भारत के कलपक्कम रिएक्टर ने रचा इतिहास, दुनिया को चौंकाया, जापान और...


...फ्रांस जैसे देशों ने भी प्रयास किए थे, लेकिन असफल रहे
रिएक्टर को पूरा होने में लगे 22 वर्ष
- मास्टरस्ट्रोक रहा भाभा का 'प्लान'!

धर्म नगरी / DN News
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- रा.पाठक  

सुप्रसिद्ध भौतिक वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा ने थ्री-स्टेज न्यूक्लियर रोडमैप तैयार किया था, जिसके छह दशक बाद देश ने चुपचाप स्टेज-II में कदम रखा है। तमिलनाडु के तट पर इस रिएक्टर के अंदर एक नियंत्रित, अपने-आप चलने वाली प्रतिक्रिया के साथ शुरू हो गई। 

देश के दक्षिण-पूर्वी तट पर कलपक्कम (तमिलनाडु) में स्वदेशी रूप से डिजाइन और तैयार बने प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने इतिहास रचते हुए दुनिया को चौंका दिया है। कलपक्कम PFBR पर काम 2004 में आरंभ हुआ और पूरा होने में 22 वर्ष लगे। जापान और फ्रांस जैसे देशों ने भी पहले ऐसे प्रयास किए थे, लेकिन सफलता नहीं मिली। यह एक ऐसा परमाणु रिएक्टर है, जो जितना ईंधन जलाएगा, उससे कहीं अधिक बनाएगा और देश के ऊर्जा भविष्य को नया रूप देने में सहायक हो सकता है। कलपक्कम रिएक्टर भारत की परमाणु यात्रा का ऐतिहासिक पड़ाव है।

रिएक्टर की "क्रिटिकैलिटी" का आशय
कलपक्कम रिएक्टर ने 6 अप्रैल, 2026 को क्रिटीकेलिटी प्राप्त कर लिया है। बोलचाल की भाषा में "क्रिटिकल होना" सुनने में चिंताजनक लग सकता है, लेकिन परमाणु इंजीनियरिंग में यही गोल होता है। "क्रिटिकैलिटी" वह प्वाइंट है, जब कोई परमाणु रिएक्टर अपने-आप एक लगातार चलने वाली चेन रिएक्शन को बनाए रखता है। 

"क्रिटिकैलिटी" परमाणु रिएक्टर का वह अति महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो इसकी पुष्टि करता है, कि रिएक्टर का कोर ठीक वैसे ही काम कर रहा है, जैसा उसे डिजाइन किया गया था। इसे आप उस पल की तरह समझ सकते हैं, जब कोई इंजन सालों तक कागजों पर डिजाइन बनने के बाद पहली बार अपनी स्वयं की शक्ति से चालू होता है।

रिएक्टर में परमाणु श्रृंखला रिएक्शन सफलतापूर्वक शुरू हो गई है। परमाणु श्रृंखला रिएक्शन वह प्रक्रिया है, जिसमें परमाणु के हिस्से यानी न्यूट्रॉन दूसरे परमाणु से टकराते हैं और ऊर्जा पैदा करते हैं। जब यह प्रक्रिया एक के बाद एक लगातार होने लगती है, तब इसे सीरीज रिएक्शन कहा जाता है। सरल शब्दों में इससे बिजली बनाने के लिए आवश्यक गर्मी पैदा होती है।

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रिएक्टर विशेषता-
✔ यह रिएक्टर जितना परमाणु ईंधन जलाता है, उससे कहीं ज्यादा बनाता है। इसी वजह से इसे 'ब्रीडर' रिएक्टर कहा जाता है।

✔ भारत ही नहीं, दुनिया भर में अधिकांश परमाणु संयंत्र यूरेनियम ईंधन पर चलते हैं, उसे इस्तेमाल करते हैं और फिर बंद हो जाते हैं। परन्तु प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) कुछ बहुत ही अनोखा काम करता है।

