#Ayodhya : मंदिर ट्रस्ट के दूसरे सबसे "पावरफुल" चंपत राय को सबकुछ पता न हो, ऐसा कैसे संभव है !
- SIT को जाँच के लिए 15 दिन और मिले, जाँच का दायरा बढ़ा
- 400 प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड्स की भी जांच
- #Social_Media : श्रीराम मंदिर निर्माण से पूर्ण होने से पहले / पश्चात नेताओं के कुछ बयान
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| चंपत राय का ड्राइवर रमाशंकर यादव "टिन्नू" UPP कस्टडी में #Dharm_Nagari_ |
अयोध्या ब्यूरो (धर्म नगरी / DN News)
(कवरेज, फ्री कॉपी मंगवाने /अपने नाम से बटवाने हेतु- 810910 7075 -वा.एप)
अयोध्या के राम मंदिर में दान व चढ़ावा चोरी के मामले में आज (एक जुलाई) उत्तर प्रदेश पुलिस UPP ने कोर्ट को बताया, कि किस आरोपी से चोरी का कितना पैसा और सोना चांदी बरामद किया है। कोर्ट को दी जानकारी के अनुसार, UPP ने सात आरोपियों से अब तक लगभग 78 लाख रु बरामद किए हैं। इसमें आरोपी अविनाश शुक्ला से लगभग 20.39 लाख ₹ बरामद किए। विशेष बात यह है, कि इसके पास लगभग 1100 अमेरिकी डॉलर्स भी मिले, जिनकी कीमत है लगभग एक लाख ₹ और लगभग 11 ग्राम सोना एवं 159 ग्राम चांदी भी अविनाश शुक्ला मिली है।
चंपत राय को सबकुछ पता न हो, ऐसा कैसे सम्भव है ?
राम मंदिर ट्रस्ट के दूसरे सबसे पावरफुल व्यक्ति चंपत राय बंसल थे। महंत नृत्य गोपाल दास के बाद महासचिव का पद उन्हीं के पास था। निर्माण की पहली ईंट रखने से लेकर मंदिर के उद्घाटन तक चंपत राय के बिना कोई कार्यक्रम नहीं हुआ। मंदिर के भूमि-पूजन से अब तक राम मंदिर में चंपत राय की ही चला करती थी। उनकी अनुमति के बिना पत्ता नहीं हिलता था। तो फिर दो साल से चढ़ावा चोरी कैसे होता रहा ? यह सवाल सभी रामभक्तों के मन में है।
चंपत राय पहले दिन से सवालों के घेरे में है। यह बात किसी के गले नहीं उतर रही, कि चंपत राय को कुछ मालूम न हो। ऐसा कैसे हो सकता है ? दान राशि और चढ़ावा चोरी उनकी पीठ पीछे होता रहा उनको कैसे नहीं मालूम ?
चंपत राय पहले दिन से सवालों के घेरे में है। यह बात किसी के गले नहीं उतर रही, कि चंपत राय को कुछ मालूम न हो। ऐसा कैसे हो सकता है ? दान राशि और चढ़ावा चोरी उनकी पीठ पीछे होता रहा उनको कैसे नहीं मालूम ?
बरामद हुई चीजें तो कुछ चोरी हुए रूपये और सामानों का एक अंश है। अनुमान लगाया जा सकता है, अब तक न जाने कितने पैसे से दूसरी चीजे, प्रॉपर्टी खरीद चुके होंगे, पैसा खर्च कर चुके होंगे निवेश कर चुके होंगे। कितना सोना चांदी बाजार में बेच चुके होंगे। इसका कोई हिसाब ही नहीं है।
करुणेश पांडे से लगभग 18.07 लाख ₹ मिले। अनुकल्प मिश्रा से लगभग 16.82 लाख ₹, लवकुश मिश्रा के पास से लगभग 14.25 ₹ लाख, रमाशंकर मिश्रा से लगभग 7.32 लाख ₹ और लगभग 25 ग्राम चांदी भी मिली। मनीष कुमार यादव से दो लाख ₹ और रमाशंकर यादव के पास से एक लाख ₹ बरामद हुए हैं। ये सभी कौन हैं, जिनकी एक महीने का वेतन 20 से 25,000 ₹ तक है। अर्थात ये साल के 2.50 से तीन लाख ₹ कमाते हैं, लेकिन इनके आरंभिक जाँच ये सब बरामद हो रहा है।
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UPP ने इन आठ आरोपियों (एक अज्ञात) में से चार के घरों पर छापेमारी की। उत्तर प्रदेश सरकार ने आज (एक जुलाई) दान चढ़ावे की चोरी की जांच कर रही एसआईटी का कार्यकाल 15 दिनों के लिए और बढ़ा दिया। 13 जून को जब इस SIT का गठन हुआ था, तब इसे जांच के लिए 15 दिनों का समय दिया। फिर SIT ने अपनी आरंभिक रिपोर्ट योगी आदित्यनाथ की सरकार को सौंप दी थी, लेकिन अब इस जांच का दायरा बढ़ता जा रहा है। कई नए खुलासे रोज हो रहे हैं। इसलिए इस एसआईटी को अब 15 दिनों का समय और दिया गया है।
