जाता है। कल्कि जयंती मनाने के पीछे विशेष कारण यही माने जाते हैं, कि भगवान की पूजा-आराधना करने से भक्तों को शांति मिलती है और उन पर हो रहे अत्याचार का प्रभाव नहीं होता। इन्हीं मान्यताओं के चलते भगवान विष्णु तथा कृष्ण की पूजा अर्चना की जाती है।
कल्कि अवतार व चार युग-
सनातन हिंदू धर्म में चार युग हैं- सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। ऋग्वेद, महाभारत और कौटिल्य ने भी अपने पुराणों में 'युग' शब्द का प्रयोग किया है। कलयुग यानी कलह-क्लेश का युग, जिस युग में सभी के मन में अंसतोष हो, सभी मानसिक रूप से दुखी हों, वह युग ही कलयुग है। सतयुग में लोगों में छल, कपट और दंभ नहीं होता है। सतयुग के बाद जैसे-जैसे दूसरा युग आता-जाता है, वैसे-वैसे मनुष्यों की आयु, वीर्य, बुद्धि, बल और तेज का ह्रास होता जाता है। त्रेतायुग में एक अंश अधर्म अपना पैर जमा लेता है। द्वापर युग में धर्म आधा ही रह जाता है। कलियुग के आने पर तीन अंशों से इस जगत पर अधर्म का आक्रमण हो जाता है। इस युग में धर्म का केवल एक-चौथाई अंश ही रह जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अभी कलियुग चल रहा है। हिंदू धर्म में अलग-अलग युग के देवता बताए गए हैं। कलियुग के देवता कल्कि अवतार, जो भगवान विष्णु के अंश हैं, को माना गया है।
कल्कि अवतार व चार युग-
सनातन हिंदू धर्म में चार युग हैं- सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। ऋग्वेद, महाभारत और कौटिल्य ने भी अपने पुराणों में 'युग' शब्द का प्रयोग किया है। कलयुग यानी कलह-क्लेश का युग, जिस युग में सभी के मन में अंसतोष हो, सभी मानसिक रूप से दुखी हों, वह युग ही कलयुग है। सतयुग में लोगों में छल, कपट और दंभ नहीं होता है। सतयुग के बाद जैसे-जैसे दूसरा युग आता-जाता है, वैसे-वैसे मनुष्यों की आयु, वीर्य, बुद्धि, बल और तेज का ह्रास होता जाता है। त्रेतायुग में एक अंश अधर्म अपना पैर जमा लेता है। द्वापर युग में धर्म आधा ही रह जाता है। कलियुग के आने पर तीन अंशों से इस जगत पर अधर्म का आक्रमण हो जाता है। इस युग में धर्म का केवल एक-चौथाई अंश ही रह जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अभी कलियुग चल रहा है। हिंदू धर्म में अलग-अलग युग के देवता बताए गए हैं। कलियुग के देवता कल्कि अवतार, जो भगवान विष्णु के अंश हैं, को माना गया है।
मान्यतानुसार, कल्कि अवतार 64 प्रकार की कलाओं में निपुण होंगे। कल्कि अवतार में भगवान का वाहन देवदत्त नामक सफेद घोड़ा होगा। इसी पर सवार होकर भगवान संसार में पापियों का विनाश करेंगे और धर्म की पुनः स्थापना करेंगे। स्कंद पुराण के दशम अध्याय में भी इसका उल्लेख है। विष्णु पुराण में कल्कि अवतार का विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है। इसे धार्मिक प्रवृत्ति के लोग सच मानते हैं और कुछ अज्ञानी जन इसे भ्रम अर्थात अपवाह मानते हैं। परंतु कलयुग में हो रहे अत्याचार का अंत तो कोई ना कोई दिव्य शक्ति ही करेगी यह तो तय है।
पुराणों में भविष्यवाणी लिखी है- कलियुग के अंतिम चरम में अर्थात कलियुग और सतयुग के संधिकाल में कल्कि अवतार पृथ्वी पर होगा। वायु पुराण के 98 वें अध्याय में लिखा है- जब कलियुग अपने चरम पर होगा, तब कल्कि अवतार का जन्म होगा। इसमें भगवान विष्णु की प्रशंसा करते हुए दत्तात्रेय, व्यास, कल्की विष्णु के अवतार बताए गए हैं।
कल्कि भगवान उत्तर प्रदेश में गंगा और रामगंगा के बीच बसे मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश) के सम्भल ग्राम में जन्म लेंगे। (सम्भल गांव ओडिशा में भी है) भगवान के जन्म के समय चन्द्रमा धनिष्ठा नक्षत्रा और कुंभ राशि में होगा। सूर्य तुला राशि में स्वाति नक्षत्रा में गोचर करेगा। गुरु स्वराशि धनु में और शनि अपनी उच्च राशि तुला में विराजमान होगा। वह ब्राह्मण कुमार बहुत ही बलवान, बुद्धिमान और पराक्रमी होगा। मन में सोचते ही उनके पास वाहन, अस्त्र-शस्त्र, योद्धा और कवच उपस्थित हो जाएँंगे। वे सब दुष्टों का नाश करेंगे, तब सतयुग शुरू होगा। वे धर्म के अनुसार विजय पाकर चक्रवर्ती राजा बनेंगे।
