#NagPanchami : कालसर्प दोष से उपाय का दिन, वर्ष में केवल नाग पंचमी को खुलता है उज्जैन का...

नागचंद्रेश्वर मन्दिर
- नाग पंचमी को पाएं नाग देव एवं महादेव की कृपा
- प्रयागराज में यमुनातट पर विराजते है तक्षकेश्वर नाथ
 नागचंद्रेश्वर, उज्जैन #Dharm_Nagari_

भोपाल 
(धर्म नगरी / DN News)
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-राजेश पाठक* 

सनातन हिन्दू धर्म में सदियों से नागों की पूजा करने की परंपरा रही है। हिन्दू परंपरा में नागों को भगवान का आभूषण भी माना गया है। भारत में नागों के अनेक मंदिर हैं, इन्हीं में एक मंदिर है उज्जैन स्थित नागचंद्रेश्वर का, जो की उज्जैन के प्रसिद्ध महाकाल मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित है। इसकी विशेष यह है, कि यह मंदिर साल में केवल एक दिन- नागपंचमी (श्रावण शुक्ल पंचमी) पर ही दर्शन के लिए खोला जाता है। ऐसी मान्यता है, कि नागराज तक्षक स्वयं मंदिर में रहते हैं।

सनानत हिन्दू धर्म में सावन माह का विशेष महत्व होता है और इस माह में पड़ने वाली नाग पंचमी का पर्व आस्था, परंपरा और मान्यता से जुड़ा है। नाग पंचमी का पर्व सावन शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाते हैं। इस साल यह तिथि 29 जुलाई (मंगलवार) को पड़ेगी। धार्मिक मान्यतानुसार, इस दिन भगवान शिव और नागों की पूजा की जाती है। 

नाग पंचमी के दिन आठ नाग-अनन्त, वासुकी, पद्म, महापद्म, तक्षक, कुलीक, कर्कट और शंख की पूजा का विधान है। कहते हैं, इस दिन सच्चे मन से जो नाग देवता की पूजा और शिवलिंग का अभिषेक करता है, उपाय करता है, उससे न केवल नाग देवता की कृपा प्राप्त होती है, भगवान शिव भी प्रसन्न होते हैं। कुंडली से कालसर्प दोष का प्रभाव कम होता है या उससे मुक्ति मिल सकती है, जीवन में चल रही बाधाओं और रोग-दोष भी दूर हो सकते हैं।  

उज्जैन में (ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर मन्दिर के ऊपर) नागचंद्रेश्वर मंदिर में 11वीं शताब्दी की एक अद्भुत प्रतिमा है, इसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं। कहते हैं, यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है। पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं। मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या पर विराजित हैं। शिवशंभू के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए हैं।

क्या है पौराणिक मान्यता ?
सर्पराज तक्षक ने शिव शंकर को मनाने के लिए घोर तपस्या की थी। तपस्या से भोलेनाथ प्रसन्न हुए और उन्होंने सर्पों के राजा तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दिया। मान्यता है, उसके बाद से तक्षक राजा ने प्रभु के सानिध्य में ही वास करना शुरू कर दिया, लेकिन महाकाल वन में वास करने से पूर्व उनकी यही मंशा थी कि उनके एकांत में विघ्न ना हो। अत: वर्षों से यही प्रथा है, मात्र नागपंचमी के दिन ही वे दर्शन को उपलब्ध होते हैं। शेष समय उनके सम्मान में परंपरा के अनुसार मंदिर बंद रहता है। 

नागचंद्रेश्वर मंदिर में दर्शन करने के बाद व्यक्ति किसी भी तरह के सर्प दोष से मुक्त हो जाता है, इसलिए नागपंचमी के दिन मंदिर के बाहर भक्तों की लंबी कतार लगी रहती है। 

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मंदिर का पुन: निर्माण, जीर्णोद्धार
महाकालेश्वर मंदिर अत्यंत प्राचीन है। माना जाता है, परमार राजा भोज ने 1050 ई. के लगभग इस मंदिर का पुन: निर्माण करवाया। इसके बाद सिंधिया घराने के महाराज राणोजी सिंधिया ने 1732 ई. में महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। उस समय इस मंदिर का भी जीर्णोद्धार हुआ। 

नागराज पर विराजे महादेव का वर्ष के एकमात्र दिन (नागपंचमी को) सभी भक्त दर्शन करना चाहते हैं। लगभग दो लाख से ज्यादा भक्त एक दिन में नागदेव के दर्शन करते हैं। नागपंचमी पर होने वाले भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन के लिए श्रावण शुक्ल चतुर्थी (16-17 अगस्त, रविवार रात्रि 12) खुलेगा, जो नागपंचमी (सोमवार, 17 अगस्त) की रात्रि 12 बजे तक मंदिर का पट खुलेगा। नागपंचमी (सोमवार) की रात्रि 12 बजे मंदिर में पुन: आरती के पश्चात मंदिर के पट पुन: (364 दिन तक) बंद कर दिए जाएंगे।

महाकालेश्वर मंदिर श्री महानिर्वाणी अखाड़े के अंतर्गत आता है। नागचंद्रेश्वर मंदिर की पूजा और व्यवस्था श्री महानिर्वाणी अखाड़े के संन्यासियों द्वारा की जाती है। उल्लेखनीय है, महाकाल ज्योतिर्लिंग महानिर्वाणी अखाड़े के अंतर्गत है, इसीलिए अखाड़े द्वारा नियुक्त पीठाधीश महंत के नेतृत्व में ही सभी प्रमुख पर्व / तिथि पूजन-अनुष्ठान होता है।  
नागपंचमी पर्व पर बाबा महाकाल और भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग प्रवेश की व्यवस्था की गई है। इनकी कतारें भी अलग होंगी। रात में भगवान नागचंद्रेश्वर मंदिर के पट खुलते ही श्रद्धालुओं की दर्शन की आस पूरी होगी। नागपंचमी को दोपहर 12 बजे कलेक्टर पूजन करेंगे। यह सरकारी पूजा होगी। यह परंपरा रियासत काल से चली आ रही है। रात 8 बजे श्री महाकालेश्वर प्रबंध समिति द्वारा पूजन होगा।

