प्रत्यक्ष फलदायी है गुप्त नवरात्र, दस महाविद्या की आराधना-पूजा के विशेष दिन

 

पूजा विधि, घट स्थापना का फल 

धर्म नगरी / DN News 
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- राजेशपाठक (अवैतनिक संपादक)

आषाढ़ गुप्त नवरात्रि आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा (15 जुलाई, 2026) बुधवार को आरंभ होकर आषाढ़ शुक्ल नवमी 23 जुलाई (गुरुवार) को व्रत के पारण के साथ (यदि रखा है) संपन्न होगी। इस बार तीसरा और चौथा नवरात्र (तृतीया एवं चतुर्थी तिथि) एक ही दिन 17 जुलाई को पड़ रही है। देवी आराधना के नौ-दिवसीय पर्व काल में यंत्र, मंत्र व वैदिक तंत्र की साधना का विशेष महत्व है। 

पौराणिक मान्यतानुसार, गुप्त नवरात्रि में माँ दुर्गा की 10 महाविद्याओं की पूजा की जाती है। वर्ष में चार नवरात्रि आती हैं, दो प्रत्यक्ष और दो अप्रत्यक्ष होती है। अप्रत्यक्ष नवरात्रि को ही गुप्त नवरात्रि कहा जाता है। प्रत्यक्ष या प्रकट रूप पर चैत्र एवं आश्विन माह में मनाई जाती हैं अप्रत्यक्ष यानी कि गुप्त आषाढ़ और माघ मास में मनाई जाती हैं। 

गुप्त नवरात्रि में साधना गुप्त (गोपनीय या secret) रखते हैं-

गुप्त नवरात्रि में श्रद्धापूर्वक की गई उपासना से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है, आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। जीवन में सुख-शांति तथा समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। आषाढ़ मास में मौसम बदल रहा होता है, जिससे बीमारियां और सुस्ती बढ़ती है। इस समय साधना करने से शरीर और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह पर्व बाहरी आडंबर से अधिक आंतरिक साधना, भक्ति और आत्मिक विकास पर बल देता है। अतः जो श्रद्धालु-भक्त सच्ची श्रद्धा और नियमपूर्वक माँ भगवती की आराधना करते हैं, उन्हें देवी की विशेष कृपा प्राप्त होने की मान्यता है। गुप्त नवरात्रि में साधना करने से साधक को मोक्ष और अलौकिक शक्तियों की प्राप्ति होती है।

संकल्प लिया है, तो पूरा करें  
धार्मिक मान्यतानुसार, गुप्त नवरात्रि आत्मचिंतन, साधना और सकारात्मक ऊर्जा का त्यौहार माना गया है। अतः इन दिनों ईर्ष्या, द्वेष और नकारात्मक सोच अपने मन में भूलकर भी नहीं लाना चाहिए। सकारात्मक विचार मन में रखें। देवी की विधि-विधान से आराधना करना चाहिए। ऐसा करने से अत्यंत शुभ फल की प्राप्ति हो सकती है। 

यदि आपने गुप्त नवरात्रि के दौरान व्रत, मंत्र-जप या देवी की आराधना का संकल्प लिया है, तो उसे पूरा करना चाहिए। नियमित रूप से देवी की पूजा-अर्चना करने का प्रयास करें, क्योंकि साधना को कभी भी बीच में छोड़ना उचित नहीं माना जाता। ऐसे में गुप्त नवरात्रि के सभी दिनों इस नियम का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

नए कार्यों का श्रीगणेश करें
गुप्त नवरात्र में सर्वार्थ सिद्धि योग- 19 जुलाई सूर्योदय से रात्रि 10.15 बजे तक एवं 23 जुलाई रात्रि 3:31 से रात्रि अंत तक रहेगा। इन मुहूर्तों में नए कार्यों का श्री गणेश कर सकते हैं, नवीन प्रतिष्ठान का शुभारंभ, औद्योगिक इकाई की स्थापना, भूमि, भवन, वाहन, आभूषण खरीदी के लिए यह अवधि विशेष हैं। इन योगों में शुरू किए गए कार्य अथवा खरीदी गई संपत्ति उन्नति के साथ आर्थिक प्रगति प्रदान करती है।

