वर्ष 2026 में विवाह मुहूर्त वाले हैं 55 दिन, विवाह का ऋग्वेद व अथर्ववेद में है काव्यात्मक वर्णन, नवंबर में है...
- विवाह संस्कार का ऋग्वेद व अथर्ववेद में है काव्यात्मक वर्णन
- विवाह की आयु और हिन्दुओं के गायब होते रिश्ते
परिग्रहण संस्कार (विवाह) के लिए वर्ष 2026 में 55 शुभ मुहूर्त हैं, जिनका आरंभ फाल्गुन कृष्ण तृतीया (4 फरवरी) से होगा। वहीं, नवंबर माह में सर्वाधिक 11 दिन विवाह के मुहूर्त होंगे। जनवरी में शुक्र अस्त और अगस्त-अक्टूबर में चातुर्मास के कारण कोई मुहूर्त नहीं है। वर्ष में चार ग्रहण लगेंगे, जिनमें केवल तीन मार्च का चंद्र-ग्रहण भारत में प्रभावी होगा। नववर्ष का शुभारंभ गुरु-प्रदोष के शुभ संयोग से हो रही है।
वर्ष-2026 में विवाह के 55 शुभ मुहूर्त बताए जा रहे हैं। चार फरवरी को सूर्य के तुला राशि में प्रवेश करने के साथ विवाह के शुभ मुहूर्त आरंभ हो जाएंगे।2026 में नवंबर में सबसे अधिक शुभ मुहूर्त 11 दिन रहेंगे। इसी तरह फरवरी में पांच और मार्च में चार दिन विवाह के मुहूर्त रहेंगे। जबकि अप्रैल में छह दिन विवाह मुहूर्त हैं।
मई में सात दिन, जून माह में आठ दिन, जुलाई में सात दिन, सितंबर माह में एक दिन, नवंबर में 11 दिन और दिसंबर में छह दिन शुभ विवाह के मुहूर्त हैं। यद्यपि, 2026 के पहले माह जनवरी में शुक्र ग्रह के अस्त होने के कारण एक भी दिन विवाह मुहूर्त नहीं है। इसके अलावा अगस्त व अक्टूबर में चातुर्मास काल में वैवाहिक मांगलिक कार्य वर्जित रहेंगे।
वर्ष 2026 का आरंभ प्रदोष के साथ हो रही है। एक जनवरी को धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रदोष पड़ रहा है। यह भगवान शिव को समर्पित व्रत है। वर्ष का पहला दिन बृहस्पतिवार होने से गुरु-प्रदोष का संयोग बन रहा है। इस संयोग में भगवान शिव और विष्णु की संयुक्त आराधना से दोगुना फल प्राप्त होगा। यह संयोग प्रातःकाल आरंभ होकर 5:11 बजे तक रहेगा। शाम 5:12 बजे से रात तक शुक्ल योग रहेगा। शुक्ल योग को नए कार्य, निवेश और शुभ आरंभ के लिए अनुकूल माना जाता है।
वा.एप- 8109107075 "धर्म नगरी" की फ्री मंगवाने या अपने नाम बटवाने-भिजवाने हेतु
वर्ष-2026 में विवाह के 55 शुभ मुहूर्त बताए जा रहे हैं। चार फरवरी को सूर्य के तुला राशि में प्रवेश करने के साथ विवाह के शुभ मुहूर्त आरंभ हो जाएंगे।2026 में नवंबर में सबसे अधिक शुभ मुहूर्त 11 दिन रहेंगे। इसी तरह फरवरी में पांच और मार्च में चार दिन विवाह के मुहूर्त रहेंगे। जबकि अप्रैल में छह दिन विवाह मुहूर्त हैं।
मई में सात दिन, जून माह में आठ दिन, जुलाई में सात दिन, सितंबर माह में एक दिन, नवंबर में 11 दिन और दिसंबर में छह दिन शुभ विवाह के मुहूर्त हैं। यद्यपि, 2026 के पहले माह जनवरी में शुक्र ग्रह के अस्त होने के कारण एक भी दिन विवाह मुहूर्त नहीं है। इसके अलावा अगस्त व अक्टूबर में चातुर्मास काल में वैवाहिक मांगलिक कार्य वर्जित रहेंगे।