तक्षकेश्वर नाथ / तक्षक तीर्थ, यमुना तट (दरियाबाद प्रयागराज) 
नाग पंचमी पूजा विधि
इस दिन प्रातः स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर या मंदिर में शिवलिंग के पास स्थित नाग प्रतिमा को दूध, चमेली के फूल, और कच्चा दूध अर्पित करें।

पूजा करते समय निम्न मंत्र का जाप करें-
वासुकिः  तक्षकश्चैव  कालियो मणिभद्रकः।
ऐरावतो    धृतराष्ट्रः   कार्कोटक  धनंजयौ॥
एतेऽभयं प्रयच्छन्ति प्राणिनां प्राणजीविनाम्॥

नाग पंचमी पूजन मंत्र
सर्वे नागा: प्रीयन्तां मे ये  केचित्  पृथ्वीतले।
ये च हेलिमरीचिस्था येन्तरे दिवि संस्थिता।।
ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिन:।
ये च वापीतडगेषु  तेषु  सर्वेषु  वै नम:।।


आप ॐ नमः शिवाय या  ॐ नागाय नमः मंत्र का जप भी कर सकते हैं।


अवश्य करें ये कार्य
✔ नाग देवता और भगवान शिव की पूजा करें।
✔ शिवलिंग पर जल, बेलपत्र और दूध चढ़ाएं।
✔ निर्धनों और ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र और दक्षिणा दान करें।
✔ नाग मंदिर में जाकर दूध चढ़ाएं।
इन छोटे, लेकिन पवित्र कार्यों से जीवन में धन, सुख, शांति और समृद्धि आती है।
 
नाग पंचमी के दिन कुछ कार्य वर्जित माने जाते हैं, जिनसे नागों को नुकसान हो सकता है:
➤ सुई-धागा, चाकू, कैंची या कोई भी नुकीली चीज का उपयोग न करें।
➤ तवे पर रोटी न बनाएं - यह परंपरा से जुड़ा निषेध है।
➤ जमीन की खुदाई न करें। मान्यता है कि इससे सांपों के बिल को नुकसान पहुंच सकता है।

नाग पंचमी की पूजा सामग्री
नाग देवता की प्रतिमा या फोटो, कुशासन, दही, शुद्ध देशी घी, शहद, गंगा जल, पवित्र जल, पंच रस, इत्र, मौली जनेऊ, दूध, पुष्प, पंच फल, पंच मेवा, बेर, आम्र मंजरी, जौ की बालें, तुलसी दल, मंदार पुष्प, गाय का कच्चा दूध, पूजा के बर्तन, पंच मिठाई, बिल्वपत्र, धतूरा, भांग, गन्ने का रस, कपूर, धूप, हल्दी, रोली, चावल, और फल।

नाग पंचमी की पूजा-विधि 
⇒ नाग पंचमी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान कर साफ वस्त्र धारण करें।
⇒ इसके बाद देवी-देवताओं का ध्यान करें।
⇒ अब सूर्य देव को जल चढ़ाएं।
⇒ पूरे घर में गंगाजल का छिड़काव करें। 
⇒ घर के मंदिर के पास एक साफ चौकी रखें उस पर साफ कपड़ा बिछाएं।
⇒ उस पर नाग देवता का चित्र या फिर मिट्टी से बने हुए सर्प की मूर्ति स्थापित करें।
⇒ इसके बाद नाग देवता को चावल, रोली और हल्दी चढ़ाएं।
⇒ प्रतिमा के सामने घी या तिल के तेल का दीपक जलाएं और विधि-पूर्वक पूजा करें। 
⇒ पूजा के उपरांत मंत्रों का जाप करें।
⇒ नाग पंचमी व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
⇒ अब नाग देवता की आरती उतारें।
अंत में नाग देवता को दूध का भोग का भोग लगाएं।

नाग पंचमी मंत्र 
अनंतं  वासुकि शेष  पद्मनाभं च कम्बलम्।
शड्खपाल धार्तराष्ट्र तक्षकं कालियं तथा।।
एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्।
सायंकाले पठेन्नित्यं प्रातः काले विशेषतः।।
तस्मे  विषभयं नास्ति  सर्वत्र विजयीं भवेत्।

नाग पंचमी की आरती
(नाग देवता की आरती)
श्रीनागदेव आरती पंचमी की कीजै,
तन मन धन सब अर्पण कीजै।
नेत्र   लाल   भृकुटी  विशाला,
चले बिन पैर सुने बिन काना।
उनको अपना सर्वस्व दीजे।।

पाताल  लोक  में  तेरा  वासा,
शंकर  विघन विनायक नासा,
भगतों का सर्व कष्ट हर लीजै।

शीश मणि मुख विषम ज्वाला,
दुष्ट  जनों  का  करे  निवाला।
भगत  तेरो अमृत  रस  पिजे, 
वेद पुराण सब महिमा गावें।

नारद  शारद  शीश निवावें,
सावल सा से वर तुम दीजे।
नोंवी के दिन ज्योत जगावे,
खीर चूरमे का भोग लगावे।
रामनिवास तन मन धन सब अर्पण कीजै।
आरती श्री नागदेव जी कीजै।।
*लेखक
अवैतनिक सम्पादक
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