तंत्र साधना के विशेष समय
गुप्त नवरात्रि का काल सामान्य गृहस्थों से अधिक तांत्रिकों, अघोरियों और सिद्धियां प्राप्त करने वाले साधकों के लिए महत्वपूर्ण होता है। इस अवधि में (रात यानी निशिथ काल में) की जाने वाली पूजा सर्वाधिक फलदायी माना जाता है। गुप्त नवरात्र में तंत्र-साधना, ध्यान और पूजा-पाठ करने का अधिक महत्व होने से साधक की आध्यात्मिक उन्नति होती है। 

गुप्त नवरात्रि विशेष रूप से तांत्रिक साधनाओं के लिए है। साधक गुप्त साधनाएं करने शमशान व गुप्त स्थान पर जाते हैं। पहले गुप्त नवरात्रि के बारे में आम लोगों को इसके बारे में अधिक पता था, लेकिन वर्तमान सोशल मीडिया के काल में अब यह नवरात्रि "गुप्त" नहीं रही। गुप्त नवरात्रि में साधनाएं योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करना उचित माना जाता है। अधूरे या बिना उचित ज्ञान के तांत्रिक प्रयोग करने का प्रयास कदापि नहीं करना चाहिए, अन्यथा इससे प्रतिकूल प्रभाव मिल सकते हैं।

वैसे दोनों गुप्त एवं दोनों प्रकट नवरात्रि में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्तियों में वृद्धि करने अनेक प्रकार के उपवास, संयम, नियम, भजन, पूजन योग साधना आदि करते हैं। सभी नवरात्रों में माता के सभी 51पीठों पर भक्त विशेष रुप से माता के दर्शनों के लिये एकत्रित होते हैं। 

महाकाल की नगरी उज्जयनी (उज्जैन) में गुप्त नवरात्र में उज्जैन में साधक गुप्त साधना करेंगे, शक्तिपीठ हरसिद्धि माता मंदिर और महाकाल मंदिर में गुप्त साधना का विशेष महत्व है। इसके अलावा गढ़ कालिका माता, चौसठ योगिनी माता, नगरकोट माता मंदिरों में साधना के अनुक्रम सिद्धि प्रदान करने वाले माने गए हैं, शक्ति उपासना के पर्वकाल में शहर के प्राचीन मंदिरों में देवियों का अभिषेक, पूजन तथा नित नया श्रृंगार किया जाएगा।

 
जयन्ती  मङ्गला  काली  भद्रकाली  कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते।।

सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वित:।
मनुष्यो  मत्प्रसादेन  भविष्यति  न संशय:॥
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गुप्त नवरात्र पूजा विधि
घट स्थापना, अखंड ज्योति प्रज्ज्‍वलित करना व जवारे स्थापित करना श्रद्धालु अपने सामर्थ्य के अनुसार नवरात्रि का प्रारंभ कर सकते हैं अथवा क्रमश: एक या दो कार्यों से भी कर सकते हैं। यदि यह भी संभव न हो, तो केवल घट स्थापना से देवी पूजा का प्रारंभ किया जा सकता है।

मान्यतानुसार, गुप्त नवरात्र के काल में अन्य नवरात्रों की भांति ही पूजा करनी चाहिए। उपवास का संकल्प लेते हुए प्रतिप्रदा (पहले दिन) घटस्थापना करनी चाहिए। घटस्थापना के बाद प्रतिदिन सुबह और शाम के समय माँ दुर्गा की पूजा करनी चाहिए।
मान्यता है, गुप्त नवरात्रि में अपनी मनोकामनाएं गुप्त रखनी चाहिए। व्रत उपवास के कई कठोर नियम भी हैं। इनका पालन करना अनिवार्य होता है। 

लश स्थापना मुहूर्त-
कलश या घट स्थापना मुहूर्त 15 जुलाई प्रातः 6:01 से 10:17 बजे तक है। प्रतिपदा तिथि 14 जुलाई दोपहर 3:12 बजे लगेगी, जो 15 जुलाई सुबह 11:50 बजे समाप्त होगी। अतः, उदया तिथि के अनुसार, 15 जुलाई, 2026 (बुधवार) से आषाढ़ गुप्त नवरात्र का शुभारंभ होगा।