पुराणों में भविष्यवाणी लिखी है- कलियुग के अंतिम चरम में अर्थात कलियुग और सतयुग के संधिकाल में कल्कि अवतार पृथ्वी पर होगा। वायु पुराण के 98 वें अध्याय में लिखा है- जब कलियुग अपने चरम पर होगा, तब कल्कि अवतार का जन्म होगा। इसमें भगवान विष्णु की प्रशंसा करते हुए दत्तात्रेय, व्यास, कल्की विष्णु के अवतार बताए गए हैं।
कल्कि भगवान उत्तर प्रदेश में गंगा और रामगंगा के बीच बसे मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश) के सम्भल ग्राम में जन्म लेंगे। (सम्भल गांव ओडिशा में भी है) भगवान के जन्म के समय चन्द्रमा धनिष्ठा नक्षत्रा और कुंभ राशि में होगा। सूर्य तुला राशि में स्वाति नक्षत्रा में गोचर करेगा। गुरु स्वराशि धनु में और शनि अपनी उच्च राशि तुला में विराजमान होगा। वह ब्राह्मण कुमार बहुत ही बलवान, बुद्धिमान और पराक्रमी होगा। मन में सोचते ही उनके पास वाहन, अस्त्र-शस्त्र, योद्धा और कवच उपस्थित हो जाएँंगे। वे सब दुष्टों का नाश करेंगे, तब सतयुग शुरू होगा। वे धर्म के अनुसार विजय पाकर चक्रवर्ती राजा बनेंगे।
कल्कि पुराण में उल्लेख है, कि सम्भल नामक ग्राम में विष्णुयश नाम के एक ब्राह्मण निवास करेंगे, जो सुमति नामक स्त्री के साथ विवाह करेंगें। दोनों ही धर्म-कर्म में जीवन गुजारेंगे। कल्कि उनके घर में पुत्र होकर जन्म लेंगे और अल्पायु में ही वेदादि शास्त्रों का पाठ करके महापण्डित बनेंगे। बाद में वे जीवों के दुःख से कातर हो महादेव की उपासना करके अस्त्रविद्या प्राप्त करेंगे। उनका विवाह बृहद्रथ की पुत्री पद्मादेवी के साथ होगा।
अग्नि पुराण के 16 वें अध्याय में कल्कि अवतार का वर्णन और चित्रण मिलता है। इसमें कल्कि अवतार को तीर-कमान लिए हुए एक घुड़सवार के रूप में दिखाया गया है। वहीं, कल्कि पुराण के अनुसार, कल्कि भगवान हाथ में चमचमाती हुई तलवार लिए सफेद घोड़े पर सवार होकर, युद्ध और विजय के लिए निकलेंगे तथा बौद्ध, जैन और म्लेच्छों को पराजित कर सनातन राज्य की दोबारा स्थापना करेंगे।
वैष्णव ब्रह्माण्ड विज्ञान में लिखा है- कल्कि अवतार अन्तहीन चक्र वाले चार कालों में से अन्तिम कलियुग के अन्त में हिन्दू भगवान विष्णु के दसवें अवतार माने जाते हैं। जब भगवान कल्कि देवदत्त नाम के घोड़े पर बैठकर होकर अपनी लपलपाती तेज धर तलवार से दुष्टों का संहार करेंगे, तब सतयुग का प्रारंभ होगा और सनातन धर्म पुनः स्थापित होगा।
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कल्कि अवतार का रहस्य अभी भी रहस्य बना हुआ है। कुछ इतिहासकार और धर्म शास्त्रों के अनुसार हिंदू धर्म का पतन होने पर कलिक अवतार होना निश्चित बताया है। हिंदू धर्म के मुख्य शास्त्र के रूप में वेद ही सर्वश्रेष्ठ है। वेदों का सार है उपनिषद। उपनिषदों का सार है गीता। इतिहास ग्रंथ महाभारत का एक हिस्सा है गीता। रामायण, पुराण और स्मृतियां भी इतिहास और व्यवस्था को उल्लेखित करने वाले ग्रंथ है, धर्मग्रंथ नहीं।
धर्म शास्त्रों के अनुसार, कलियुग 4 लाख 32 हजार वर्ष का है। जिसका अभी प्रथम चरण का ही पालन हुआ है। कलियुग का प्रारंभ 3102 ईसा पूर्व से हुआ था, जब पांच ग्रह- मंगल, बुध, शुक्र, वृहस्पति और शनि, मेष राशि पर 0 डिग्री पर हो गए थे। कल्कि अवतार कलयुग व सतयुग के संधिकाल में होगा। यह अवतार 64 कलाओं से युक्त होगा। जब भगवान राम का अवतार हुआ, वह 14 कलाओं के साथ हुआ और भगवान श्रीकृष्ण ने 16 कलाओं के साथ अवतार लिया था। अब आप सोचिए जब भगवान विष्णु 64 कलाओं के साथ अवतरित होंगे, तो उनकी शक्ति कितनी भयंकर होगी। तथा उनका रूप तेजेश्वर और उनकी गति कितनी तीव्र होगी। इसका अनुमान लगाना कलयुग के इंसान की वश में नहीं है।
