मकर संक्रांति : पिता सूर्य और पुत्र शनि का मिलन, दिन के बड़े होने व रातें छोटी होने के शुरू होने से तिथि है "संक्रांति", जानें...


...मकर संक्रांति का महत्व, पौराणिक मान्यता
- अपनी राशि के अनुसार किन वस्तुओं का करें दान 
- मकर संक्रांति : बसंत ऋतु के आगमन का दिन 

(धर्म नगरी / DN News)  
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राजेश पाठक अवैतनिक संपादक 

उत्तरायण का पर्व- मकर संक्रांति के पश्चात देशभर में विभिन्न मांगलिक कार्य
 भी आरंभ हो जाते हैं। इस दिन सूर्य मकर संक्रांति में प्रवेश करते हैं, जिस कारण इसे "मकर संक्रांति का पर्व" कहा जाता है।सनातन शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि अर्थात नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इस दिन पूजा-पाठ और स्नान दान का विशेष महत्व होता है। इसलिए इस दिन जप-तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी धारणा है, मकर संक्रांति की तिथि को दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है। वहीं, इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है। इस तिथि को लोग तीर्थों में जाकर, पविंत्र नदियों- गंगा, नर्मदा आदि में स्नान भी करते हैं।

मकर संक्रांति का पर्व कुछ वर्षों पूर्व तक जनवरी के 14वें (14 जनवरी) दिन पड़ता था, परन्तु अब 14वें या 15वें (14 या 15 जनवरी को) को पड़ता है। देश भर में इस पर्व या त्यौहार को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। यद्यपि, मकर संक्रांति का पर्व, त्यौहार चंद्रमा की विभिन्न स्थितियों के आधार पर मनाए जाने वाले अन्य हिंदू त्योहारों में से एक है। चंद्र कैलेंडर के स्थान पर सौर कैलेंडर के अनुसार गणना की जाती है।

मकर संक्रांति से दिन बड़े होने लगते हैं, जबकि रातें छोटी होने लगती हैं, क्योंकि यह पर्व एक संक्रांति पर्व है। इस तिथि को दिन-रात बराबर होने से बसंत ऋतु का आगमन हो जाता है। मकर संक्रांति को लेकर इस बार लोगों के मन में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। यह 14 जनवरी या 15 जनवरी को होगा।

पिता सूर्य और पुत्र शनि का मिलन
सूर्य सिंह राशि के स्वामी हैं और शनि मकर और कुंभ दो राशियों के स्वामी हैं, जब मकर संक्रांति के दिन सूर्य का प्रवेश मकर राशि में होता है, तो ऐसा माना जाता है, कि पिता सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर आए हैं, जिसके चलते दान-पुण्य करने का विशेष विधान है। मकर संक्रांति के दिन प्रयागराज संगम के तट एवं पवित्र नदियों के पावन तटों पर हजारों श्रद्धालुओं को स्नान, दान आदि द्वारा पुण्यार्जन करते देखा जाता है।


मकर संक्रांति से अग्नि तत्त्व की शुरुआत होती है और कर्क संक्रांति से जल तत्त्व की। इस समय सूर्य उत्तरायण होता है। अतः इस समय किये गए जप और दान का फल अनंत गुना होता है। मकर संक्रान्ति के अवसर पर गंगा स्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यन्त शुभ माना गया है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गयी है। 

सामान्यत: सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किन्तु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यन्त फलदायक है। यह प्रवेश अथवा संक्रमण क्रिया छ:-छ: माह के अन्तराल पर होती है। भारत देश उत्तरी गोलार्ध में स्थित है। मकर संक्रान्ति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है अर्थात् भारत से अपेक्षाकृत अधिक दूर होता है। इसी कारण यहाँ पर रातें बड़ी एवं दिन छोटे  तथा सर्दी का मौसम होता है। 

मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अतएव इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा गरमी का मौसम शुरू हो जाता है। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अन्धकार कम होगा। अत: मकर संक्रान्ति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतनता एवं कार्य शक्ति में वृद्धि होगी।

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सूर्य के उत्तरायण के दिन संक्रांति व्रत करना चाहिए, ऐसा भविष्य पुराण में लिखा है। इस दिन पानी में तिल मिलाकार स्नान करना चाहिए। संभव हो तो गंगा, नर्मदा आदि पवित्र नदियों में स्नान करना चाहिए, क्योंकि इस द‍िन तीर्थ-स्थान या पवित्र नदियों में स्नान करने का महत्व अधिक है। 