घटस्थापना के दिन स्नान-ध्यान से निवृत होकर पवित्र धारण कर व्रत संकल्प लें। सूर्य देव को अर्घ्य दें एवं आमचन करने के पश्चात-
✔ चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर माँ की प्रतिमा या चित्र को स्थापित करें,
✔ मिट्टी के पात्र में मिट्टी भरकर जौ बोएं,
✔ एक कलश में जल भरे और कलश में गंगाजल, सुपारी, सिक्का, अक्षत और दूर्वा डालें,
✔ कलश के ऊपर एक नारियल को लाल चुनरी को लपेटकर रखें,
✔ कलश पर रोली से स्वास्तिक बनाकर धूप-दीप जलाएं,
✔ माँ दुर्गा की आरती करें,
✔ दुर्गा चालीसा का पाठ करें,
✔ फल और मिठाई का भोग लगाएं,
अंत में सभी लोगों में प्रसाद बाटें।

आषाढ़ गुप्त नवरात्रि की तिथि (जुलाई 2026)-  
15 जुलाई (बुधवार)- प्रतिपदा घटस्थापना माँ शैलपुत्री
16 जुलाई (गुरुवार)- द्वितीय माँ ब्रह्मचारिणी
17 जुलाई (शुक्रवार)- तृतीया-चतुर्थी माँ चंद्रघंटा और माँ कूष्माण्डा
18 जुलाई (शनिवार)- पंचमी माँ स्कंदमाता
19 जुलाई (रविवार)- षष्ठी माँ कात्यायनी
20 जुलाई (सोमवार)- सप्तमी माँ कालरात्रि
21 जुलाई (मंगलवार)-अष्टमी (दुर्गा अष्टमी) माँ महागौरी
22 जुलाई (बुधवार)- नवमी (महानवमी) माँ सिद्धिदात्री
23 जुलाई (गुरुवार)- व्रत का पारण
 
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नवरात्रि में दस महाविद्या पूजा-
पहला दिन- गुप्त नवरात्रि के पहले दिन माँ काली की पूजा के समय उत्तर दिशा की ओर मुंह करके काली हकीक माला से पूजा करनी है। इस दिन काली माता के साथ आप भगवान कृष्ण की पूजा करनी चाहिए। ऐसा करने से आपकी किस्मत चमक जाएगी। शनि के प्रकोप से भी छुटकारा मिल जाएगा। नवरात्रि में पहले दिन दिन माँ काली को अर्पित होते हैं। वहीं बीच के तीन दिन माँ लक्ष्मी को अर्पित होते हैं। अंत के तीन दिन माँ सरस्वती को अर्पित होते हैं।

माँ काली को गुड़, हलवा, खीर, काले तिल से बने व्यंजन और मौसमी फल अर्पित करना शुभ माना जाता है। कई स्थानों पर नारियल, मिश्री और लाल रंग की मिठाई भी चढ़ाई जाती है। माँ काली की पूजा में मंत्रों का उच्चारण कर सकते हैं-
मंत्र- क्रीं ह्रीं काली ह्रीं क्रीं स्वाहा
ऊँ क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं स्वाहा


दूसरी महाविद्या- दूसरे दिन माँ तारा की पूजा की जाती है। इस पूजा को बुद्धि और संतान के लिये किया जाता है। इस दिन एमसथिस्ट व नीले रंग की माला का जप करना हैं।
मंत्र- ऊँ ह्रीं स्त्रीं हूं फट

तीसरी महाविद्या- माँ त्रिपुरसुंदरी और माँ शोडषी पूजा- अच्छे व्यक्ति व निखरे हुए रूप के लिये इस दिन माँ त्रिपुरसुंदरी की पूजा की जाती है. इस दिन बुध ग्रह के लिये पूजा की जाती है. इस दिन रूद्राक्ष की माला का जप करना चाहिए।
मंत्र- ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीये नम:

चौथी महाविद्या- माँ भुवनेश्वरी पूजा- इस दिन मोक्ष और दान के लिए पूजा की जाती है. इस दिन विष्णु भगवान की पूजा करना काफी शुभ होगा। चंद्रमा ग्रह संबंधी समस्या के लिये यह पूजा की जाती है।
मंत्र- ह्रीं भुवनेश्वरीय ह्रीं नम:
ऊं ऐं ह्रीं श्रीं नम:

पांचवी महाविद्या- माँ छिन्नमस्ता- नवरात्रि के पांचवे दिन माँ छिन्नमस्ता की पूजा होती है. इस दिन पूजा करने से शत्रुओं और रोगों का नाश होता है. इस दिन रूद्राक्ष माला का जप करना चाहिए. अगर किसी का वशीकरण करना है तो उस दौरान इस पूजा करना होता है. राहू से संबंधी किसी भी परेशानी से छुटकारा मिलता है। इस दिन माँ को पलाश के फूल चढ़ाएं।
मंत्र- श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैररोचनिए हूं हूं फट स्वाहा