SIT की आरम्भिक रिपोर्ट के बाद ही मामले में FIR दर्ज हुई, गिरफ्तारी हुई। अब मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े लगभग 400 प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड्स की भी जांच होने की भी बात आ रही है, जिनकी ड्यूटी मंदिर के प्रवेश एवं निकास (Entry and Exit) के अलावा उस रास्ते पर भी थी, जहां से दान-पात्र काउंटिंग रूम तक लाए जाते थे। प्राइवेट सिक्योरिटी को लेकर कई बार ऐसा होता है, कि जो सिक्योरिटी गार्ड्स वो भी आरोपियों के साथ मिल जाते हैं और फिर मिलकर चोरी करवाते हैं। ऐसा केवल एक मंदिर में नहीं हो रहा। प्रायः हमने देखा है, क्योंकि बहुत सारी प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसियों के गार्ड्स की ऐसी ट्रेनिंग और उनके पास इस प्रकार के लोग हैं, जिनके जिन पर आप पूरा विश्वास कर सकें। प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड्स छोटे-मोटे लालच में अपराधियों के साथ ही मिल जाते हैं। यहां भी ऐसा लगता है, कि जो सिक्योरिटी गार्ड्स वो इन लोगों के साथ मिल गए होंगे, क्योंकि उन्हें भी छोटा-मोटा पैसा मिल जाता होगा।
मन्दिर की सुरक्षा या सिक्योरिटी के बाद दान व चढ़ावे की चोरी वास्तव में मंदिर के आंतरिक सिस्टम की असफलता है। मंदिर में चढ़ावे की गिनती के सिस्टम में ही ऐसी कमियाँ और दोष थे, जिसका लाभ उठाकर चोरी की गई। पूरे राम मंदिर में 40 दान पात्र लगे हैं। औसतन 75,000 से एक लाख श्रद्धालु प्रतिदिन आते हैं। और जब कोई विशेष अवसर होता है, कोई तीज-त्यौहार आदि होते हैं, तब श्रद्धालुओं की संख्या ₹ लाख तक पहुंच जाती है एक दिन में।
प्रतिदिन रोजाना करीब ₹ लाख से ₹1 लाख तक का दान आता है और त्योहारों पर और खास दिनों पर यह जो दान है यह ₹ लाख तक पहुंच जाता है। चढ़ावा वर्ष 2024 और 25 में यानी एक साल में इस मंदिर को 153 करोड़ का दान, इस चढ़ावे में कैश था। उसके अलावा सोना, चांदी और हीरे, जवाहरात, ज्वेलरी यह सब होता है। अब तीन पॉइंट्स में समझिए कि यहां हर दिन लाखों रुपए के चढ़ावे की गिनती होती कैसे है? पहला दान पात्र को एक कंटेनर में रखा जाता है जिस पर ताला लगाया जाता है और फिर उसे काउंटिंग रूम तक ले जाया जाता है। यह काउंटिंग रूम इस मंदिर के तीर्थ यात्री सुविधा केंद्र के बेसमेंट में है और इस काउंटिंग रूम में मंदिर के 40 दान पात्रों को ट्रस्ट के अधिकारियों, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के कर्मचारियों और काउंटिंग करने वाले कर्मचारियों की मौजूदगी में ही खोला जाता है। यानी एक साथ बहुत सारे गवाह होते हैं। एक साथ बहुत सारे लोग होते हैं। अलग-अलग प्रकार के लोग होते हैं। उनके सामने यह खुलता है।