✔ यह रिएक्टर यूरेनियम-प्लूटोनियम मिश्रित ऑक्साइड ईंधन पर चलता है, जिसे रिएक्टर के कोर में डाला जाता है और जिसके चारों ओर यूरेनियम-238 की एक परत होती है।

✔ PFBR की बिजली उत्पादन क्षमता 500 मेगावाट है और यह कूलेंट (शीतलक) के तौर पर तरल सोडियम का उपयोग करता है। विखंडन की प्रक्रिया इस परत के साथ रिएक्ट करती है और यूरेनियम-238 को बदल देती है या उसका 'रूपांतरण' कर देती है। इससे रिएक्टर द्वारा प्रयोग किए प्लूटोनियम से कहीं अधिक प्लूटोनियम बनता है।

✔ कलपक्कम रिएक्टर को इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र IGCAR से डिजाइन किया गया, भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड BHAVINI से निर्मित और संचालित, PFBR भारत की दीर्घकालिक परमाणु रणनीति का एक प्रमुख घटक है। इसमें छोटे और मध्यम उद्यम सहित 200 से अधिक भारतीय उद्योगों का बड़ा योगदान है।

PFBR के तीन चरण 
कलपक्कम के इस स्वदेशी प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर को बनाने (PFBR) एक लंबी रणनीति है। देश ने 1960 के दशक से तीन-चरण (Phase) वाला परमाणु ईंधन कार्यक्रम अपनाया। लगातार इन तीनों चरणों में काम कर कियापहले चरण  में प्राकृतिक यूरेनियम से चलने वाले प्रेशराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर (PHWR) बिजली पैदा करते हैं और उप-उत्पाद के रूप में प्लूटोनियम बनाते हैं।

फिर उस प्लूटोनियम का उपयोग दूसरे चरण में फास्ट ब्रीडर रिएक्टर यानी PFBR के लिए मिश्रित ऑक्साइड ईंधन बनाने में किया जाता है। यह दूसरा चरण थोरियम का उपयोग करके 'यूरेनियम-233' नाम का एक विखंडनीय पदार्थ भी बनाता है, जो रिएक्टरों के तीसरे चरण या 
अंतिम के लिए ईंधन का काम करता है।

भारत में थोरियम भंडार 
उक्त पूरी प्रक्रिया का अंतिम लक्ष्य सदैव से थोरियम ही रहा है। 
दुनिया के सबसे बड़े थोरियम भंडार में एक भारत के पास है, जिसका अनुमान 8,00,000 टन से अधिक है। यह भंडार मुख्यतः ओडिशा, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल की मोनाजाइट रेत में केंद्रित है। 

थोरियम का सीधे परमाणु ईंधन के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता, लेकिन PFBR वह मशीन है, जो इसे ऐसे पदार्थ में बदलना शुरू करती है, जिसका उपयोग ईंधन के रूप में किया जा सके। उल्लेखनीय है, भारत अपने यूरेनियम का अधिकांश हिस्सा आयात करता है, जबकि थोरियम पहले से हमारी धरती के नीचे भारी मात्रा में है।  

रिएक्टर को इलेक्ट्रिकल ग्रिड से जोड़ना
रिएक्टर का अगला अहम पड़ाव रिएक्टर को इलेक्ट्रिकल ग्रिड से जोड़ना होगा, जिससे कमर्शियल आधार पर बिजली पैदा की जा सके। इसके लिए AERB से स्वीकृति मिलना शेष है। अगले चरण में कल्पक्कम में दो और फास्ट ब्रीडर रिएक्टर बनाने की योजना है, जो इस पर निर्भर करेगा, कि डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी PFBR के परफॉर्मेंस से कितना संतुष्ट है !