वर्ष 2026 का आरंभ प्रदोष के साथ हो रही है। एक जनवरी को धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रदोष पड़ रहा है। यह भगवान शिव को समर्पित व्रत है। वर्ष का पहला दिन बृहस्पतिवार होने से गुरु-प्रदोष का संयोग बन रहा है। इस संयोग में भगवान शिव और विष्णु की संयुक्त आराधना से दोगुना फल प्राप्त होगा। यह संयोग प्रातःकाल आरंभ होकर 5:11 बजे तक रहेगा। शाम 5:12 बजे से रात तक शुक्ल योग रहेगा। शुक्ल योग को नए कार्य, निवेश और शुभ आरंभ के लिए अनुकूल माना जाता है।
-----------------------------------------------
प्रयागराज माघ मेला-2026 विशेषांक
शिविर का आयोजन एवं माघ मेले पर केंद्रित "धर्म नगरी माघ मेला-2026" के चार विशेषांक निकाले जाएंगे। इनका वितरण मेले में शिविरों में सन्तों धर्माचार्यों आदि को, मेला क्षेत्र में स्थित विभिन्न कार्यालयों, सरकारी एवं निजी प्रदर्शनियों आदि को फ्री या "सौजन्य से..." होगा। इसके साथ मेला क्षेत्र में बनने वाले 42 पार्किंग, मेले में आने वाली कार, बस आदि निजी वाहनों में तीर्थयात्रियों, श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को दिया जाएगा, जिस प्रकार प्रयागराज महाकुंभ-2025 पर "धर्म नगरी" के तीन विशेषांकों को बांटा गया।
प्रयागराज माघ मेला-2026 के विशेषांको में आप भी संगम क्षेत्र के आयोजित अपने शिविर (कैम्प) की जानकारी, शिविर में होने वाले कार्यक्रम, सारगर्भित लेख, अपने आश्रम मठ की गतिविधियां आदि प्रकाशित करवा सकते हैं। इसके साथ अपने नाम से विशेषांक बटवा सकते हैं (देखें ऊपर बायीं कोने)। संपर्क करें +91 8109107075-वाट्सएप ईमेल- dharm.nagari@gmail.com
-----------------------------------------------
माह के अनुसार विवाह मुहूर्त-
फरवरी 4, 5, 10, 20, 21
मार्च 9, 10, 11, 12
अप्रैल 20, 21, 25, 26, 29, 30
मई 5, 6, 7, 8, 9, 10, 13
जून 19, 20, 22, 23, 24, 26, 27, 29
जुलाई 1, 3, 4, 6, 8, 9, 11
सितंबर 21
नवंबर 2, 3, 10, 11, 12, 13, 21, 22, 24, 25, 26
दिसंबर 2, 3, 4, 5, 11, 12
फरवरी 4, 5, 10, 20, 21
मार्च 9, 10, 11, 12
अप्रैल 20, 21, 25, 26, 29, 30
मई 5, 6, 7, 8, 9, 10, 13
जून 19, 20, 22, 23, 24, 26, 27, 29
जुलाई 1, 3, 4, 6, 8, 9, 11
सितंबर 21
नवंबर 2, 3, 10, 11, 12, 13, 21, 22, 24, 25, 26
दिसंबर 2, 3, 4, 5, 11, 12
विवाह संस्कार हिन्दू धर्म संस्कारों में 'त्रयोदश संस्कार' है। स्नातकोत्तर जीवन विवाह का समय होता है, अर्थात विद्याध्ययन के पश्चात विवाह करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना होता है। यह संस्कार पितृ ऋण से उऋण होने के लिए किया जाता है। मनुष्य जन्म से ही तीन ऋणों से बंधकर जन्म लेता है- 'देव ऋण', 'ऋषि ऋण' और 'पितृ ऋण'। इनमें से अग्रिहोत्र अर्थात यज्ञादिक कार्यों से देव ऋण, वेदादिक शास्त्रों के अध्ययन से ऋषि ऋण और विवाहित पत्नी से पुत्रोत्पत्ति आदि के द्वारा पितृ ऋण से उऋण हुआ जाता है।
