होलाष्टक : आठ दिनों ग्रह उग्र रहते हैं, जिससे नकारात्मकता अधिक होने से नहीं मन और बुद्धि स्थिर नहीं रहता, इसलिए...


...होलाष्टक में नहीं करते कोई शुभ कार्य
- होलाष्टक में पूजा-पाठ, जप दान होते हैं प्रभावी
- आठ दिनों आप भी करें विशेष उपाय, जीवन की समस्या को दूर करें 
- घर की नकारात्मता दूर करने, आर्थिक, व्यापारिक या अन्य समस्याओं को कम करने या उनके प्रभाव को कम करने 
धर्म नगरी / DN News

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राजेश पाठक*

होलिका दहन से पहले आठ दिनों तक, जब सभी शुभ कार्य वर्जित हो (रोक लग) जाते हैं, वो आठ दिन 'होलाष्टक' होते हैं। होलाष्टक दो शब्दों से मिलकर बना है- 'होली' और 'अष्टक।' अष्टक का अर्थ होता है आठ। शास्त्रों के अनुसार, फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर पूर्णिमा (जिस दिन होलिका दहन होता है) तक का समय होलाष्टक कहा जाता है। इस बार यह समय 24 फरवरी से 2 मार्च 2026 की मध्यरात्रि (होलिका दहन) तक रहेगा। इन आठ दिनों में वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव अधिक होता है, इसलिए कोई भी नया या मंगल कार्य करना वर्जित माना गया है।
 
क्यों नहीं करते होलाष्टक में शुभ कार्य ?
होलाष्टक के समय (आठ दिनों तक) सौरमंडल के प्रमुख ग्रह उग्र (Negatively Active) हो जाते हैं। जब ये सभी ग्रह उग्र अवस्था में होते हैं, तो व्यक्ति निर्णय लेने की क्षमता (Decision Making) कमजोर हो जाती है। ऐसे समय में किए गए कार्यों में बाधा आने की संभावना रहती है और वे लंबे समय तक शुभ फल नहीं देते। यही कारण है, होलाष्टक में मन और बुद्धि स्थिर नहीं रहता। 

होलाष्टक के दिनों को मानसिक संयम और साधना का समय माना गया है।ज्योतिष मान्यता के अनुसार, होलाष्टक में सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि और राहु जैसे ग्रहों का प्रभाव तीव्र रहता है। इस कारण इसे (होलाष्टक) शुभ कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता। यद्यपि पूजा-पाठ, जप और दान के लिए यह समय श्रेष्ठ बताया गया है।

ज्योतिर्विदों के अनुसार, होलाष्टक में अष्टमी पर चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी पर शनि, एकादशी पर शुक्र, द्वादशी पर बृहस्पति, त्रयोदशी पर बुध, चतुर्दशी पर मंगल और पूर्णिमा के दिन राहु उग्र अवस्था में होते हैं। इसी कारण इस समय महत्वपूर्ण कार्य से बचते हैं, क्योंकि ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव से सफलता प्रभावित होती है एवं जीवन में चुनौतियां आती हैं।

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होलाष्टक, भक्त प्रह्लाद और कामदेव
होलाष्टक को अशुभ मानने के पीछे प्रमुख रूप से दो पौराणिक प्रसंग माने जाते हैं- भक्त प्रह्लाद की पीड़ा और कामदेव का भस्म होना। होलाष्टक का सीधा संबंध भक्त प्रह्लाद के कष्टों से है। मान्यता है, प्राचीन काल में असुरराज हिरण्यकश्यप अपनी शक्ति के अहंकार में अंधा हो गया। वह चाहता था, कि पूरी दुनिया उसे ही भगवान माने, लेकिन उसका अपना पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद की भक्ति को भंग करने के लिए उन्हें आठ दिनों तक भयानक यातनाएं दीं।  पहले दिन से सातवें दिन, प्रह्लाद को ऊंचे पहाड़ों से नीचे फेंका गया, जहरीले सांपों के बीच छोड़ा गया, जंगली हाथियों के पैरों तले कुचलने का प्रयास किया गया। 

प्रह्लाद को भूखा-प्यासा रखा गया, लेकिन हर बार भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए। आठवें दिन (होलिका दहन) जब सारे प्रयास विफल हो गए, तब हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन 'होलिका' को बुलाया, जिसे आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। उस (फाल्गुन पूर्णिमा) दिन होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई। चमत्कार यह हुआ, कि वरदान के बावजूद पापी होलिका जलकर भस्म हो गई और अटूट विश्वास रखने वाले प्रह्लाद का बाल भी बांका नहीं हुआ। प्रह्लाद जिन आठ दिनों भीषण पीड़ा में थे, उन दिनों को शोक और संयम का प्रतीक मानकर कोई भी मांगलिक कार्य नहीं किया जाता है। 

एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान शिव गहन तपस्या में लीन थे। देवताओं के आग्रह पर कामदेव ने उनकी तपस्या भंग करने का प्रयास किया। इससे क्रोधित होकर शिव ने उन्हें भस्म कर दिया। बाद में रति के निवेदन पर शिव ने कामदेव को पुनर्जीवन का वर दिया। इस घटना को भी फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से जोड़कर देखा जाता है। इसलिए यह समय तप, संयम और साधना का माना गया। 

होलाष्टक में करें मंत्रों का जाप  
होलाष्टक के दिनों में ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करते रहना चाहिए। यदि आप महादेव शिव के भक्त हैं, तो शिवलिंग पर जल और दूध चढ़ाएं। ॐ नम: शिवाय मंत्र का जाप करें। हनुमानजी के भक्त है, तो हनुमान मंदिर में दीपक जलाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें। होलाष्टक के दिनों भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप बालगोपाल की भी विशेष पूजा करनी चाहिए। दक्षिणावर्ती शंख से भगवान का अभिषेक करें। कृं कृष्णाय नम: मंत्र का जाप करें। होलाष्टक के दिनों में नकारात्मकता ज्यादा सक्रिय रहती है, जिससे हमारे विचारों में बढ़ने वाली नकारात्मकता पर नियंत्रण, मन को शांत एवं सकारात्मक रखने के लिए ध्यान और भगवान का ध्यान भी करना चाहिए।

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होलाष्टक में क्या करें, क्या नहीं ? 
✔ होलाष्टक में धार्मिक कार्यों में सम्मिलित हों, पूजा-पाठ और ध्यान करें। भगवान का स्मरण शुभ फलदायी होगा,
✔ होलाष्टक में अपने ईष्ट की, बालगोपाल, भगवान विष्णु, हनुमानजी, भगवान नरसिंह की पूजा करें। होलाष्टक में दान का आपको कष्टों से मुक्ति दिला सकता है, इन दिनों हवन और यज्ञ आदि पूजा नहीं करनी चाहिए,
✔ धन संबंधी मामलों में शुभ फल के लिए "श्रीसूक्त" और "मंगल ऋण मोचन स्त्रोत" का जाप करें, इससे ऋण से मुक्ति मिलने के मार्ग खुलने लगेंगे,
✔ होलाष्टक में न तो नौकरी बदलनी चाहिए, न ही किसी नई जगह ज्वाइन करना चाहिए। इन आठ दिनों किसी को कर्ज देना चाहिए, न ही किसी से पैसे उधार लेने चाहिए। यदि आप पैसों का लेन-देन करते हैं, तो इससे आपसे मां लक्ष्मी रूठ सकती हैं, जिससे आपको हानि हो सकती है।

पूजा का विधान- होलाष्टक में भगवान नृसिंह की पूजा करने का विधान ग्रंथों में बताया गया है। मान्यता है, इससे रोग और दोष समाप्त होते हैं। इन दिनों, विशेषरूप से भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण पूजा का उल्लेख पुराणों में है। होलाष्टक के दिनों गोपाल और विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। होलाष्टक में नित्य स्नान करके भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार की पूजा एवं स्मरण करने से व्यक्ति जीवन में आ रही बड़ी से बड़ी समस्याओं से मुक्ति का मार्ग मिलता है, समस्या कम होने लगती है।

स्वास्तिक बनाएं- होलाष्टक के दिनों में प्रकृति में नकारात्मकता का प्रभाव होता हैं। स्वास्तिक में विघ्नों को हरने एवं अंमगल दूर करने की शक्ति निहित है। होलाष्टक के दिनों हल्दी चावल को पीसकर उसमें गंगाजल मिलाएं और अपने मुख्य द्वार पर स्वस्तिक या ॐ बनाएं। या फिर पांच रंग के गुलाल लेकर उनको मिलाकर उससे मुख्य द्वार के दोनों तरफ स्वास्तिक बनाएं, ऐसा करने से घर में नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश नही करेगी।