स्नान के पश्चात भगवान सूर्य की पंचोपचार विधि से (यदि संभव हो) पूजा-अर्चना करनी चाहिए। फिर यथा सामर्थ्य गंगा घाट अथवा घर में पूर्वाभिमुख होकर अपने सामर्थ्य के अनुसार गायत्री मन्त्र अथवा सूर्य के इन मंत्रों का अधिक से अधिक जाप करना चाहिए- 
ॐ सूर्याय नम: ॐ आदित्याय नम: ॐ सप्तार्चिषे नम:।
ऋड्मण्डलाय नम: ॐ सवित्रे नम: ॐ वरुणाय नम: ॐ सप्तसप्त्ये नम: ऊं मार्तण्डाय नम: ॐ विष्णवे नम:।

पूजा- पूजन-अर्चन में भगवान को भी तिल और गुड़ से बने सामग्रियों का भोग लगाएं। तदोपरान्त अधिकाधिक प्रसाद बांटे। घर में बनाए या बाजार में उपलब्ध तिल के बनाए सामग्रियों का सेवन करें। इस पुण्य कार्य के काल में किसी से भी कड़वे बोलना अच्छा नहीं माना गया है। मकर संक्रांति पर अपने पितरों का ध्यान और उन्हें तर्पण अवश्य देना चाहिए

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राशि अनुसार दान योग्य वस्तु
(
मकर संक्रांति)
मेष- मेष राशि पर अभी शनि की साढ़ेसाती चल रही है। अतः तिल व गुड़ का दान अवश्य करना चाहिए। लाल रंग के वस्त्र का दान करना आपके लिए उत्तम रहेगा। इसके अलावा मूंगफली, वस्त्र व गाजर भी दान कर सकते हैं। 

वृषभ- आपको सफेद वस्त्र, तिल, दही आदि सफेद चीजों का दान करना चाहिए, क्योंकि वृषभ के स्वामी शुक्र होते हैं। मकर संक्रांति पर इन वस्तुओं के दान से आपके रुके हुए कार्य पूरे हो सकते हैं, जीवन में उन्नति के मार्ग खुल सकते हैं।
 
मिथुन- मकर संक्रांति के दिन कंबल, मूंग की दाल, कंबल आदि का दान करना चाहिए। इस दिन गाय को गुड़ और तिल भी अवश्य खिलायें। इससे शारीरिक कष्टों से रक्षा एवं जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। इस दिन आप छाते का भी दान कर सकते हैं।

कर्क- इस राशि के स्वामी चंद्रमा होते हैं, अतः आप चावल, सफेद तिल, चांदी आदि का दान करें। चंद्रमा का संबंध सफेद वस्तुओं से होता है, इसलिए सफेद चीजों का दान करने से जीवन के कष्टों से मुक्ति मिल सकती है। इस दिन आप घी का दान भी कर सकते हैं।

सिंह- इस राशि जातकों पर शनि की ढैय्या का प्रभाव है। इसलिए आपको मकर संक्रांति के दिन तिल व गुड़ का दान अवश्य करना चाहिए। इससे जीवन में सकारात्मक बदलाव आ सकते हैं। साथ ही, इस दिन आप किसी अभावग्रस्त व्यक्ति को कंबल दान कर सकते हैं, जिससे आर्थिक तंगी से राहत मिल सकती है।

कन्या- आपको हरे रंग के वस्त्र, खिचड़ी और कंबल का दान करना चाहिए। अपने सामर्थ्य अनुसार किसी निर्धन या अभावग्रस्त व्यक्ति को इनका दान कर सकते हैं। हरे रंग की साड़ी का दान भी कर सकते हैं, जिसके प्रभाव से जीवन में सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होगा

तुला- आपको मकर संक्रांति के पर शहद का दान अवश्य करना चाहिए। तुला राशि के स्वामी शुक्र का संबंध सफेद रंग से माना जाता है। इसलिए मकर संक्रांति पर सफेद वस्त्र, चीनी आदि का दान करने से आपके कार्यों में आ रही बाधाएं दूर हो सकती हैं, जीवन में सकारात्मकता बनी रहती है।

वृश्चिक- आपको किसी निर्धन या अभावग्रस्त व्यक्ति को लाल वस्त्र, गुड़, तिल आदि का दान करना चाहिए। वृश्चिक के स्वामी मंगल ग्रह होने से, लाल रंग से संबंधित वस्तुओं का दान करने से कुंडली में मंगल की स्थिति अनुकूल होती है, मान-सम्मान में वृद्धि और करियर में प्रगति के मार्ग खुल सकते हैं।