विवाह दो शब्दों से मिलकर बना है- वि + वाह। अत: इसका शाब्दिक अर्थ है- "विशेष रूप से (उत्तरदायित्व का) वहन करना।" पाणिग्रहण संस्कार को सामान्य रूप से 'हिन्दू विवाह' के नाम से जाना जाता है। अन्य धर्मों में विवाह पति और पत्नी के बीच एक प्रकार का करार होता है, जिसे विशेष परिस्थितियों में तोड़ा भी जा सकता है। परंतु हिन्दू विवाह पति और पत्नी के बीच जन्म-जन्मांतरों का सम्बंध होता है, जिसे किसी भी परिस्थिति में नहीं तोड़ा जा सकता। अग्नि के सात फेरे लेकर और ध्रुव तारे को साक्षी मान कर दो तन, मन तथा आत्मा एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं। हिन्दू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक सम्बन्ध से अधिक आत्मिक सम्बन्ध होता है और इस सम्बन्ध को अत्यंत पवित्र माना गया है।
सनातन धर्म शास्त्रों में संपूर्ण हिंदू जीवन पद्धति के उदात्त और श्रेष्ठ आधार एवं आदर्श दिये गए हैं। विवाह के विषय में भी शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार किसी भी प्रकार का विवाह या किसी भी प्रकार का नर नारी संबंध अवैध नहीं होता और किसी भी प्रकार का शिशु अवैध नहीं होता। केवल उसके स्वरूप के आधार पर उसका स्तर यानी उसकी कैटेगरी का निर्धारण अवश्य होता है।
ब्रह्म विवाह- अच्छे शील स्वभाव व उत्तम कुल के वर से कन्या का विवाह उसकी सहमति व वैदिक रीति से करना ब्रह्मा विवाह कहलाता है। इसमें वर व वधु से किसी तरह की जबरदस्ती नहीं होती। कुल व गोत्र का विशेष ध्यान रखकर ये विवाह शुभ मुहूर्त में किया जाता है।
देव विवाह- यज्ञ में सही प्रकार से कर्म करते हुए ऋत्विज को अलंकृत कर कन्या देने को देव विवाह कहते हैं। कन्या की सहमति से इस विवाह में उसे किसी उद्देश्य, सेवा, धार्मिक कार्य या मूल्य के रूप में वर को सौंपा जाता है।
आर्ष विवाह- धर्म के लिए वर से एक या दो जोड़े गाय व बैल के लेकर कन्या को पूरे विधि विधान से उसे सौंपना आर्ष विवाह कहलाता है। यह ऋषि विवाह से संबंध रखता है।
प्रजापत्य विवाह- पूजन के बाद पिता ये कहते हुए कन्या दान करे कि ‘तुम दोनों एक साथ गृहस्थ धर्म का पालन करो’ तो ये विवाह प्रजापत्य विवाह कहलाता है। याज्ञवल्क्य के अनुसार इस विवाह से उत्पन्न संतान अपनी पीढ़ियों को पवित्र करने वाली होती है।
असुर विवाह- कन्या के पिता या परिवार को धन या अन्य संपत्ति देकर मनमर्जी से कन्या को ग्रहण करना आसुरी विवाह कहता है। इसमें कन्या की मजी या नामर्जी का ध्यान नहीं रखा जाता।
राक्षस विवाह- जब कन्या से मारपीट करते हुए उसका जबरदस्ती अपहरण कर उससे विवाह रचाया जाए तो वह राक्षस विवाह होता है। रावण ने सीता के साथ इसी तरह विवाह का प्रयास किया था।
पैशाच विवाह- सोई हुई, नशे में मतवाली, मानसिक रूप से कमजोर कन्या को उसकी स्थिति का लाभ उठाकर ले जाना और फिर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाकर विवाह करना पैशाच विवाह कहलाता है। ये विवाह सबसे निम्न कोटि का बताया गया है।
ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में वर्णन