छठी महाविद्या- माँ त्रिपुर भैरवी पूजा- इस दिन नजर दोष व भूत प्रेत संबंधी परेशानी को दूर करने के लिए पूजा करनी होती है। मूंगे की माला से पूजा करें। माँ के साथ बालभद्र की पूजा करना और भी शुभ होगा।  इस दिन जन्मकुंडली में लगन में अगर कोई दोष है तो वो सभ दूर होता है।
मंत्र- ऊँ ह्रीं भैरवी क्लौं ह्रीं स्वाहा

सातवी महाविद्या- मां धूमावती पूजा- इस दिन पूजा करने से दरिद्रता का नाश होता है। इस दिन हकीक की माला का पूजा करें।
मंत्र- धूं धूं धूमावती दैव्ये स्वाहा

आठवी महाविद्या- माँ बगलामुखी की पूजा करने से कोर्ट-कचहरी और नौकरी संबंधी समस्या दूर हो जाती है। इस दिन पीले कपड़े पहनकर हल्दी माला का जप करना है। अगर आपकी कुंडली में मंगल संबंधी कोई समस्या है, तो माँ बगलामुखी की कृपा जल्द ठीक हो जाएगा।
मंत्र- ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं बगलामुखी सर्वदृष्टानां मुखं, पदम् स्तम्भय जिव्हा कीलय, शत्रु बुद्धिं विनाशाय ह्रलीं ऊँ स्वाहा

नौवीं महाविद्या- माँ मतांगी की पूजा धरती की ओर और माँ कमला की पूजा आकाश की ओर मुंह करके पूजा करनी चाहिए. इस दिन पूजा करने से प्रेम संबंधी परेशानी का नाश होता है। बुद्धि संबंधी के लिये भी माँ मातंगी पूजा की जाती है।
मंत्र- क्रीं ह्रीं मातंगी ह्रीं क्रीं स्वाहा

दसवी महाविद्या- माँ कमला की पूजा आकाश की ओर मुख करके पूजा करनी चाहिए. दरअसल गुप्त नवरात्रि के नौंवे दिन दो देवियों की पूजा करनी होती है।
मंत्र- क्रीं ह्रीं कमला ह्रीं क्रीं स्वाहा

नौ दिनों तक चलने वाले इस पर्व का समापन पूर्णाहुति हवन एवं कन्याभोज कराकर किया जाना चाहिए। पूर्णाहुति हवन दुर्गा सप्तशती के मन्त्रों से किए जाने का विधान है किन्तु यदि यह संभव ना हो तो देवी के 'नवार्ण मंत्र''सिद्ध कुंजिका स्तोत्र' अथवा 'दुर्गाअष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र' से हवन संपन्न करना श्रेयस्कर रहता है।
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संबंधित लेख पढ़ें / देखें)- 
गुप्त नवरात्रि में अत्यंत मंगलकारी, चमत्कारी है "सिद्ध कुंजिका स्रोत" 
http://www.dharmnagari.com/2020/10/Siddh-Kunjika-Srotra-Sri-Durga-Saptsati.html
हर प्रकार की रुकावट, बाधा-दोष हेतु नवरात्रि में करें भक्ति
http://www.dharmnagari.com/2020/03/NavratrimeKyakreMuhurtYog.html
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गुप्त नवरात्र के दौरान कई साधक महाविद्या के लिए मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां ध्रूमावती, माता बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी की पूजा करते हैं। गुप्त नवरात्रि में माँ दुर्गा के दस महाविद्या के स्वरूप में आराधना की जाती है, समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करने के लिए माँ की गुप्त रूप से साधना होती है, जिनमें  साधक तांत्रिक पूजन से भी माँ भगवती की आराधना करके प्रसन्न करते है।

कुछ वैदिक अनुष्ठान से यह कार्य भी लाभदायक रहते हैं जैसे-
पति प्राप्ति हेतु मन्त्र-
कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि !
नंदगोपसुतम्  देवि पतिम् मे  कुरुते  नम:!!