धनु- इस राशि के जातकों पर अभी शनि के ढैय्या का प्रभाव होने से गुड़ और तिल का दान अवश्य करना चाहिए। साथ ही, अपने सामर्थ्य अनुसार किसी या अनेक निर्धन या अभावग्रस्त व्यक्ति को पीले वस्त्र, पीली दाल, हल्दी आदि का दान भी कर सकते हैं।

मकर- इस राशि के स्वामी शनि होते हैं। अतः आपको काले व नीले रंग की वस्तुओं का दान करना चाहिए। इस दिन काले तिल, काले वस्त्र, काले जूते आदि का भी दान कर सकते हैं, जिससे आपको शनिदेव की कृपा से जीवन में आ रही बाधाएं दूर हो सकती हैं।

कुंभ- इस राशि के जातकों पर शनि की साढ़ेसाती चल रही है। अतः मकर संक्रांति पर तिल व गुड़ का दान अवश्य करें, जिससे प्रतिकूल प्रभाव एवं कार्यों में आ रही अड़चनों भी कम हो सकती है। आप काले तिल, काली उड़द, तिल खिचड़ी, कंबल आदि का दान भी कर सकते हैं।

मीन- अभी शनि की साढ़ेसाती चल रही है। अतः तिल व गुड़ का दान अवश्य करें। अभावग्रस्त व्यक्ति को रेशमी वस्त्र, चने की दाल, चावल आदि का दान भी कर सकते हैं।  

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मकर संक्राति को करने योग्य अन्य उपाय-
- सूर्य और शनि का सम्बन्ध इस पर्व से होने से यह पर्व बहुत महत्वपूर्ण है। कहते हैं, इस तिथि पर सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने के लिए आते हैं। प्रायः शुक्र का उदय भी लगभग इसी समय होता है, इसलिए यहाँ से शुभ कार्यों का आरंभ भी होता है। अतः इस तिथि / दिन निम्न उपाय भी विश्वासपूर्वक किए जा सकते हैं-  
- यदि कुंडली में सूर्य या शनि की स्थिति प्रतिकूल (खराब) हो, तो इस पर्व पर विशेष तरह की पूजा से उसको ठीक या अनुकूल कर सकते हैं।
- ऐसे परिवार जहाँ रोग, कलह तथा अशांति हो, वहां रसोईघर में ग्रहों के विशेष नवान्न से पूजा करके लाभ लिया जा सकता है।
- मकर संक्रांति को पहली होरा में स्नान करें, सूर्य को अर्घ्य दें।
- श्रीमदभागवद के एक अध्याय का पाठ या गीता का पाठ करें।
- मनोकामना संकल्प कर नए अन्न, कम्बल घी का दान करें लाल फूल और अक्षत डाल कर सूर्य को अर्घ्य दें।

सूर्य के बीज मंत्र का जाप करें-
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः

संध्याकाल में अन्न का सेवन न करें।
तिल और अक्षत डाल कर सूर्य को अर्घ्य दें।

शनि देव के वेदोक्त मंत्र का जाप करें-
ॐ प्रां प्री प्रौं सः शनै श्चराय नमः

घी, काला कम्बल और लोहे का दान करें।


मकर संक्रांति की तिथि का इतिहास
मकर संक्रांति पर तिथियों को लेकर विगत कुछ वर्षों में उलझन की स्थिति बनी रहती है, क्योंकि कई बार सूर्य का प्रवेश 14 जनवरी को शाम और रात में होता है। ऐसे में शास्त्रों के अनुसार संक्रांति अगले दिन माना जाता है। आपको बता दें, मकर संक्रांति का समय युगों से बदलता रहा है। ज्योतिषीय गणना और घटनाओं को जोड़ने से ज्ञात होता है, कि महाभारत काल में मकर संक्रांति दिसंबर में मनाई जाती थी। ऐसा उल्लेख मिलता है, कि छठी   शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन 
(590-647 ई.) के समय में 24 दिसंबर को मकर संक्रांति मनाई गई थी। अकबर के समय में 10 जनवरी और शिवाजी महाराज के काल में 11 जनवरी को मकर संक्रांति मनाई गई थी।

सूर्य की चाल से मकर संक्रांति के दिनांक का रहस्य है। मकर संक्रांति की तिथि का यह रहस्य इसलिए है, क्योंकि सूर्य की गति एक साल में 20 सेकंड बढ़ जाती है। इस प्रकार 5,000 वर्ष पश्चात संभव है, कि मकर संक्रांति जनवरी में नहीं बल्कि फरवरी में मनाई जाएगी।  
 