सोलह संस्कारों में विवाह संस्कार (पाणिग्रहण संस्कार) अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में वैवाहिक विधि-विधानों की काव्यात्मक अभिव्यक्ति का वर्णन किया गया है। गृहस्थाश्रम का आधार ही विवाह संस्कार है। इस संस्कार के बाद वर-वधू अपने नए जीवन में प्रवेश करते हैं। यह केवल एक संस्कार नहीं है बल्कि यह एक पूरी व्यवस्था है। इसी संस्कार के बाद से मनुष्य के चार आश्रमों में सबसे अहम आश्रम यानी गृहस्थ आश्रम का आरंभ होता है। इस संस्कार को समावर्तन संस्कार के बाद किया जाता है। अपनी शिक्षा दीक्षा को पूरा कर जातक गृहस्थ आश्रम की ओर बढ़ता है। इसी संस्कार से व्यक्ति पितृऋण से भी मुक्त हो जाता है।
विवाह को सनातन धर्म में पवित्र संस्कार माना गया है, जिसके विधि व विधान के अलावा शास्त्रों में आठ प्रकार भी बताए गए हैं। विवाह के ये प्रकार- ब्रह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, असुर, गन्धर्व, राक्षस व पैशाच है। इनमें ब्रह्म विवाह को सबसे अच्छा माना गया है। भविष्य पुराण सहित कई धर्म शास्त्रों में विवाह की रीति व नीति के बारे में बताया गया है। हिंदू धर्म में विवाह के 8 प्रकार हैं-
ब्रह्म विवाह- अच्छे शील स्वभाव व उत्तम कुल के वर से कन्या का विवाह उसकी सहमति व वैदिक रीति से करना ब्रह्मा विवाह कहलाता है। इसमें वर व वधु से किसी तरह की जबरदस्ती नहीं होती। कुल व गोत्र का विशेष ध्यान रखकर ये विवाह शुभ मुहूर्त में किया जाता है।
देव विवाह- यज्ञ में सही प्रकार से कर्म करते हुए ऋत्विज को अलंकृत कर कन्या देने को देव विवाह कहते हैं। कन्या की सहमति से इस विवाह में उसे किसी उद्देश्य, सेवा, धार्मिक कार्य या मूल्य के रूप में वर को सौंपा जाता है।
आर्ष विवाह- धर्म के लिए वर से एक या दो जोड़े गाय व बैल के लेकर कन्या को पूरे विधि विधान से उसे सौंपना आर्ष विवाह कहलाता है। यह ऋषि विवाह से संबंध रखता है।
प्रजापत्य विवाह- पूजन के बाद पिता ये कहते हुए कन्या दान करे कि ‘तुम दोनों एक साथ गृहस्थ धर्म का पालन करो’ तो ये विवाह प्रजापत्य विवाह कहलाता है। याज्ञवल्क्य के अनुसार इस विवाह से उत्पन्न संतान अपनी पीढ़ियों को पवित्र करने वाली होती है।
असुर विवाह- कन्या के पिता या परिवार को धन या अन्य संपत्ति देकर मनमर्जी से कन्या को ग्रहण करना आसुरी विवाह कहता है। इसमें कन्या की मजी या नामर्जी का ध्यान नहीं रखा जाता।
राक्षस विवाह- जब कन्या से मारपीट करते हुए उसका जबरदस्ती अपहरण कर उससे विवाह रचाया जाए तो वह राक्षस विवाह होता है। रावण ने सीता के साथ इसी तरह विवाह का प्रयास किया था।
पैशाच विवाह- सोई हुई, नशे में मतवाली, मानसिक रूप से कमजोर कन्या को उसकी स्थिति का लाभ उठाकर ले जाना और फिर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाकर विवाह करना पैशाच विवाह कहलाता है। ये विवाह सबसे निम्न कोटि का बताया गया है।
ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में वर्णन