कलयुग के लक्षण व प्रभाव-
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कलियुग में मानवता का पतन हो जाएगा, लोगों का व्यक्तित्व दोहरा होगा, लोगों के कर्मों और दिखावे में बहुत अंतर्का होगा। रिश्ते अपना मान खो देंगे और एक दूसरे का सम्मान केवल दिखावा मात्र रह जाएगा।
कलयुग के लक्षण व प्रभाव-
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कलियुग में मानवता का पतन हो जाएगा, लोगों का व्यक्तित्व दोहरा होगा, लोगों के कर्मों और दिखावे में बहुत अंतर्का होगा। रिश्ते अपना मान खो देंगे और एक दूसरे का सम्मान केवल दिखावा मात्र रह जाएगा।
मान्यतानुसार, जैसे-जैसे घोर कलियुग आता जाएगा, वैसे-वैसे दिनों-दिन धर्म, सत्य, पवित्रता, क्षमा, दया, आयु और बल का लोप होता जाएगा।
कलियुग में जिसके पास धन होगा, उसी को लोग कुलीन, सदाचारी और सद्गुणी मानेंगे। जो जितना छल, कपट करेगा, वह उतना ही व्यवहार-कुशल माना जाएगा।
जो जितना अधिक दम्भ-पाखंड करेगा, उसे उतना ही बड़ा साधु समझा जाएगा। धर्म का सेवन यश के लिए किया जाएगा।
पूरी पृथ्वी पर दुष्टों का बोलबाला हो जाएगा। राजा होने का कोई नियम न रहेगा।
जो बली होगा, वही राजा बन बैठेगा। उस समय के नीच राजा अत्यंत निर्दयी एवं क्रूर होंगे। उनसे डरकर प्रजा पहाड़ों और जंगलों में भाग जाएगी। उस समय भयंकर अकाल पड़ जाएगा। लोग भूख-प्यास तथा नाना प्रकार की चिंताओं से दुखी रहेंगे। वे पत्तियों को खाकर पेट भरेंगे। मनुष्य चोरी, हिंसा आदि अनेक प्रकार के कुकर्मों से जीविका चलाने लगेंगे।
कलिकाल के दोष से प्राणियों के शरीर छोटे-छोटे होंगे। गौएं बकरियों की तरह छोटी-छोटी और कम दूध देने वाली हो जाएंगी।
वानप्रस्थी और संन्यासी आदि गृहस्थों की तरह रहने लगेंगे। लोग धर्म शास्त्रों की खिल्ली उड़ाएंगे। वेद-पुराण की निंदा करेंगे। पूजा-पाठ को केवल ढकोसला मानेंगे।
धर्म में पाखंड की प्रधानता हो जाएगी। इस प्रकार कलियुग का अंत होते-होते पृथ्वी पर हिंसा और जातीय संघर्ष बढ़ जाएगा। ऐसी स्थिति में धर्म की रक्षा करने के लिए स्वयं भगवान अवतार लेंगे। विष्णु जी कल्कि अवतार लेकर कलियुग का अंत करेंगे और धर्मयुग की स्थापना करेंगे।
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श्रीमद्भागवत पुराण में लिखा है कि कल्कि अवतार कलियुग की समाप्ति और सतयुग के संधि काल में होगा।
इस दिन पूजा करने के लिए ब्रह्ममुहूर्त में उठें, इसके बाद व्रत का संकल्प लें।
फिर भगवान कल्कि के प्रतिमूर्ति को गंगा स्नान कराने के बाद वस्त्र पहनाएं।
इसके बाद पूजा स्थल पर एक चौकी पर स्थापित करें।
फिर भगवान कल्कि को जल का अर्घ्य देकर पूजा करनी चाहिए।
भगवान कल्कि की पूजा फल, फूल, धूप, दीप, अगरबत्ती से करना चाहिए।
इसके बाद आरती के बाद पूजा पूरी करनी चाहिए।
भगवान जब कल्कि के रूप में अवतार ग्रहण करेंगे, उसी समय सत्य युग (सतयुग) का प्रारम्भ हो जाएगा। प्रजा सुख-चैन से रहने लगेगी। उत्तर प्रदेश में मुरादाबाद जिले के शंभल नामक स्थान पर विष्णुयश नामक तपस्वी ब्राह्मण के घर पर पुत्र रूप में जन्म लेंगे। जहां कल्कि अवतार होगा, वहीं भगवान कल्कि का एक प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर में स्थापित भगवान कल्कि की मूर्ति को पुजारी के अलावा कोई छू नहीं सकता है। सभी भक्तों को दूर से ही भगवान के दर्शन करने होते हैं। इस मंदिर परिसर में एक मंदिर भगवान शिव का भी है।
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