गीता में लिखे मकर संक्रांति के रहस्यों को जाने-
सूर्य संक्रांति में मकर सक्रांति का महत्व ही अधिक माना गया है। माघ माह में कृष्ण पंचमी को मकर सक्रांति देश के लगभग सभी राज्यों में अलग-अलग सांस्कृतिक रूपों में मनाई जाती है। जाने मकर संक्रांति के बारे में रोचक तथ्‍य-

मकर संक्रांति का अर्थ
मकर संक्रांति में 'मकर' शब्द मकर राशि को इंगित करता है जबकि 'संक्रांति' का अर्थ संक्रमण अर्थात प्रवेश करना है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। एक राशि को छोड़कर दूसरे में प्रवेश करने की इस विस्थापन क्रिया को संक्रांति कहते हैं। चूंकि सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है इसलिए इस समय को 'मकर संक्रांति' कहा जाता है।
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पाठकों से विनम्र निवेदन-
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अतः इस अव्यावसायिक या बिना लाभ-हानि के सिद्धांत पर जनवरी 2026 में प्रकाशन के 15 वर्ष में प्रवेश हुए "धर्म नगरी" की अधिकाधिक प्रतियाँ छपे, आपसे एवं आपके संपर्क में सक्षम एवं सनातन प्रेमी लोगों से सहयोग की अपेक्षा रखते हैं। किसी भी जानकारी हेतु कृपया 6261868110 पर फोन करें  _/\_ प्रबंध संपादक
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वर्ष में होती है 12 संक्रांतियां
पृथ्वी 23.5 डिग्री अक्ष पर झुकी हुई सूर्य की परिक्रमा करती है। वर्ष में 4 स्थितियां ऐसी होती हैं, जब सूर्य की सीधी किरणें 21 मार्च और 23 सितंबर को विषुवत रेखा, 21 जून को कर्क रेखा और 22 दिसंबर को मकर रेखा पर पड़ती है। वास्तव में चन्द्रमा के पथ को 27 नक्षत्रों में बांटा गया है, जबकि सूर्य के पथ को 12 राशियों में बांटा गया है। भारतीय ज्योतिष में इन 4 स्थितियों को 12 संक्रांतियों में बांटा गया है, जिसमें से चार संक्रांतियां महत्वपूर्ण होती हैं- मेष, तुला, कर्क और मकर संक्रांति।

सूर्य होता है उत्तरायन
चन्द्र के आधार पर माह के 2 भाग हैं- कृष्ण और शुक्ल पक्ष। इसी तरह सूर्य के आधार पर वर्ष के 2 भाग हैं- उत्तरायन और दक्षिणायन। इस दिन से सूर्य उत्तरायन हो जाता है। उत्तरायन अर्थात इस समय से धरती का उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है, तो उत्तर ही से सूर्य निकलने लगता है। इसे सोम्यायन भी कहते हैं। ०६ माह सूर्य उत्तरायन रहता है और ०६ माह दक्षिणायन। मकर संक्रांति से लेकर कर्क संक्रांति के बीच के ०६ मास के समयांतराल को उत्तरायन कहते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण ने भी उत्तरायन का महत्व बताते हुए गीता में कहा है कि उत्तरायन के ०६ मास के शुभ काल में जब सूर्यदेव उत्तरायन होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय रहती है, तो इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता, ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यही कारण था कि भीष्म पितामह ने शरीर तब तक नहीं त्यागा था, जब तक कि सूर्य उत्तरायन नहीं हो गया।


फसलें लहलहाने लगती हैं-
इस दिन से वसंत ऋतु की भी शुरुआत होती है और यह पर्व संपूर्ण अखंड भारत में फसलों के आगमन की खुशी के रूप में मनाया जाता है। खरीफ की फसलें कट चुकी होती हैं और खेतों में रबी की फसलें लहलहा रही होती हैं। खेत में सरसों के फूल मनमोहक लगते हैं।

संपूर्ण भारत का पर्व
मकर संक्रांति के इस पर्व को भारत के अलग-अलग राज्यों में वहां के स्थानीय परंपरा के अनुरूप मनाया जाता है। दक्षिण भारत में इस पर्व को पोंगल के रूप में मनाते हैं, तो उत्तर भारत में इसे लोहड़ी, खिचड़ी पर्व, पतंगोत्सव आदि कहा जाता है। मध्य भारत में इसे "संक्रांति" कहा जाता है। पूर्वोत्तर भारत में बिहू नाम से इस पर्व को मनाया जाता है।

