चैत्र नवरात्रि : नया वर्ष, कैसे करें कलश, चौकी व जौ की स्थापना

 
धर्म नगरी /
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नवरात्रि के प्रत्येक दिन माँ भगवती के एक स्वरुप श्री शैलपुत्री, श्री ब्रह्मचारिणी, श्री चंद्रघंटा, श्री कुष्मांडा, श्री स्कंदमाता, श्री कात्यायनी, श्री कालरात्रि, श्री महागौरी, श्री सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। यह क्रम शुक्ल प्रतिपदा को प्रातःकाल शुरू होता है। प्रतिदिन जल्दी स्नान करके माँ भगवती का ध्यान तथा पूजन करना चाहिए। सर्वप्रथम कलश स्थापना की जाती है।

नवरात्रि का पहला दिन- प्रथमा या प्रतिपदा तिथि 19 मार्च सुबह 6:52 बजे लगेगी एवं 20 मार्च सुबह 4:52 बजे समाप्त होगी होगा।

चैत्र नवरात्रि : पूजन सामग्री 
- पूजा के लिए मां दुर्गा की नई मूर्ति या चित्र
- लाल रंग की चौकी और पीला वस्त्र, पूजा के लिए एक आसन
- माता रानी के लिए एक नई लाल रंग की चुनरी
- घट स्थापना हेतु मिट्टी का कलश, आम / अशोक की 5 हरी पत्तियां (कलश पर रखने के लिए)
- लाल सिंदूर, गुड़हल का फूल एवं अन्य लाल रंग के फूल, फूलों की माला
- माता रानी के लिए श्रृंगार सामग्री, एक नई साड़ी
- अक्षत, गंगाजल, शहद, कलावा, चंदन, रोली, जटा वाला नारियल, सूखा नारियल नारियल
- गाय का घी, धूप, अगरबत्ती, पान का पत्ता, सुपारी, लौंग, इलायची, कपूर, अगरबत्ती
- दीपक, बत्ती के लिए रुई, केसर, नैवेद्य, पंचमेवा, गुग्गल, लोबान, जौ, फल, मिठाई, उप्पलें
- हवन-कुंड, आम की सूखी लकड़ियां, माचिस, लाल रंग का ध्वज आदि
- श्री दुर्गा चालीसा, श्री दुर्गा सप्तशती एवं दुर्गा आरती की पुस्तक

घटस्थापना
देवी पुराण के अनुसार, माँ भगवती की पूजा-अर्चना करते समय सर्वप्रथम कलश / घट की स्थापना की जाती है। घट स्थापना करना अर्थात नवरात्रि की कालावधि में ब्रह्मांड में कार्यरत शक्ति तत्त्व का घट में आवाहन कर उसे कार्यरत करना। कार्यरत शक्ति तत्त्व के कारण वास्तु में विद्यमान कष्टदायक तरंगें समूल नष्ट हो जाती है। धर्मशास्त्रों के अनुसार कलश को सुख-समृद्धि, वैभव और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना गया है। कलश के मुख में विष्णुजी का निवास, कंठ में रुद्र तथा मूल में ब्रह्मा स्थित हैं और कलश के मध्य में दैवीय मातृशक्तियां निवास करती हैं।

जौ बोने के लिए 
घटस्थापना हेतु सर्वप्रथम जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र लें। इस पात्र में मिट्टी की एक परत बिछाएं। अब एक परत जौ की बिछाएं। इसके ऊपर फिर मिट्टी की एक परत बिछाएं। अब पुनः एक परत जौ की बिछाएं। जौ के बीच चारों तरफ बिछाएं, जिससे जौ कलश के नीचे न दबे। इसके ऊपर फिर मिट्टी की एक परत बिछाएं। अब कलश के कंठ पर मौली बाँध दें। कलश के ऊपर रोली से ॐ लिखें और स्वास्तिक बनाएं। अब कलश में शुद्ध जल, गंगाजल कंठ तक भर दें। कलश में साबुत सुपारी, दूर्वा, फूल डालें। कलश में थोडा सा इत्र डाल दें। कलश में पंचरत्न डालें। कलश में कुछ सिक्के रख दें। कलश में अशोक या आम के पांच पत्ते रख दें। अब कलश का मुख ढक्कन से बंद कर दें। ढक्कन में चावल भर दें।

नवरात्रि के पहले दिन शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना के साथ जौ भी बोया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अगर जौ अच्छी तरह से अंकुरित और विकसित होते हैं, तो यह समृद्धि और खुशहाली का संकेत होता होता है। जौ बोने से घर में सुख-समृद्धि और संपन्नता बनी रहती है।  जौ को ज्वारे भी कहा जाता है।
 
