लोहड़ी : फसल कटाई से जुड़ा पर्व आज मनाई जा रही है, जाने आग जलाने का शुभ-समय, पूजा-विधि और मान्यताएं
लोहिड़ी "फसलों के पकने की प्रसन्नता" का प्रतीक है
(W.app- 8109107075 न्यूज़, कवरेज करने, अपने नाम से कॉपियाँ बटवायें या कॉपी फ्री पाने हेतु )फसलों का पर्व लोहड़ी आज (13 जनवरी) मनाया जा रहा है। लोहड़ी उत्तर भारत, विशेषकर पंजाबी और सिख समाज का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे हर वर्ष 13 जनवरी को पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में यह पर्व मुख्य रूप से मनाया जाता है।
देशभर में प्रतिवर्ष मकर संक्रांति से एक दिन पहले शाम को धूमधाम से लोहड़ी का त्योहार मनाते हैं। लोहड़ी "त्यौहार फसलों के पकने की प्रसन्नता" का प्रतीक है।
लोहड़ी के लिए कई दिनों पहले से ही लकड़ियां इकट्ठा की जाती हैं। पंजाब में तो बच्चे लोक गीत गाते हुए घर-घर जाकर लोहड़ी के लिए लकड़ियां जुटाते हैं। इन लकड़ियों को किसी खुले और बड़े स्थान पर रखा जाता है, अधिकाधिक लोग वहां इकट्ठा हों और सबके साथ पर्व मना सकें। लोहड़ी की रात सभी लोग लकड़ियों के इस झुंड के चारों ओर इकट्ठा होते हैं, फिर पारंपरिक रूप से आग लगाई जाती है। साथ ही अग्नि की परिक्रमा करते हैं।अग्नि के चारों ओर लोग नाचते-गाते हुए उसमें मूंगफली, गजक, पॉपकॉर्न, मक्का और रेवड़ी की आहुति देते हैं। इस दौरान पारंपरिक लोक गीतों को गाया जाता है। लोहड़ी आपसी प्रेम और एकता का संदेश भी देता है।
फसल कटाई से जुड़ा होने के कारण यह पर्व किसानों के लिए विशेष महत्व रखता है। लोहड़ी को सर्दियों के विदा होने और बसंत ऋतु के आगमन का संकेत भी माना जाता है। ऐसी मान्यता है, कि लोहड़ी के दिन साल की सबसे लंबी अंतिम रात्रि होती है और अगले दिन से धीरे-धीरे दिन बढ़ने लगते हैं।
इस दिन शाम के समय घरों के बाहर या खुले स्थान पर लकड़ियों से आग जलाई जाती है। लोग पारंपरिक गीत गाते हैं और परिवार एवं समाज के साथ आनंद के पल साझा करते हैं। लोग अग्नि देव को मूंगफली, रेवड़ी, तिल, गजक और मक्का अर्पित करते हैं तथा परिवार की सुख-समृद्धि और अच्छी फसल की कामना करते हैं।
लोहड़ी जलाने का शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में लोहड़ी की अग्नि जलाने का शुभ समय 13 जनवरी शाम 5:43 बजे से 7:15 बजे तक रहेगा। इस अवधि अग्नि प्रज्वलित कर उसकी 7 या 11 बार परिक्रमा करना शुभ माना जाता है।
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✔ शाम के समय घर के बाहर लकड़ियां एकत्र कर उनका ढेर बना लें।
✔ शुभ मुहूर्त में उस ढेर में अग्नि प्रज्वलित करें।
✔ दुल्ला भट्टी की कथा का स्मरण करें और लोहड़ी की आग के चारों ओर 7 या 11 बार परिक्रमा करें।
✔ अग्नि में मूंगफली, तिल-गुड़, गजक, मक्का और रेवड़ी अर्पित करें।
✔ इसके बाद भांगड़ा, गिद्दा और लोकगीतों के साथ पर्व का आनंद लें।
✔ प्रसाद के रूप में रेवड़ी, मूंगफली और गजक सभी में बांटी जाती है।
✔ इस दिन घरों में पारंपरिक रूप से मक्के की रोटी और सरसों का साग भी बनाया जाता है।
लोहड़ी मनाने की मान्यता
लोहड़ी मनाने को लेकर कई मान्यताएं हैं। पहली मान्यता, एक पौराणिक मान्यता प्रजापति दक्ष और उनकी पुत्री सती से जुड़ी है। राजा दक्ष ने भगवान शिव का तिरस्कार करते हुए उन्हें यज्ञ में शामिल नहीं किया तो पति की उपेक्षा देखकर माता सती ने उसी अग्निकुंड में प्राणों की आहुति दे दी। मान्यता है कि तब से प्राश्चित स्वरूप लोहड़ी का त्योहार मनाते हैं। इसी कारण लोहड़ी के मौके पर विवाहित कन्याओं को घर पर आमंत्रित करके उनका सम्मान किया जाता है।
माघ मेला प्रयागराज, संगम क्षेत्र में लगाए जा रहे स्टीकर-
दूसरी, मान्यता श्रीकृष्ण से जुड़ी
पहली मान्यता के अनुसार, लोहड़ी से जुड़ी दूसरी मान्यता श्रीकृष्ण की है। कथा है, कि मकर संक्रांति की तैयारियों में सभी गोकुल वासी व्यस्त थे और कंस बाल कृष्ण को मारने के लिए साजिश रच रहा था। संक्रांति से एक दिन पहले कंस ने भगवान श्रीकृष्ण को मारने के लिए लोहिता नामक राक्षसी को गोकुल भेजा। कान्हा ने खेल-खेल में ही लोहिता राक्षसी को मार दिया। इसी खुशी में लोहड़ी का पर्व मनाते हैं।
तीसरी मान्यता, मुगल काल से जुड़ी
लोहड़ी को लेकर तीसरी मान्यता अकबर के शासन काल की है। कहते हैं अकबर के शासन काल में दुल्ला भट्टी नाम का शख्स पंजाब प्रांत में रहता था। वहीं संदल बार (पाकिस्तान) नाम की जगह थी, जहां गरीब लड़कियों को अमीरों को बेचा जाता था। गांव के ठेकेदार ने किसान सुंदर दास की दो बेटियों सुंदरी और मुंदरी से शादी के लिए उसे धमकाया। जब दुल्ला भट्टी को यह बात पता चली तो उसने ठेकेदार के खेत को जला दिया और किसान की मर्जी से उसकी दोनों बेटियों की शादी कराई। तब से लोहड़ी का पर्व मनाया जाने लगा।
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