तिल-गुड़ के लड्डू और पकवान
सर्दी के मौसम में वातावरण का तापमान बहुत कम होने के कारण शरीर में रोग और बीमारियां जल्दी लगती हैं। इसलिए इस दिन गुड़ व तिल से बने मिष्ठान्न या पकवान बनाए, खाए और बांटे जाते हैं। इनमें गर्मी पैदा करने वाले त्वों के साथ ही शरीर के लिए लाभदायक पोषक पदार्थ भी होते हैं। उत्तर भारत में इस दिन खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। गुड़-तिल, रेवड़ी, गजक का प्रसाद बांटा जाता है।

स्नान, दान, पुण्य और पूजा

मान्यता है, इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनिदेव से नाराजगी त्यागकर उनके घर गए थे। इसलिए इस दिन पवित्र नदी में स्नान, दान, पूजा आदि करने से पुण्य हजार गुना हो जाता है। इस दिन गंगासागर में मेला भी लगता है। इसी दिन मलमास भी समाप्त होने तथा शुभ माह प्रारंभ होने के कारण लोग दान-पुण्य से अच्छी शुरुआत करते हैं और इस दिन को सुख-समृद्धि का माना जाता है।



पतंग महोत्सव का पर्व
मकर संक्रांति पर्व को 'पतंग महोत्सव' के नाम से भी जाना जाता है। पतंग उड़ाने के पीछे मुख्य व्यवहारिक कारण है- कुछ घंटे सूर्य के प्रकाश में बिताना (पढ़ें संबंधित लेख- ---)। यह समय सर्दी का होता है और इस मौसम में सुबह का सूर्य प्रकाश शरीर के लिए स्वास्थ वर्द्धक और त्वचा व हड्डियों के लिए अत्यंत लाभदायक होता है। अत: उत्सव के साथ ही स्वास्थ्य लाभ मिलता है।

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ऐतिहासिक तथ्‍य
सनातन हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार, मकर संक्रांति से देवताओं का दिन आरंभ होता है, जो आषाढ़ मास तक रहता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का दिन ही चयन किया था। मकर संक्रांति के दिन गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं। महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया। इसलिए मकर संक्रांति पर गंगा सागर में मेला लगता है।

इसी दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के घर एक महीने के लिए जाते हैं, क्योंकि मकर राशि का स्वामी शनि है। इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा की। उन्होंने सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। इसलिए यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता की समाप्ति का दिन भी माना जाता है।

वार युक्त संक्रांति
बारह संक्रान्तियाँ सात प्रकार की, सात नामों वाली हैं, जो किसी सप्ताह के दिन या किसी विशिष्ट नक्षत्र के सम्मिलन के आधार पर हैं। ये हैं- मन्दा, मन्दाकिनी, ध्वांक्षी, घोरा, महोदरी, राक्षसी एवं मिश्रिता। घोरा रविवार, मेष या कर्क या मकर संक्रान्ति को, ध्वांक्षी सोमवार को, महोदरी मंगल को, मन्दाकिनी बुध को, मन्दा बृहस्पति को, मिश्रिता शुक्र को एवं राक्षसी शनि को होती है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, कोई संक्रान्ति, यथा मेष या कर्क आदि क्रम से मन्दा, मन्दाकिनी, ध्वांक्षी, घोरा, महोदरी, राक्षसी, मिश्रित कही जाती है, यदि वह क्रम से ध्रुव, मृदु, क्षिप्र, उग्र, चर, क्रूर या मिश्रित नक्षत्र से युक्त हो।

नक्षत्र युक्त संक्रांति
27 या 28 नक्षत्र सात भागों में विभाजित हैं- ध्रुव (या स्थिर)- उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपदा, रोहिणी, मृदु- अनुराधा, चित्रा, रेवती, मृगशीर्ष, क्षिप्र (या लघु)- हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित, उग्र- पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपदा, भरणी, मघा, चर- पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, स्वाति, शतभिषक क्रूर (या तीक्ष्ण)- मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, मिश्रित (या मृदुतीक्ष्ण या साधारण)- कृत्तिका, विशाखा। उक्त वार या नक्षत्रों से पता चलता है, कि इस बार की संक्रांति कैसी रहेगी।