यह मंत्र दुर्गा सप्तशती का संपुटित पाठ किसी योग्य ब्राहमण से करवाऐ माता से प्रार्थना करें हे माँ मै आपकी शरण में आ गयी मुझे शीघ्र अति शीघ्र सौभाग्य की प्राप्ति हो और मेरी मनोकामना शीघ्र पुरी हो माँ भगवती कि कृपा से अवश्य सफलता प्राप्त होगी।

मनोकूल पत्नी प्राप्ति का मंत्र-
पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानु सारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य  कुलोद्भवाम.!!

माँ दुर्गा सप्तशती का संपुटित पाठ किसी योग्य ब्राह्मण से करवाऐ आपकी मनोकामना शीघ्र पूरी होगी.!!

शत्रु पर विजय व शांति प्राप्ति हेतु-
सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्दैरिविनाशनम्.!!

बाधा से मुक्ति व धन-पुत्रादि प्राप्ति हेतु-
सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धन-धान्य सुतान्वितः।
मनुष्यों मत्प्रसादेन भवष्यति न संशय..!!
शत्रु का नाश, भय से शांति और धन-संपत्ति प्राप्त करने के लिए बगलामुखी अनुष्ठान-
ॐ ह्रीं बगलामुखी सर्व दुष्टानाम वाचं मुखम पदम् स्तम्भय। जिव्हां कीलय बुद्धिम विनाशय ह्रीं ॐ स्वाहा।।


प्रत्यक्ष फल देते हैं गुप्त नवरात्र-
गुप्त नवरात्र में दश महाविद्याओं की साधना कर ऋषि विश्वामित्र अद्भुत शक्तियों के स्वामी बन गए। उनकी सिद्धियों की प्रबलता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है, कि उन्होंने एक नई सृष्टि की रचना तक कर डाली थी। इसी तरह, लंकापति रावण के पुत्र मेघनाद ने अतुलनीय शक्तियां प्राप्त करने गुप्त नवरात्र में साधना की थी। शुक्राचार्य ने मेघनाद को परामर्श दिया था, गुप्त नवरात्रों में अपनी कुलदेवी निकुम्बाला की साधना करके वह अजेय बनाने वाली शक्तियों का स्वामी बन सकता है।

गुप्त नवरात्र दस महाविद्याओं की साधना की जाती है। गुप्त नवरात्रों से एक प्राचीन कथा जुड़ी है।एक समय ऋषि श्रृंगी भक्तों को दर्शन दे रहे थे, अचानक भीड़ से एक स्त्री निकल कर आई और करबद्ध होकर ऋषि श्रृंगी से बोली- मेरे पति दुर्व्यसनों से सदा घिरे रहते हैं। जिस कारण मैं कोई पूजा-पाठ नहीं कर पाती, धर्म और भक्ति से जुड़े पवित्र कार्यों का संपादन भी नहीं कर पाती। यहां तक, ऋषियों को उनके हिस्से का अन्न भी समर्पित नहीं कर पाती। मेरा पति मांसाहारी हैं, जुआरी है, लेकिन मैं 
माँ दुर्गा कि सेवा करना चाहती हूं। उनकी भक्ति साधना से जीवन को पति सहित सफल बनाना चाहती हूं।

ऋषि श्रृंगी महिला के भक्तिभाव से बहुत प्रभावित हुए। ऋषि ने उस स्त्री को आदरपूर्वक उपाय बताते हुए कहा, वासंतिक और शारदीय नवरात्रों से तो आम जनमानस परिचित है, लेकिन इसके अतिरिक्त दो नवरात्र और भी होते हैं । जिन्हें गुप्त नवरात्र कहा जाता है प्रकट नवरात्रों में नौ देवियों की उपासना हाती है और गुप्त नवरात्रों में दस महाविद्याओं की साधना की जाती है । इन नवरात्रों की प्रमुख देवी स्वरुप का नाम सर्वेश्वकारिणी देवी है।