जौ अच्छी तरह अंकुरित हो इसके लिए नवरात्रि से एक रात पहले ही जौ
 के कुछ दाने भिगोकर रख दें।
नवरात्रि सबसे पहले मंदिर या पूजा घर को साफ-सुथरा कर लें।
जौ बोने के लिए मिट्टी का कोई भी एक पात्र लें। इसे अच्छी तरह से साफ करने के बाद इसमें शुद्ध मिट्टी रखें। इसे भरने के बाद इसमें जौ के दाने को अच्छी तरह से फैला दें।
अब जौ डालने के बाद इसके ऊपर थोड़ी सी मिट्टी डाल दें फिर हल्के हाथों से थोड़ा पानी डालें।
नवरात्रि के हर दिन इसमें थोड़ा-थोड़ा साफ जल डालें। जल की मात्रा अधिक न रखें अन्यथा जौ के बीज खराब होने लगेंगे।

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जौ का रंग देता है संकेत
- नवरात्रि में बोए गए जौ का रंग का काला या पीला है तो यह शुभ संकेत नहीं होता है। इसका मतलब है कि आपको आर्थिक स्थिति खराब होने वाली है।
- जौ अगर अच्छे से नहीं बढ़ रहा है या टेढ़ा-मेढ़ा बढ़ रहा है तो यह भी अशुभ संकेत माना जाता है।
- नवरात्रि में बोए गए जौ का रंग हरा या आधा सफेद है तो यह एक शुभ संकेत है। इसका मतलब है कि आपको समस्त परेशानियों से शीघ्र ही छुटकारा मिल जाएगा।
- अगर आपके जौ अच्छे से बढ़ रहे हैं तो इसका मतलब है कि आपको आर्थिक लाभ मिलेगा और परिवार के सदस्यों का स्वास्थ्य भी उत्तम रहेगा।
- नवरात्रि में बोए गए जौ अगर अच्छे से अंकुरित और विकसित हो रहे हैं तो इसका मतलब है कि देवी मां आपकी पूजा से प्रसन्न हैं। आपके घर में सदैव खुशहाली और समृद्धि बनी रहेगी।
- जौ लंबे और सीधे बढ़ रहे हैं तो यह अच्छे स्वास्थ्य, काम में सफलता और घर में शांति का संकेत होता है।
- जौ छोटे या कम अंकुरित हुए हैं तो इसका मतलब है कि आपके कामों में कई तरह की बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं।

श्रीदेवी भागवत पुराण के अनुसार “पञ्चपल्लवसंयुक्तं वेदमन्त्रैः सुसंस्कृतम्। सुतीर्थजलसम्पूर्णं हेमरत्नैः समन्वितम्॥” अर्थात कलश पंचपल्लवयुक्त, वैदिक मन्त्रों से भली भाँति संस्कृत, उत्तम तीर्थ के जल से पूर्ण और सुवर्ण तथा पंचरत्न मयी होना चाहिए।
नारियल पर लाल कपडा लपेट कर मौली लपेट दें। अब नारियल को कलश पर रखें। 
शास्त्रों में उल्लेख मिलता है- “अधोमुखं शत्रु विवर्धनाय,ऊर्ध्वस्य वस्त्रं बहुरोग वृध्यै। प्राचीमुखं वित विनाशनाय,तस्तमात् शुभं संमुख्यं नारीकेलं।” अर्थात् नारियल का मुख नीचे की तरफ रखने से शत्रु में वृद्धि होती है। नारियल का मुख ऊपर की तरफ रखने से रोग बढ़ते हैं, जबकि पूर्व की तरफ नारियल का मुख रखने से धन का विनाश होता है। इसलिए नारियल की स्थापना सदैव इस प्रकार करनी चाहिए कि उसका मुख साधक की तरफ रहे। ध्यान रहे कि नारियल का मुख उस सिरे पर होता है, जिस तरफ से वह पेड़ की टहनी से जुड़ा होता है।

अब कलश को उठाकर जौ के पात्र में बीचो बीच रख दें। अब कलश में सभी देवी देवताओं का आवाहन करें। "हे सभी देवी देवता और माँ दुर्गा आप सभी नौ दिनों के लिए इसमें पधारें।" अब दीपक जलाकर कलश का पूजन करें। धूपबत्ती कलश को दिखाएं। कलश को माला अर्पित करें। कलश को फल मिठाई अर्पित करें। कलश को सुगंध (इत्र) समर्पित करें।