धूनी दें- यदि पति-पत्नी के बीच सदैव लड़ाई-झगड़े की स्थिति बनी रहती है या पारिवारिक क्लेश बना रहता हैं तो ऐसे में आपको होलाष्टक के आठ दिनों में प्रतिदिन देशी गाय के गोबर के कंडे में गुग्गल और कपूर डालकर पूरे घर में धूनी देना चाहिए। इससे घर में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है। साथ ही घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
होलाष्टक में... 
- होलाष्टक में किसी भी शुभ कार्य करने से बचें,
- होलाष्टक में नए घर में गृह-प्रवेश से नहीं करना चाहिए। कोई भी वाहन या सोने-चांदी की चीज आदि नहीं खरीदना चाहिए,
- विवाह एवं अन्य षोडस (16) संस्कार- मुंडन, अन्नप्राशन आदि इस समय करना निषिद्ध है,
- होलाष्टक में नया व्यापार नहीं शुरू करना चाहिए,
- बाल और नाखून काटना इन आठ दिनों में वर्ज‍ित माना जाता है,
- यथासंभव होलाष्टक में काले रंग के कपड़े न पहनें,
- होलाष्‍टक के आठ द‍िनों में कोई नया वाहन खरीदने सहित नई प्रोपर्टी, नया घर या दुकान आद‍ि से बचना चाहिए,
- होलाष्‍टक में तामस‍िक भोजन या नॉन वेजीटेर‍ियन खाना न खाएं,  
- यदि शेयर मार्केट से जुड़े हैं, तो इस अवधि में कोई नया इनवेस्‍टमेंट न करें। इस अवधि में 
बहुत संयम से ही काम लें,
- होलाष्‍टक में क‍िसी भी अनभिज्ञ (unknown) व्‍यक्‍ति से न कोई चीज लें, न खाएं। इस अवध‍ि में नकारात्‍मक ऊर्जा बहुत अधिक होती है। ऐसे में क‍िसी की दी हुई चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।

होलाष्टक में क्या न करें (होलाष्टक में वर्जित कार्य)-  
विवाह, सगाई व विदाई- होलाष्टक में विवाह करना सबसे बड़ा निषेध माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, इस समय ग्रहों की स्थिति वैवाहिक सुख में बाधा डाल सकती है। सगाई या रोका, गोद भराई जैसी रस्में इन दिनों नहीं करनी चाहिए। प्राचीन परंपराओं के अनुसार, विवाहित बेटी या नई बहू की विदाई, होलाष्टक के दिनों नहीं की जाता, क्योंकि इसे परिवार की सुख-समृद्धि के लिए अच्छा नहीं माना जाता। 
नया घर, गृह प्रवेश और भूमि पूजन- होलाष्टक में गृह-प्रवेश, मकान की खरीद या नई गाड़ी लेना टाला जाता है। अगर आपने नया घर खरीदा है या आप घर की नींव रखना चाहते हैं, तो होलाष्टक के समाप्त होने की प्रतीक्षा करें। इन दिनों घर में प्रवेश करने से मानसिक अशांति और आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ सकता है। होलाष्टक में घर की मरम्मत या नया कंस्ट्रक्शन शुरू करना भी शुभ नहीं माना जाता है। हाँ, पुराने अधूरे कामों को जारी रखा जा सकता है, लेकिन नई शुरुआत वर्जित है। 
मुंडन, नामकरण एवं यज्ञोपवीत संस्कार- सनातन धर्म के 16 संस्कारों में मुंडन, नामकरण और यज्ञोपवीत (जनेऊ) अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, जिसे होलाष्टक में स्थगित किया जाता है, क्योंकि इन संस्कारों को करने से बालक के स्वास्थ्य और स्वभाव पर ग्रहों का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। 
नया व्यापार, नई दुकान, बाजार में निवेश- यदि आप नई दुकान खोलना चाहते हैं, नया बिजनेस शुरू करना अथवा किसी बड़ी डील पर हस्ताक्षर करने वाले हैं, तो होलाष्टक (2 मार्च) तक इसे टाल दें। शेयर बाजार में इन दिनों में बड़ा निवेश करना या भूमि-भवन (Property) की रजिस्ट्री कराना हानिकारक हो सकता है।  
बहुमूल्य वस्तुओं की खरीदारी- सोना, चांदी, हीरा या कोई भी कीमती आभूषण इन दिनों में नहीं खरीदना चाहिए। नया वाहन कार, बाइक आदि खरीदना भी वर्जित माना जाता है।  
धार्मिक अनुष्ठान- धार्मिक अनुष्ठान किसी विशेष इच्छा की पूर्ति के लिए किए जाने वाले (काम्य कर्म) यज्ञ, हवन या अनुष्ठान इन दिनों में नहीं किए जाते। हालांकि, नियमित पूजा-पाठ और मंत्र जाप पर कोई रोक नहीं है। 