गुप्त नवरात्रों में कोई भी भक्त माता दुर्गा की पूजा-साधना करता है, तो 
माँ उसके जीवन को सफल कर देती हैं। लोभी, कामी, व्यसनी, मांसाहारी अथवा पूजा पाठ न कर सकने वाला भी यदि गुप्त नवरात्रों में माता की पूजा करता है, तो उसे जीवन में कुछ और करने की आवश्यकता ही नहीं रहती। उस स्त्री ने ऋषि श्रृंगी के वचनों पर पूर्ण श्रद्धा करते हुए गुप्त नवरात्र की पूजा की माँ प्रसन्न हुई। उसके जीवन में परिवर्तन आने लगा, घर में सुख शांति आ गई। पति सन्मार्ग पर आ गया और जीवन माता की कृपा से खिल उठा। यदि आप भी एक या कई प्रकार के दुर्व्यसनों से ग्रस्त हैं। आपकी इच्छा है, कि माता की कृपा से जीवन में सुख-समृद्धि आए, तो गुप्त नवरात्र की साधना अवश्य करें। तंत्र और शाक्त मतावलंबी साधना के दृष्टि से गुप्त-नवरात्रों के कालखंड को बहुत सिद्धिदायी मानते हैं।

माँ वैष्णो देवी, पराम्बा देवी और कामाख्या देवी का का अहम् पर्व माना जाता है। हिंगलाज देवी की सिद्धि के लिए भी इस समय को महत्त्वपूर्ण माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार दस महाविद्याओं को सिद्ध करने के लिए ऋषि विश्वामित्र और ऋषि वशिष्ठ ने बहुत प्रयास किए, लेकिन उनके हाथ सिद्धि नहीं लगी। वृहद काल गणना और ध्यान की स्थिति में उन्हें यह ज्ञान हुआ कि केवल गुप्त नवरात्रों में शक्ति के इन स्वरूपों को सिद्ध किया जा सकता है।

गुप्त नवरात्रों में दश महाविद्याओं की साधना कर ऋषि विश्वामित्र अद्भुत शक्तियों के स्वामी बन गए उनकी सिद्धियों की प्रबलता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है, कि उन्होंने एक नई सृष्टि की रचना तक कर डाली। इसी तरह, लंकापति रावण के पुत्र मेघनाद ने अतुलनीय शक्तियां प्राप्त करने के लिए गुप्त नवरात्र में साधना की थी शुक्राचार्य ने मेघनाद को परामर्श दिया था कि गुप्त नवरात्रों में अपनी कुल देवी निकुम्बाला कि साधना करके वह अजेय बनाने वाली शक्तियों का स्वामी बन सकता है मेघनाद ने ऐसा ही किया और शक्तियां हासिल की राम, रावण युद्ध के समय केवल मेघनाद ने ही भगवान राम सहित लक्ष्मण जी को नागपाश मे बांध कर मृत्यु के द्वार तक पहुंचा दिया।

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मान्यता है, यदि नास्तिक भी परिहासवश इस समय मंत्र-साधना कर ले, तो उसका भी फल सफलता के रूप में अवश्य मिलता है। यही इस गुप्त नवरात्र की महिमा है। यदि आप मंत्र-साधना, शक्ति साधना करना चाहते हैं और काम-काज की उलझनों के कारण साधना के नियमों का पालन नहीं कर पाते, तो यह समय आपके लिए माता की कृपा ले कर आता है।

गुप्त नवरात्रों में साधना के लिए आवश्यक न्यूनतम नियमों का पालन करते हुए माँ शक्ति की मंत्र साधना कीजिए। गुप्त नवरात्र की साधना सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। गुप्त नवरात्र के बारे में यह कहा जाता है, कि इस कालखंड में की गई साधना निश्चित ही फलवती होती है। इस समय की जाने वाली साधना की गुप्त बनाए रखना बहुत आवश्यक है। अपना मंत्र और देवी का स्वरुप गुप्त बनाए रखें

गुप्त नवरात्र में शक्ति साधना का संपादन आसानी से घर में ही किया जा सकता है। इस महाविद्याओं की साधना के लिए यह सबसे अच्छा समय होता है गुप्त व चामत्कारिक शक्तियां प्राप्त करने का यह श्रेष्ठ अवसर होता है। धार्मिक दृष्टि से हम सभी जानते हैं कि नवरात्र देवी स्मरण से शक्ति साधना की शुभ घड़ी है। इस शक्ति साधना के पीछे छुपा व्यावहारिक पक्ष यह है, कि नवरात्र का समय मौसम के बदलाव का होता है। आयुर्वेद के अनुसार, इस परिवर्तन से जहां शरीर में वात, पित्त, कफ में दोष पैदा होते हैं। वहीं, बाहरी वातावरण में रोगाणु जो अनेक बीमारियों का कारण बनते हैं, सुखी-स्वस्थ जीवन के लिये इनसे बचाव बहुत आवश्यक है। नवरात्र के विशेष काल में देवी उपासना के माध्यम से खान-पान, रहन-सहन और देव स्मरण में अपनाने गए संयम और अनुशासन तन व मन को शक्ति और ऊर्जा देते हैं, जिससे इंसान निरोगी होकर लंबी आयु और सुख प्राप्त करता है। धर्म-ग्रंथों के अनुसार, गुप्त नवरात्र में प्रमुख रूप से भगवान शंकर व देवी शक्ति की आराधना की जाती है।