रिएक्टर देश को कितना लाभ ?
कल्पक्कम स्थित इस रिएक्टर की बिजली उत्पादन क्षमता 500 मेगावाट है। एक बार कलपक्कम 
PFBR जब सफलतापूर्वक कामर्शियल स्तर पर शुरू हो जाएगा, तब भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों में से एक होगा, जो कमर्शियल पैमाने पर फास्ट ब्रीडर रिएक्टर चलाते हैं। भारत अपनी घरेलू परमाणु ईंधन क्षमता बढ़ाता है, तो ऊर्जा नीति अधिक आत्मनिर्भर बन सकती है। कलपक्कम PFBR से भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी। कलपक्कम PFBR से उच्च स्तरीय विज्ञान, इंजीनियरिंग और निर्माण क्षमता बढ़ती है। ऐसी परियोजनाएं देश में परमाणु तकनीक, विशेष धातु, सुरक्षा प्रणालियों और उन्नत औद्योगिक कौशल को मजबूत करती हैं।

देश की बिजली आवश्यकता तेजी से बढ़ रही है। कोयला और तेल पर सदैव निर्भर रहना लंबे समय में अच्छा विकल्प नहीं है। परमाणु ऊर्जा लगातार और बड़े पैमाने पर बिजली दे सकती है। कलपक्कम PFBR की तकनीक ईंधन का बेहतर उपयोग करती है और सामान्य रिएक्टरों की तुलना में फास्ट ब्रीडर रिएक्टर अधिक कुशल है। ये उपयोग किए ईंधन से भी आगे उपयोगी सामग्री तैयार कर सकते हैं। इससे भारत को थोरियम आधारित भविष्य की दिशा में बढ़ने में सहायक मिलेगी।

दुनिया में कितने हैं कलपक्कम जैसे PFBR  
फास्ट ब्रीडर या फास्ट न्यूट्रॉन रिएक्टर बहुत कम देशों के पास हैं। यह तकनीक कठिन और महंगी है। अभी प्रमुख रूप से रूस, चीन और भारत इस क्षेत्र में सक्रिय माने जाते हैं। रूस इस क्षेत्र में सबसे आगे है। उसके पास बीएन-600 और बीएन-800 जैसे रिएक्टर हैं, जो लंबे समय से चल रहे हैं। चीन ने सीएफआर-600 जैसे प्रोजेक्ट पर काम आगे बढ़ाया है। भारत अब कलपक्कम के प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर के माध्यम इस चुनिंदा समूह में मजबूत स्थिति बना रहा है। जापान और फ्रांस जैसे देशों ने भी पहले ऐसे प्रयास किए थे, लेकिन कई परियोजनाएं बंद हो गईं या आगे नहीं बढ़ सकीं। इसलिए भारत की यह सफलता और भी महत्वपूर्ण बन जाती है।

PFBR पाना रास्ता लंबा और खर्चीला 
कलपक्कम के रिएक्टर को पाने का रास्ता लंबा और खर्चीला था। इसका निर्माण मूल रूप से 2010 तक पूरा होना था, लेकिन इस प्रोजेक्ट में कई बार देरी हुई। इसकी लागत (आरम्भिक अनुमान 3,492 करोड़ रु) से बढ़कर दोगुनी से भी अधिक बढ़कर लगभग 8,181 करोड़ रु तक पहुंच गई, जिसकी पुष्टि संसदीय समिति से जुड़ी रिपोर्ट से हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 4 मार्च, 2024 को कलपक्कम का भ्रमण किया था, ताकि वे कोर लोडिंग की शुरुआत के साक्षी बन सकें। 


कोर लोडिंग रिएक्टर में पहली बार ईंधन डालने की प्रक्रिया है। इसके लिए विनियामक मंजूरी (रेगुलेटरी क्लीयरेंस) भी बहुत ही सावधानीपूर्वक और चरणबद्ध तरीके से दी गई। परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) ने क्रिटिकैलिटी की ओर पहला कदम बढ़ाने की अनुमति तभी दी, जब उसने कई स्तरों पर सुरक्षा की गहन समीक्षा कर ली। साइट पर उपस्थित पर्यवेक्षकों की टीम से नियमित निरीक्षण करवाया और सुरक्षा से संबंधित विस्तृत दस्तावेजों का गहन मूल्यांकन कर लिया। तत्पश्चात 6 अप्रैल, 2026 को क्रिटिकैलिटी प्राप्त कर ली गई।

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