ऋषि पंचमी : सप्त ऋषियों की पूजा एवं महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़ा है यह व्रत, ऋषि पंचमी की है...
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रा.पाठक अवैतनिक संपादक
सनातन हिन्दू धर्म में ऋषि पंचमी का पर्व सप्तऋषियों की पूजा के लिए जाना जाता है, लेकिन इस व्रत की एक पुरानी धार्मिक मान्यता मासिक धर्म से भी जुड़ी हुई है। इस कारण परंपरागत रूप से इस व्रत को महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना गया।
ऋषि पंचमी से जुड़ी कुछ व्रत, कथाओं और धर्मग्रंथीय परंपराओं में मासिक धर्म के दौरान माने जाने वाले नियमों का पालन न कर पाने को ‘रजस्वला दोष’ से जोड़ा गया है। इस व्रत को ऐसे दोष के प्रायश्चित और शुद्धि की धार्मिक भावना से जोड़ा गया।
कब रखा जाएगा ऋषि पंचमी का व्रत
पंचांग के अनुसार, साल 2026 में ऋषि पंचमी का व्रत 15 सितंबर, मंगलवार को रखा जाएगा। पंचमी तिथि 15 सितंबर सुबह 7:44 बजे से 16 सितंबर को सुबह 8:59 बजे तक रहेगी। चूंकि 15 सितंबर को पंचमी तिथि दोपहर के समय भी रहेगी, इसलिए इसी दिन ऋषि पंचमी का व्रत और पूजन किया जाएगा। ऋषि पंचमी के दिन कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ सहित सप्तऋषियों का पूजन किया जाता है। कुछ परंपराओं में वशिष्ठ ऋषि की पत्नी अरुंधती का भी स्मरण किया जाता है।
मासिक धर्म से ऋषि पंचमी का संबंध
ऋषि पंचमी से जुड़ी पुरानी मान्यताओं को समझने के लिए उस समय की शुद्धि-अशुद्धि की धार्मिक अवधारणा को समझना जरूरी है। कुछ धर्मशास्त्रीय परंपराओं में मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को कुछ घरेलू और धार्मिक गतिविधियों से अलग रखने के नियम बताए गए थे। इनमें रसोई में खाना बनाने, पूजा-पाठ करने, धार्मिक वस्तुओं को छूने या कुछ लोगों के संपर्क में आने से परहेज जैसी परंपराएं शामिल थीं।
ऐसी मान्यता थी, अगर रजस्वला अवस्था में महिला से इन निर्धारित नियमों का उल्लंघन हो जाए, तो उससे धार्मिक दोष उत्पन्न होता है। इसी अवधारणा को बाद की व्रत परंपराओं में ‘रजस्वला दोष’ कहा गया और ऋषि पंचमी के व्रत को इससे मुक्ति पाने वाले प्रायश्चित के रूप में बताया गया। धार्मिक स्रोतों में यह भी मिलता है, कि शुरुआती दौर में ऋषि पंचमी का व्रत केवल महिलाओं तक सीमित नहीं था, लेकिन बाद की परंपराओं में इसका संबंध महिलाओं और मासिक धर्म से अधिक मजबूती से जोड़ा गया।
मासिक धर्म को ‘दोष’ से जोड़ने वाली कथा
उक्त मान्यता के पीछे एक महत्वपूर्ण कथा इंद्र और वृत्रासुर से जुड़ी है। कुछ पुराणिक परंपराओं में बताया है, कि इंद्र ने वृत्र का वध किया और इसके बाद उन पर ब्रह्महत्या का पाप लगा। इस पाप को कम करने के लिए इसे चार हिस्सों में बांटकर अलग-अलग स्थानों पर बांटने की कथा मिलती है। इसी परंपरा में पाप के एक हिस्से को महिलाओं के मासिक धर्म से जोड़ा गया। बाद की धार्मिक व्याख्याओं में इसी कारण मासिक धर्म के रक्त को धार्मिक दृष्टि से ‘दोष’ या ‘अपवित्रता’ की अवधारणा से जोड़ दिया गया। ऋषि पंचमी की व्रत परंपरा में इस मान्यता को महिलाओं द्वारा मासिक धर्म के दौरान अनजाने में हुए कथित धार्मिक उल्लंघनों के प्रायश्चित के संदर्भ में किया गया।
रजस्वला अवस्था में किन बातों पर रोक थी
पुरानी सामाजिक-धार्मिक परंपराओं में रजस्वला महिला को कुछ दिनों के लिए घरेलू और धार्मिक गतिविधियों से अलग रखने की प्रथा कई क्षेत्रों में रही है। कुछ परंपराओं में इस दौरान रसोई में जाने, भोजन तैयार करने, पानी भरने और पूजा करने से रोकने का उल्लेख मिलता है। कुछ जगहों पर पुरुषों और धार्मिक वस्तुओं को छूने से भी परहेज कराया जाता था।