देवताओं का दिन प्रारंभ
सनातन धर्म शास्त्रों के अनुसार, मकर संक्रांति से देवताओं का दिन आरंभ होता है, जो आषाढ़ मास तक रहता है। कर्क संक्रांति से देवताओं की रात प्रारंभ होती है। अर्थात देवताओं के एक दिन और रात को मिलाकर मनुष्‍य का एक वर्ष होता है। मनुष्यों का एक माह पितरों का एक दिन होता है। उनका दिन शुक्ल पक्ष और रात कृष्ण पक्ष होती है।

सौर वर्ष का दिन प्रारंभ
मकर संक्रांति से सौर वर्ष के दिन का आरंभ माना जाता है। हालांकि, सौर नववर्ष सूर्य के मेष राशि में जाने से प्रारंभ होता है। सूर्य जब एक राशि ने निकल कर दूसरी राशि में प्रवेश करता है, तब दूसरा माह प्रारंभ होता है।
12 राशियां सौर मास के 12 माह है। वास्तव में, हिन्दू धर्म में कैलेंडर सूर्य, चंद्र और नक्षत्र पर आधारित है। सूर्य पर आधारित को सौरवर्ष, चंद्र पर आधारित को चंद्रवर्ष और नक्षत्र पर आधारिक को नक्षत्र वर्ष कहते हैं। जिस तरह चंद्र वर्ष के माह के दो भाग होते हैं- शुक्ल और कृष्ण पक्ष, उसी तरह सौर वर्ष के दो भाग होते हैं- उत्तरायण और दक्षिणायन। सौर वर्ष का पहला माह मेष होता है, जबकि चंद्रवर्ष का महला माह चैत्र होता है। नक्षत्र वर्ष का पहला माह चित्रा होता है।

गीता में लिखे मकर संक्रांति के तीन रहस्य
सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में संक्रमण करने को संक्रांति कहते हैं। वर्ष में 12 संक्रांतियां होती हैं, जिसमें 4 संक्रांति मेष, तुला, कर्क और मकर संक्रांति ही प्रमुख मानी गई हैं। मकर संक्रांति के दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है, इसीलिए इसे मकर संक्रांति कहते हैं। गीता में इसका क्या महत्व है-  

उत्तरायण में शरीर त्यागने से नहीं होता पुनर्जन्म
मकर संक्रांति के दिन सूर्य उत्तरायण होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरायन का महत्व बताते हुए गीता में कहा है- उत्तरायन के 6 मास के शुभ काल में, जब सूर्य देव उत्तरायन होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय रहती है, तो इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता। ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त हैं। इसके विपरीत सूर्य के दक्षिणायण होने पर पृथ्वी अंधकारमय होती है और इस अंधकार में शरीर त्याग करने पर पुनः जन्म लेना पड़ता है। यही कारण था, भीष्म पितामह ने शरीर तब तक नहीं त्यागा था, जब तक कि सूर्य उत्तरायन नहीं हो गया। माना जाता है, उत्तरायण में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति को सद्गति मिलती है।

देवताओं का दिन प्रारंभ

सनातन हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार, मकर संक्रांति से देवताओं का दिन आरंभ होता है, जो आषाढ़ मास तक रहता है। कर्क संक्रांति से देवताओं की रात प्रारंभ होती है। अर्थात देवताओं के एक दिन और रात को मिलाकर मनुष्‍य का एक वर्ष होता है। मनुष्यों का एक माह पितरों का एक दिन होता है। उनका दिन शुक्ल पक्ष और रात कृष्ण पक्ष होती है।

दो मार्ग का वर्णन
दो पक्ष हैं- शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। देवयान और पितृयान। देवयान में ज्योतिर्मय अग्नि-अभिमानी देवता हैं, दिन का अभिमानी देवता है, शुक्ल पक्ष का अभिमानी देवता है और उत्तरायण के छः महीनों का अभिमानी देवता है। उस मार्ग में मर कर गए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाए जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। पितृयान में धूमाभिमानी देवता है, रात्रि अभिमानी देवता है तथा कृष्ण पक्ष का अभिमानी देवता है और दक्षिणायन के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गया हुआ सकाम कर्म करने वाला योगी उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले गया हुआ चंद्रमा की ज्योत को प्राप्त होकर स्वर्ग में अपने शुभ कर्मों का फल भोगकर वापस आता है, लेकिन जिनके शुभकर्म नहीं हैं वे उक्त दोनों मार्गों में गमन नहीं करके अधोयोनि में गिर जाते हैं। 
 उक्त लेख में लेखक का अपना विचार, शोध व अध्ययन है - संपादक "धर्म नगरी", DN News   

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