सोलह संस्कारों में विवाह संस्कार (पाणिग्रहण संस्कार) अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में वैवाहिक विधि-विधानों की काव्यात्मक अभिव्यक्ति का वर्णन किया गया है। गृहस्थाश्रम का आधार ही विवाह संस्कार है। इस संस्कार के बाद वर-वधू अपने नए जीवन में प्रवेश करते हैं। यह केवल एक संस्कार नहीं है बल्कि यह एक पूरी व्यवस्था है। इसी संस्कार के बाद से मनुष्य के चार आश्रमों में सबसे अहम आश्रम यानी गृहस्थ आश्रम का आरंभ होता है। इस संस्कार को समावर्तन संस्कार के बाद किया जाता है। अपनी शिक्षा दीक्षा को पूरा कर जातक गृहस्थ आश्रम की ओर बढ़ता है। इसी संस्कार से व्यक्ति पितृऋण से भी मुक्त हो जाता है।
विवाह की आयु और हिन्दुओं के गायब होते रिश्ते
कानूनी रूप से विवाह हेतु लड़की की आयु 18 वर्ष और लड़के की 21 वर्ष नियुक्त की गई है, जिसे एक वर्ग अनुचित मानता है, यह तर्क देते हुए, कि बायोलॉजिकल रूप से लड़का या लड़की दोनों ही 18 वर्ष की आयु में विवाह योग्य हो जाते हैं। वहीं, बीते डेढ़-दो दशक से अधिकांश हिन्दुओं के विवाह बहुत देर से होने लगे हैं- लड़का जब 28-30 या 32-33 का हो जाता है, तब लड़का या उसके घर वाले विवाह करते हैं। इसी प्रकार लड़की की 26-27 या 30-32 होने पर घर वाले विवाह हेतु वर की खोज में चिंतित होते है।
ऐसे में विवाहित हिन्दू पति-पत्नी जब औसतन 55-56 साल के रिटायरमेंट एज के आसपास हो जाते हैं, तब उनकी संतान कानूनी रूप से बालिग (18 वर्ष की) होती है। इससे भी बड़ा दोष एवं निम्न विचार अधिकांश हिन्दू परिवारों में एक संतान की सोच का है। एक संतान के कारण एकलौते बच्चे का संपूर्ण विकास नहीं हो रहा है, मौसी, मामी, चाची, ताई, फूफा-बुआ आदि के रिश्ते समाप्त होते जा रहे हैं। ये रिश्ते और उनका महत्व एक हिन्दू घर, परिवार क्या हैं, या नई पीढ़ी के जान नहीं पा रहे। इसका ठीक विपरीत कट्टर सोच रखने वाले मजहबी लोगों में हैं, जिनकी बहुत शादी हो जाती है और 29-30 साल की उम्र होते-होते औसतन 4-5 बच्चे हो जाते हैं। सरकार बनाने की होड़ में शारीरिक रूप से स्वस्थ्य, अनेक बच्चे पैदा करने पर रोक न होने के बावजूद फ्री का राशन, बैंक खाते में सीधे सरकारी रुपया पहुंचना विशेष रूप से जिम्मेदार हैं। इन परिस्थितियों के लिए समग्र हिन्दू समाज की उदासीनता, सबकुछ सहन करते जाने की मानसिकता एवं मुखर होकर विरोध न करने की प्रवृत्ति भी जिम्मेदार है।
अपनी प्रतिक्रिया नीचे कॉलम में अवश्य दें
हिन्दू विवाह एक संस्कार हुआ करता था, किन्तु भारत सरकार के हिन्दू-विरोधी एवं मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते हिन्दू विवाह अधिनियम-1955 लाया गया। अधिनियम के अनुसार विवाह न संस्कार है और न ही संविदा । अपितु यह दोनों का समन्वय हो गया है। भारत सरकार के इस अधिनियम से निश्चित रूप से हिन्दू भावनाओं को आघात पहुंचा, क्योंकि यह हिंदू धर्म की मूल भावानाओं का अतिक्रमण करता है तथा संविधान की मूल भावनाओं का उल्लंघन करता है।
हिन्दू विवाह जहां जन्म जन्मान्तर का संबंध माना जाता था, जिसे एक खेल का रूप देते हुए हिंदुओं की प्राचीन पद्धति को न्यायालय के मुहाने पर खड़ा कर दिया गया, जिसे परमात्मा भी भेद नहीं सकते थे। महाभारत में स्त्री पुरुष का अर्थ भाग है, पुरुष बिना स्त्री के पूर्णतः प्राप्त नही कर सकता है। धर्म के लिये पुरूष तथा उपयोगी होता है, जबकि उसके साथ उसकी धर्मपत्नी साथ हो, अन्यथा पुरुष कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो वह धार्मिक आयोजनों का पात्र नहीं हो सकता है।