ऋषि पंचमी भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष के पांचवें दिन मनाई जाती है। प्रायः ऋषि पंचमी गणेश चतुर्थी के एक दिन बाद ही आती है। इस वर्ष भी यह तिथि गणेश चतुर्थी के अगले ही दिन- मंगलवार (15 सितम्बर, 2026) को पड़ेगी। यह दिन सप्त ऋषि की पूजा का दिन है। केरल में इस दिन को विश्वकर्मा पूजा के रूप में भी मनाया जाता है। ऋषि पंचमी व्रत में मुख्य रूप से उन महान संतों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता व्यक्त की जाती है, जिन्होंने समाज के कल्याण में बहुत योगदान दिया।
मान्यता है, ऋषि पंचमी व्रत का व्रत सभी के लिए लाभकारी होता है, लेकिन इस व्रत को महिलाओं द्वारा विशेष रूप से किया जाता है। ऋषि पंचमी एक महिला के लिए पति के प्रति अपनी आस्था, कृतज्ञता, विश्वास और सम्मान व्यक्त करने का एक माध्यम है। इस पर्व पर व्रत करने से अज्ञानता में किए या हुए पापों का भी नाश होता है।
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सनातन हिन्दू परंपरा के अनुसार, जो महिलाएं मासिक धर्म या पीरियड (योनि के माध्यम से गर्भाशय की आंतरिक परत से रक्त और श्लेष्म ऊतक का नियमित निर्वहन) का अनुभव कर रही हैं, उन्हें धार्मिक गतिविधियों को करने या घरेलू कार्यों (रसोई के काम सहित) में सम्मिलित होने से मना किया जाता है, जब तक वे उस अवस्था में हैं। यहां तक उन्हें पाठ-पूजा से जुड़ी वस्तुओं को छूने की भी मनाही होती है। यदि किसी मजबूरी या गलती से अथवा अन्य कारणों से ऐसा करती हैं, तो वे रजस्वला दोष की भागी होती हैं। इस दोष से छुटकारा पाने के लिए महिलाएं ऋषि पंचमी का व्रत रखती हैं।
ऋषि पंचमी को "भाई पंचमी" के नाम से भी जाना जाता है। माहेश्वरी समाज में बहनें इस दिन भाइयों को राखी बांधती है। बहनें व्रत रखती हैं और अपने भाई की दीर्घायु की कामना करती हैं और पूजा करने के बाद ही भोजन करती हैं।
पंचांग के अनुसार, साल 2026 में ऋषि पंचमी का व्रत 15 सितंबर, मंगलवार को रखा जाएगा। पंचमी तिथि 15 सितंबर सुबह 7:44 बजे से 16 सितंबर को सुबह 8:59 बजे तक रहेगी। चूंकि 15 सितंबर को पंचमी तिथि दोपहर के समय भी रहेगी, इसलिए इसी दिन ऋषि पंचमी का व्रत और पूजन किया जाएगा। ऋषि पंचमी के दिन कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ सहित सप्तऋषियों का पूजन किया जाता है। कुछ परंपराओं में वशिष्ठ ऋषि की पत्नी अरुंधती का भी स्मरण किया जाता है।
मासिक धर्म से ऋषि पंचमी का संबंध
ऋषि पंचमी से जुड़ी पुरानी मान्यताओं को समझने के लिए उस समय की शुद्धि-अशुद्धि की धार्मिक अवधारणा को समझना जरूरी है। कुछ धर्मशास्त्रीय परंपराओं में मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को कुछ घरेलू और धार्मिक गतिविधियों से अलग रखने के नियम बताए गए थे। इनमें रसोई में खाना बनाने, पूजा-पाठ करने, धार्मिक वस्तुओं को छूने या कुछ लोगों के संपर्क में आने से परहेज जैसी परंपराएं शामिल थीं।
ऐसी मान्यता थी, अगर रजस्वला अवस्था में महिला से इन निर्धारित नियमों का उल्लंघन हो जाए, तो उससे धार्मिक दोष उत्पन्न होता है। इसी अवधारणा को बाद की व्रत परंपराओं में ‘रजस्वला दोष’ कहा गया और ऋषि पंचमी के व्रत को इससे मुक्ति पाने वाले प्रायश्चित के रूप में बताया गया। धार्मिक स्रोतों में यह भी मिलता है, कि शुरुआती दौर में ऋषि पंचमी का व्रत केवल महिलाओं तक सीमित नहीं था, लेकिन बाद की परंपराओं में इसका संबंध महिलाओं और मासिक धर्म से अधिक मजबूती से जोड़ा गया।