दूसरी बात इस काउंटिंग रूम में 44 कर्मचारी दो शिफ्टों में चढ़ावे की गिनती करते हैं। यह कर्मचारी अपने हाथों से कैश गिनकर उसकी नोटों की गड्डियां बनाते हैं। और तीसरी बात कैश की इन गड्डियों को बैंक के कंटेनर में रखकर सील किया जाता है और फिर इन्हें स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की ब्रांच में भेजा जाता है, जहां पर बैंक के कर्मचारी इसे श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट के बैंक अकाउंट में जमा कर देते हैं। इसमें किसी चेक का इस्तेमाल नहीं होता बल्कि सीधे बैंक अकाउंट में डिजिटल तरीके से यह जमा कर दिया जाता है। अब सवाल यह है कि अगर मंदिर में चढ़ावे की गिनती का सिस्टम इतना मजबूत था तो फिर चोरी कैसे हुई ? यह गड़बड़ी एक नहीं बल्कि अलग-अलग स्तरों पर हुई है।
पहला नियम-
चढ़ावे की गिनती करने वाले कर्मचारियों की जो ड्रेस होगी यानी जो वो कपड़े पहनेंगे उसके अंदर जेब नहीं होगी। कोई पॉकेट नहीं होगी। तो जब ऐसे कपड़े पहनकर गिनती की जाएगी जिनमें कोई पॉकेट नहीं है तो फिर कोई जेब में पैसा ले जा ले जा भी नहीं सकता। चोरी नहीं हो पाएगी। लेकिन कई कर्मचारी सामान्य कपड़े पहनकर भी चढ़ावे की गिनती करने लगे। और थोड़े दिन के बाद ऐसा हुआ कि यह जो बिना जेब के कपड़े पहनने का नियम था इसे लोगों ने तोड़ दिया और लोग जेब वाले कपड़े पहनकर आने लगे। अब किसने अपनी जेब में कितने रुपए डाल लिए, कितना सोना चांदी डाल लिया, कैसे पता चलेगा ?
दूसरा नियम-
सीसीटीवी की निगरानी होने के बावजूद इस मंदिर में कई अँधेरे स्थान (ब्लाइंड स्पॉट्स) थे। अर्थात ऐसी स्थान, जहां कैमरे की नजर ही नहीं जाती थी। जांच के मुताबिक चढ़ावा गिनने वाले कर्मचारी कई बार कैमरे के लेंस के ठीक सामने कुछ इस तरह से खड़े हो जाते थे जिससे कैमरा पूरी घटना को सही तरीके से रिकॉर्ड ना कर पाए यानी वो कैमरे का जो व्यू था उसे ब्लॉक कर देते थे।
तीसरा सीसीटीवी फुटेज से यह भी पता चला कि कई बार कैश की गड्डियां सीधे बैंक में जमा होने की बजाय कुछ लोगों को दे दी गई। यानी कैश जमा करने की तय प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ और यह गड्डियां पहले कहीं और गई और फिर बाद में बैंक गई।
चौथा नियम-
गिनती का काम आउटसोर्स कर्मचारियों से कराया जा रहा था। इनकी जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से तय नहीं की गई थी और चढ़ावे की गिनती के दौरान इनकी सही तरीके से निगरानी भी नहीं की गई और जो व्यक्ति बाहर से लाया गया है जिसका मंदिर के संस्कारों से कोई लेना देना नहीं है जिसकी इस मंदिर में कोई श्रद्धा नहीं है वो तो बाहर से कुछ पहले कुछ और काम करता था अब आउटसोर्स करके उसे यहां ले जाया गया है तो ऐसे जो लोग हैं वो अक्सर भ्रष्टाचार करते हैं उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो मंदिर में चोरी कर रहे हैं। किसी के मकान में चोरी कर रहे हैं। किसी के दफ्तर में चोरी कर रहे हैं। ऐसे लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता।
पांचवा नियम-
मंदिर में आने और जाने वाले कर्मचारियों की तलाशी प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड्स करते थे। जांच में यह पता चला, कि कर्मचारियों की सख्ती से जांच होती ही नहीं थी। पुलिस को शक है, कि इसी का फायदा उठाकर यह कैश मंदिर से बाहर निकाला गया होगा।
छठा नियम- मंदिर में कीमती सामान के रिकॉर्ड और दस्तावेजों में कई गड़बड़ियां मिली। इसीलिए अब पूरे इन्वेंटरी मैनेजमेंट सिस्टम का ऑडिट ऑडिट किया जा रहा है और दान पात्र से कैश निकालने से लेकर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में जमा कराने तक चढ़ावा गिनने की पूरी व्यवस्था काफी हद तक मैनुअल थी। यानी हर स्तर पर लोगों की सीधी भूमिका थी। इंसान के हाथ में सब कुछ था। जिससे चोरी करने वालों को एक मौका मिल गया। इस चोरी में एसआईटी की शुरुआती जांच ने केवल कुछ कर्मचारियों पर ही सवाल नहीं उठाए, बल्कि पूरे "कैश मैनेजमेंट सिस्टम" की खामियों पर सवाल उठाए हैं।