देवी दुर्गा शक्ति का साक्षात स्वरूप है दुर्गा शक्ति में दमन का भाव भी जुड़ा है । यह दमन या अंत होता है शत्रु रूपी दुर्गुण, दुर्जनता, दोष, रोग या विकारों का ये सभी जीवन में अड़चनें पैदा कर सुख-चैन छीन लेते हैं । यही कारण है, देवी दुर्गा के कुछ विशेष और शक्तिशाली मंत्रों का देवी उपासना के विशेष-काल में जाप शत्रु, रोग, दरिद्रता रूपी, भय बाधा का नाश करने वाला माना गया है।सभी नवरात्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर नवमी तक किए जाने वाले पूजन, जाप और उपवास का प्रतीक है- "नव शक्ति समायुक्तां नवरात्रं तदुच्यते।" देवी पुराण के अनुसार, एक वर्ष में चार माह नवरात्र के लिए निश्चित हैं।

नवरात्र के नौ दिनों तक समूचा परिवेश श्रद्धा व भक्ति, संगीत के रंग से सराबोर हो उठता है। धार्मिक आस्था के साथ नवरात्र भक्तों को एकता, सौहार्द, भाईचारे के सूत्र में बांधकर उनमें सद्भावना पैदा करता है। शाक्त ग्रंथो में गुप्त नवरात्रों का बड़ा ही माहात्म्य गाया गया है। मानव के समस्त रोग-दोष व कष्टों के निवारण के लिए गुप्त नवरात्र से बढ़कर कोई साधनाकाल नहीं हैं। श्री, वर्चस्व, आयु, आरोग्य और धन प्राप्ति के साथ ही शत्रु संहार के लिए गुप्त नवरात्र में अनेक प्रकार के अनुष्ठान व व्रत-उपवास के विधान शास्त्रों में मिलते हैं। इन अनुष्ठानों के प्रभाव से मानव को सहज ही सुख व अक्षय ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

"दुर्गावरिवस्या" नामक ग्रंथ में स्पष्ट लिखा है- वर्ष में दो बार आने वाले गुप्त नवरात्रों में माघ में पड़ने वाले गुप्त नवरात्र मानव को न केवल आध्यात्मिक बल ही प्रदान करते हैं, बल्कि इन दिनों में संयम-नियम व श्रद्धा के साथ माता दुर्गा की उपासना करने वाले व्यक्ति को अनेक सुख व साम्राज्य भी प्राप्त होते हैं । "शिवसंहिता" के अनुसार, ये नवरात्र भगवान शंकर और आदिशक्ति माँ पार्वती की उपासना के लिए भी श्रेष्ठ हैं। गुप्त नवरात्रों के साधनाकाल में माँ शक्ति का जप-तप, ध्यान करने से जीवन में आ रही  बाधाएं नष्ट होने लगती हैं।

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥

देवी भागवत के अनुसार, जिस तरह वर्ष में चार बार नवरात्र आते हैं और जिस प्रकार नवरात्रि में देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। ठीक उसी प्रकार गुप्त नवरात्र में दस महाविद्याओं की साधना की जाती है।

मान्यता है, कि नवरात्र में महाशक्ति की पूजा कर श्रीराम ने अपनी खोई हुई शक्ति पाई। इसलिए इस समय आदिशक्ति की आराधना पर विशेष बल दिया है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार नवरात्रि कहना त्रुटिपूर्ण हैं। नौ रात्रियों का समाहार, समूह होने के कारण से द्वन्द समास होने के कारण यह शब्द पुलिंग रूप 'नवरात्र' में ही शुद्ध है।

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कालभैरव मंदिर : 6000 वर्ष प्राचीन मन्दिर जहाँ भैरव करते है मदिरापान
प्रतिमा कैसे करती है मदिरापान, कोई जान नहीं सका 
 
http://www.dharmnagari.com/2020/12/Kal-Bhairav-Ujjain-6000-Year-Old-Temple.html
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