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उक्त मान्यता के पीछे एक महत्वपूर्ण कथा इंद्र और वृत्रासुर से जुड़ी है। कुछ पुराणिक परंपराओं में बताया है, कि इंद्र ने वृत्र का वध किया और इसके बाद उन पर ब्रह्महत्या का पाप लगा। इस पाप को कम करने के लिए इसे चार हिस्सों में बांटकर अलग-अलग स्थानों पर बांटने की कथा मिलती है। इसी परंपरा में पाप के एक हिस्से को महिलाओं के मासिक धर्म से जोड़ा गया। बाद की धार्मिक व्याख्याओं में इसी कारण मासिक धर्म के रक्त को धार्मिक दृष्टि से ‘दोष’ या ‘अपवित्रता’ की अवधारणा से जोड़ दिया गया। ऋषि पंचमी की व्रत परंपरा में इस मान्यता को महिलाओं द्वारा मासिक धर्म के दौरान अनजाने में हुए कथित धार्मिक उल्लंघनों के प्रायश्चित के संदर्भ में किया गया।
रजस्वला अवस्था में किन बातों पर रोक थी
पुरानी सामाजिक-धार्मिक परंपराओं में रजस्वला महिला को कुछ दिनों के लिए घरेलू और धार्मिक गतिविधियों से अलग रखने की प्रथा कई क्षेत्रों में रही है। कुछ परंपराओं में इस दौरान रसोई में जाने, भोजन तैयार करने, पानी भरने और पूजा करने से रोकने का उल्लेख मिलता है। कुछ जगहों पर पुरुषों और धार्मिक वस्तुओं को छूने से भी परहेज कराया जाता था।
ऋषि पंचमी से जुड़ी नेपाली परंपराओं के अध्ययन में भी ऐसे नियमों का उल्लेख मिलता है, जिनमें मासिक धर्म के शुरुआती दिनों में महिलाओं को खाना बनाने, पानी ले जाने और पूजा जैसे कार्यों से अलग रखने की बात सामने आती है। यहीं से ऋषि पंचमी का व्रत एक तरह के प्रायश्चित अनुष्ठान के रूप में विकसित हुआ। मान्यता रखने वाली महिलाएं सप्तऋषियों की पूजा और व्रत के माध्यम से पिछले मासिक चक्रों में हुए कथित नियम-उल्लंघन से मुक्ति की कामना करती थी।
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(डिस्क्लेमर- उक्त सभी जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं एवं धर्मग्रंथों पर आधारित हैं।)
क्या सर्वत्र है यही मान्यता
नहीं। ऋषि पंचमी से जुड़ी परंपराएं क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हैं। कहीं इसे मुख्य रूप से सप्तऋषियों की पूजा और उनके प्रति कृतज्ञता का दिन माना जाता है, तो कहीं महिलाओं के व्रत और रजस्वला संबंधी पुरानी मान्यताओं से जोड़ा जाता है। नेपाल और भारत के कुछ हिस्सों में इस पर्व की परंपरा विशेष रूप से महिलाओं से जुड़ी रही है। इसलिए ‘ऋषि पंचमी का व्रत केवल मासिक धर्म के दोष से मुक्ति के लिए होता है’ कहना पूरी परंपरा को एक ही पहलू तक सीमित कर देना होगा। इसका दूसरा प्रमुख पक्ष सप्तऋषियों की आराधना और भारतीय ऋषि परंपरा के प्रति सम्मान है।
ऋषि पंचमी पर सप्तऋषियों की पूजा
ऋषि पंचमी पर सप्तऋषियों की पूजा
ऋषि पंचमी के दिन सप्तऋषियों कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ का स्मरण और पूजन किया जाता है। धार्मिक मान्यता में इन्हें ज्ञान, तप, साधना और धर्म परंपरा के वाहक के रूप में देखा जाता है। व्रत रखने वाले श्रद्धालु स्नान के बाद पूजा स्थल की सफाई करते हैं और सप्तऋषियों का ध्यान करके जल, अक्षत, फूल, फल और अन्य पूजा सामग्री अर्पित करते हैं। कई स्थानों पर दान और सात्विक भोजन की भी परंपरा है।