किसी भी मन्दिर जहाँ प्रतिदिन दर्शनार्थियों-श्रद्धालुओं की संख्या एवं दान-चढ़ावा हजारों-लाखों में हो, वहाँ चोरी रोकने के लिए केवल ईमानदार कर्मचारियों की नहीं, बल्कि एक ईमानदार सिस्टम की आवश्यकता होती है। एक पूरी तरह सुरक्षित (Full Proof System) की आवश्यकता होती है, जिससे अगर कोई बेईमानी करे भी, तो उसी दिन, उसी समय वह पकड़ा जा सके। यह सिस्टम श्रीराम मंदिर में नहीं था। बल्कि मंदिर का सिस्टम ऐसा था, जो चोरी को रोक नहीं रहा था, बल्कि चोरी करने वालों की एक प्रकार से मदद ही कर रहा था। यानी जो पूरा सिस्टम है यह प्रोफेशनल नहीं था।
प्रमुख बड़े मंदिरों में श्रद्धालु एवं चढ़ावा
भारत के चार बड़े मंदिरों को कितना चढ़ावा मिलता है और प्रत्येक श्रद्धालु से मिलने वाला जो औसत चढ़ावा है वो कितना है-
मन्दिर श्रद्धालु चढ़ावा प्रति श्रद्धालु चढ़ावा
तिरुपति बालाजी 2.50 करोड़ 161 करोड़ रु 644 रु
माता वैष्णो देवी 94.84 लाख 94.84 करोड़ रु 243 रु
शिरडी साईं 3 करोड़ 660 करोड़ रु 220 रु
राम मंदिर 7 करोड़ 153 करोड़ रु 20-30 रु
श्रीवेंकटेश्वर मंदिर, आंध्र प्रदेश
आंध्र प्रदेश के श्री वेंकटेश्वर मंदिर, जो दुनियाभर में तिरुपति बालाजी के नाम विख्यात है, यहाँ प्रतिवर्ष लगभग ढाई करोड़ श्रद्धालु-भक्त आते हैं। वर्ष 2025 में इस मंदिर को लगभग 1600 करोड़ का चढ़ावा मिला। अर्थात हर श्रद्धालु ने औसतन ₹644 का दान इस मंदिर को दिया। इस मंदिर को आप तिरुपति बालाजी के नाम से भी जानते हैं और इसी मंदिर को पूरे भारत में सबसे ज्यादा चढ़ावा मिलता है।
माता वैष्णो देवी मंदिर,जम्मू
माता वैष्णो देवी मंदिर,जम्मू कश्मीर के में सालाना लगभग 95 लाख लोग आते हैं। इस मंदिर को लगभग 231 करोड़ का चढ़ावा मिला। यानी हर श्रद्धालु ने औसतन ₹43 मंदिर को दान में दिए।
शिरडी साईं मंदिर, महाराष्ट्र
वर्ष 2025 व 2026 में 3 करोड़ श्रद्धालु आए। मंदिर को लगभग ₹60 करोड़ का दान मिला। इस तरह हर श्रद्धालु ने औसतन 220 ₹ मंदिर में चढ़ाए।
श्रीराम मंदिर, अयोध्या
श्रद्धालुओं के मामले में देश के प्रमुख मंदिरों श्रीराम मंदिर में आने वाले श्रद्धालु सर्वाधिक है। श्रीराम मंदिर में लगभग 7 करोड़ श्रद्धालु एक साल में आए, लेकिन मंदिर में 7 करोड़ श्रद्धालुओं ने केवल ₹153 करोड़ चढ़ाया। यानी हर श्रद्धालु ने औसतन केवल 20-30 ₹ मंदिर में चढ़ाए।
अन्य प्रमुख मंदिरों की तुलना में राम मंदिर में लोग कम पैसा चढ़ा रहे हैं, इसके पीछे संभवतः दो बातें मुख्य कारण हो सकते हैं- पहला राम मंदिर अभी नवनिर्मित है, जबकि बाकी मंदिर प्राचीन या पुराने हैं, जिनकी व्यवस्थाएं बहुत पुरानी हैं, जिनमे (शिरडी को छोड़कर) पीढ़ियों से एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी, दूसरी के बाद तीसरी पीढ़ी (परिवारों से एक के बाद एक लोग) चले आ रहे हैं। चलन यहां पर ज्यादा है। संभव है, जो प्राचीन मंदिर हैं, इसलिए वहाँ चढ़ावा अधिक आता हो। दूसरा यह भी हो सकता है, कि राम मंदिर में भी चढ़ावा उतना ही आ रहा है, जितना दूसरे मंदिरों में, लेकिन उस चढ़ावे की चोरी हो रही थी।
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