रामायण में श्रीराम भी सीता के बिना धार्मिक आयोजन के योग्य नहीं हुए थे। रामायण कहती है, कि पत्नी को पति की आत्मा का स्वरूप माना गया है। पति अपनी पत्नी भरण पोषणकर्ता तथा रक्षक है। हिन्दू बड़े-बुजुर्ग मानते हैं, कि हिन्दू विवाह एक ऐसा बंधन है, जिसमें जो शरीर एकनिष्ठ हो जाते है, किन्तु वर्तमान कानून हिन्दू विवाह की ऐसी तैसी कर दिया है। हिन्दू विवाह को संस्कार से ज्यादा संविदात्मक रूप प्रदान कर दिया है, जो हिन्दू विवाह के स्वरूप को नष्ट करता है।
-----------------------------------------------
इसे भी पढ़ें / देखें-
प्रयागराज माघ मेला : पौष पूर्णिमा से मेले का शुभारंभ, पूर्णिमा स्नान के साथ कल्पवास भी होगा प्रारंभ...☟
http://www.dharmnagari.com/2026/01/Prayagraj-Magh-Mela--Kalpwas-begins-with-Paush-Purnima-snan-Spl-trains-extra-buses.html
धूप से मिलने वाले विटामिन-डी के आश्चर्यजनक लाभ, जानकर हैरान हो जाएंगे, फिर आप भी लेने लगेंगे इस जाड़े में धूप
☟
https://www.dharmnagari.com/2025/12/Dhoop-Sun-rays-benefits-to-your-Health-Vitamin-D3-benefits.html
"धर्म नगरी" फ्री (कॉम्प्लिमेंट्री) कॉपी पाने हेतु अपना पूरा पता व्हाट्सएप करें। नियमित रूप से पाने हेतु वर्ष में एक बार अपने किसी परिजन, प्रिय व्यक्ति के जन्मदिन की बधाई आदि या पुरखे की पुण्यतिथि पर स्मरण करते हुए अपने सामर्थ्य के अनुसार अपने नाम से "धर्म नगरी" भिजवाएं। सहयोग राशि या विज्ञापन आपके बजट पर।राशि केवल "धर्म नगरी" के चालू खाते नंबर- 325397 99922 स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया SBI IFS Code- CBIN0007932 भोपाल) अथवा 8109107075 पर online पर करें। स्क्रीन शॉट व्हाट्सएप करें, जिससे आपकी शुभकामना आदि के साथ आपके नाम से "धर्म नगरी" भेजी या बटवाई जा सकें, जिसकी जानकारी आपको दी जाएगी।
प्रयागराज महाकुंभ-2025 के अवसर पर "धर्म नगरी" विशेषांक ChoiceFinX एप एवं www.bhoomiserenity.com बिल्डर्स के सौजन्य से FREE दी गई, महाकुंभ मेला क्षेत्र में शिविरों में फ्री बाटी गई। अब "धर्म नगरी" के नए पाठकों को ChoiceFinX एप एवं www.bhoomiserenity.com बिल्डर्स के सौजन्य देशभर में भेजी जाएगी। केवल आप अपने घर / कार्यालय पर का पूरा पता पोस्टल पिन कोड सहित sms या वाट्सएप 8109107075 करें।
कथा हेतु- व्यासपीठ की गरिमा एवं मर्यादा के अनुसार श्रीराम कथा, वाल्मीकि रामायण, श्रीमद भागवत कथा, शिव महापुराण या अन्य पौराणिक कथा करवाने हेतु संपर्क करें। कथा आप अपने बजट या आर्थिक क्षमता के अनुसार शहरी या ग्रामीण क्षेत्र में अथवा विदेश में करवाएं, हमारा कथा के आयोजन की योजना, मीडिया-प्रचार आदि में सहयोग रहेगा। -प्रसार प्रबंधक "धर्म नगरी / DN News" मो.9752404020, 8109107075-वाट्सएप ट्वीटर इंस्टाग्राम- @DharmNagari ईमेल- dharm.nagari@gmail.com यूट्यूब- #DharmNagari_News




Post a Comment