चौकी की स्थापना-
कलश स्थापना के बाद माँ दुर्गा की चौकी स्थापित की जाती है। नवरात्रि प्रतिपदा के दिन एक लकड़ी की चौकी की स्थापना करनी चाहिए। इसको गंगाजल से पवित्र करके इसके ऊपर सुन्दर लाल वस्त्र बिछाना चाहिए। इसको कलश के दायीं ओर रखना चाहिए। उसके बाद माँ भगवती की धातु की मूर्ति अथवा नवदुर्गा का फ्रेम किया चित्र स्थापित करना चाहिए। मूर्ति के अभाव में नवार्ण मंत्र युक्त यन्त्र को स्थापित करें। माँ दुर्गा को लाल चुनरी उड़ानी चाहिए। माँ दुर्गा से प्रार्थना करें "हे माँ दुर्गा आप नौ दिन के लिए इस चौकी में विराजिये।" उसके बाद सबसे पहले माँ को दीपक दिखाइए। उसके बाद धूप, फूलमाला, इत्र समर्पित करें। फल, मिठाई अर्पित करें।

नवरात्रि में नौ दिन मां भगवती का व्रत रखने का तथा प्रतिदिन श्रीदुर्गा सप्तशती का पाठ करने का विशेष महत्व है। हर एक मनोकामना पूरी हो जाती है। सभी कष्टों से छुटकारा दिलाता है। नवरात्रि के प्रथम दिन ही अखंड ज्योत जलाई जाती है, जो नौ दिन तक जलती रहती है। दीपक के नीचे "चावल" रखने से माँ लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है तथा "सप्तधान्य" रखने से सभी प्रकार के कष्ट दूर होते है
माता की पूजा "लाल रंग के कम्बल" के आसन पर बैठकर करना उत्तम माना गया है।

नवरात्रि के प्रतिदिन माता रानी को फूलों का हार चढ़ाना चाहिए। प्रतिदिन घी का दीपक (माता के पूजन हेतु सोने, चाँदी, कांसे के दीपक का उपयोग उत्तम होता है) जलाकर माँ भगवती को मिष्ठान का भोग लगाना चाहिए। माँ भगवती को इत्र/अत्तर विशेष प्रिय है। साथ ही प्रतिदिन कंडे की धुनी जलाकर उसमें घी, हवन सामग्री, बताशा, लौंग का जोड़ा, पान, सुपारी, कर्पूर, गूगल, इलायची, किसमिस, कमलगट्टा जरूर अर्पित करना चाहिए।
लक्ष्मी प्राप्ति के लिए नवरात्रि में पान और गुलाब की सात पंखुरियां रखें तथा माँ भगवती को अर्पित कर दें। माँ दुर्गा को प्रतिदिन विशेष भोग लगाया जाता है। किस दिन किस चीज का भोग लगाना है ये भी विशेष महत्व रखता है।

गुड़ी किस दिशा में लगाएं 
गुड़ी को सदैव पूर्व या उत्तर दिशा में लगाना सबसे शुभ माना जाता है। पूर्व दिशा सूर्य देव की दिशा होती है, जो ऊर्जा, प्रकाश और नई शुरुआत का प्रतीक है। वहीं, उत्तर दिशा धन और समृद्धि से जुड़ी मानी जाती है। इन दिशाओं में गुड़ी लगाने से घर में सफलता और सौभाग्य का प्रवेश होता है।  धार्मिक मान्यताओं एवं वास्तु शास्त्र के अनुसार, गुड़ी को कभी भी दक्षिण दिशा में नहीं लगाना चाहिए। क्षिण दिशा को यम की दिशा माना जाता है, जो नकारात्मक ऊर्जा का संकेत देती है. इस दिशा में गुड़ी लगाने से घर में सकारात्मकता की जगह बाधाएं और परेशानियां बढ़ सकती हैं.

गुड़ी सजाने की विधि
गुड़ी को स्थापित करने के लिए एक लंबी बांस की लकड़ी का उपयोग किया जाता है. इसके ऊपर सुनहरे किनारी वाला पीला या केसरिया रेशमी कपड़ा बांधा जाता है.इसके ऊपर नीम की पत्तियां और फूलों का हार चढ़ाया जाता है. सबसे ऊपर तांबे या चांदी का लोटा उल्टा करके रखा जाता है. सबसे जरूरी बात कि इसे जमीन पर नहीं रखना चाहिए. बल्कि इसे ऊंचे स्थान पर मजबूती से बांधें. इसे फहराते समय मन में खुशहाली का भाव होना चाहिए. शाम के समय सूर्यास्त से पहले इस गुड़ी को ससम्मान उतार लेना चाहिए। 

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