होलाष्टक में करें ये विशेष उपाय
होलाष्टक के आठ दिनों में सौभाग्य प्राप्ति के लिए चावल, केसर, घी से हवन करें और नवग्रह की शांति के लिए भगवान शिव का पंचामृत से अभिषेक करें और फिर महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। ऐसा करने से सौभाग्य में वृद्धि के साथ-साथ करियर में तरक्की के योग बनते हैं और स्वास्थ्य भी अच्छी रहती है।

नकारात्मक दोष दूर करने हेतु 
नौकरी एवं रोजगार संबंधी समस्याओं छुटकारा पाने या उसे दूर करने हेतु होलाष्टक में काले तिल, लोहे, काली उड़द दाल को काले कपड़े में बांधकर 28 फरवरी शनिवार को किसी व्यक्ति को दान में कर दें अथवा शनि मंदिर में अर्पित कर दें। साथ ही होलाष्टक की हर शाम को एक मिट्टी के दीपक में कपूर जलाएं और पूरे घर में दिखाएं। ऐसा करने से परिवार में व्याप्त नकारात्मक दोष दूर होता है, पारिवारिक सदस्यों में आपसी प्रेम बना रहता है।

आर्थिक समस्याओं से मुक्ति हेतु 
आर्थिक समस्याओं से मुक्ति के लिए होलाष्टक के दिनों में पीली सरसों, हल्दी गांठ, गुड़ व कनेर के फूल से हवन करें। इसके बाद श्रीसूक्त या मंगल ऋण मोचन स्त्रोत का पाठ करें। ऐसा करने से धन संपदा के योग बनते हैं और लक्ष्मी प्राप्ति होती है।

जीवन के कष्ट दूर करने हेतु 
नृसिंह भगवान की पूजा 
होलाष्टक के दिनों में करना बहुत उत्तम माना गया है। होलाष्टक में प्रतिदिन विधि-विधान से नृसिंह भगवान की पूजा से जीवन की समस्याएं दूर होती है। भगवान कृष्ण को रंग गुलाल चढ़ाने से सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

घर में माँ 
लक्ष्मी की कृपा हेतु 
लक्ष्मी प्राप्ति और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति और परिवार में सुख-शांति के लिए होलाष्टक के आठ दिन घर के मेन गेट के दोनों तरफ और मेन चौखट पर हल्दी और सिंदूर से स्वास्तिक बनाएं और सुबह-शाम दीपक जलाएं। ऐसा करने से होलाष्टक का नकारात्मक प्रभाव दूर रहता है और घर में मां लक्ष्मी का प्रवेश होता है।

सुख-सौभाग्य में वृद्धि हेतु 

होलाष्टक में प्रतिदिन 108 बेलपत्र पर सफेद चंदन से 'ॐ' या 'ॐ नमः शिवाय' लिखकर शिवलिंग पर अर्पित करने से 
जीवन में चल रही समस्याओं में कमी या मुक्ति मिलने लगती है। सायंकाल लाल कपड़े में नारियल बांधकर पास के किसी मंदिर की सीढ़ियों पर रख दें। ऐसा करने से सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होगी और पारिवारिक कष्टों से भी मुक्ति मिलेगी।

संतान प्राप्ति हेतु  
संतान प्राप्ति के लिए होलाष्टक के दिनों में प्रतिदिन श्रीकृष्ण के बालस्वरूप लड्डू गोपाल की पूजा-अर्चना करें। हर दिन पूजा-अर्चना के साथ थोड़ा गुलाल भी अर्पित करें। साथ ही श्रीकृष्ण के बीज मंत्र 'ॐ कृं कृष्णाय नम:' का 108 बार जप करें।

इस उपाय से मिलेगी रोगों से मुक्ति
अगर कोई रोग परेशान कर रहा है तो होलाष्टक के दिनों में रोग ग्रस्त व्यक्ति के उपर से पानीदार जटा वाला नारियल सिर से पैर तक सात या 11 बार उल्दी दिशा में घूमाकर किसी चौराहे पर फेंक दें। साथ ही डॉक्टर की सलाह भी लेते रहें। ऐसा करने से रोग में आराम मिलता है और बुरी शक्तियां भी दूर हो जाती हैं।
लेखक- 
*राजेश पाठक - अवैतनिक संपादक 
मो. 6261 868110  
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