इस तरह ऋषि पंचमी की परंपरा में सप्तऋषियों की आराधना और मासिक धर्म से जुड़ी प्राचीन शुद्धि-अशुद्धि की मान्यता दोनों पहलू दिखाई देते हैं। आज इस व्रत को समझते समय यह अंतर रखना जरूरी है कि ‘रजस्वला दोष’ धार्मिक-पौराणिक अवधारणा है, जबकि मासिक धर्म स्वयं एक स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया है। इसलिए इस पर्व की परंपरा को उसके ऐतिहासिक और धार्मिक संदर्भ में समझना अधिक उचित है।
इस तरह ऋषि पंचमी की परंपरा में सप्तऋषियों की आराधना और मासिक धर्म से जुड़ी प्राचीन शुद्धि-अशुद्धि की मान्यता दोनों पहलू दिखाई देते हैं। आज इस व्रत को समझते समय यह अंतर रखना जरूरी है कि ‘रजस्वला दोष’ धार्मिक-पौराणिक अवधारणा है, जबकि मासिक धर्म स्वयं एक स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया है। इसलिए इस पर्व की परंपरा को उसके ऐतिहासिक और धार्मिक संदर्भ में समझना अधिक उचित है।
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ऋषि पंचमी : पूजा विधि और अनुष्ठान
ऋषि पंचमी के दिन स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। अपने घर में साफ जगह पर हल्दी, कुमकुम और रोली का उपयोग करके एक चौकोर आकार का चित्र (मंडल) बनाएं। मंडल पर सप्त ऋषि (सात ऋषि) की प्रतिमा स्थापित करें। चित्र के ऊपर शुद्ध जल और पंचामृत डालें। चंदन से टीका लगाएं। सप्तऋषि को फूलों की माला और पुष्प अर्पित करें। अब उन्हें पवित्र धागा (यज्ञोपवीत) पहनाएं। सफेद वस्त्र भेंट करें। फल, मिठाई आदि भी अर्पित करें। उस स्थान पर धूप आदि रखें।
अनेक क्षेत्रों में यह प्रक्रिया नदी के किनारे या किसी तालाब के पास की जाती है। इस पूजा के बाद महिलाएं अनाज का सेवन नहीं करतीं। ऋषि पंचमी के दिन वे एक विशेष तरह के चावल का सेवन करती हैं। ऋषि पंचमी का सर्वोत्तम उपयोग अपने सभी दोषों को दूर करने एवं अपनी मनोकामना हेतु करें।
ऋषि पंचमी व्रत में क्या खाएं
ऋषि पंचमी पर खाने की परंपरा प्रत्येक संस्कृति में अलग होती है। पहले के दिनों में, भक्त अनाज से तैयार भोजन के बजाय भूमिगत उगने वाले फलों का सेवन करते थे। जैनियों के लिए यह दिन महत्वपूर्ण है। चूंकि जैन धर्म में दो संप्रदाय हैं, श्वेतांबर पंथ, जो ऋषि पंचमी को परशुजन (पर्युषण) महापर्व के अंत के रूप में मनाते हैं, जबकि दिगंबर पंथ इस दिन को महापर्व की शुरुआत के रूप में मानते हैं।
महाराष्ट्र में इस दिन एक विशेष भोजन पकाया जाता है, जिसे ऋषि पंचमी भाजी के नाम से जाना जाता है। इसे मौसमी सब्जियों के साथ पकाया जाता है। प्रायः पर इस व्यंजन को बनाते समय कंद का उपयोग किया जाता है। इस भाजी को एक तरह से पकाया जाता है, जिस तरह ऋषि तैयार किया करते थे अर्थात साधारण और बिना मसाले के।
ऋषि पंचमी के दिन व्रत करने वाले श्रद्धालु / भक्त इस भाजी से अपना व्रत खोलते हैं। व्रत खोलने के लिए इस भाजी का सेवन करते हैं। इस भाजी की मुख्य सामग्री है अमरनाथ के पत्ते- चवली, हाथी पैर यम-सूरन, शकरकंदी, आलू, सर्प लौकी- चिचिंडा, मूंगफली, कद्दू, अरबी के पत्ते, अरबी और कच्चा केला। इन सभी सब्जियों पहले लोग इस भाजी को मिट्टी के बर्तनों में पकाया करते थे, आजकल इसकी जगह धातु के बर्तनों ने ले ली है। इस प्रकार ऋषि पंचमी व्रत ऋषियों के नि:स्वार्थ परिश्रम को समर्पित है। यह एक ऐसा दिन है, जो भक्तों को अपने तन-मन और आत्मा को शुद्ध करने का अवसर देता है। इस पूरे दिन के उपवास के जरिए पाचन तंत्र को भी मजबूत किया जाता है।
ऋषि पंचमी व्रत की कथा
एक बार की बात है, विदर्भ देश में एक ब्राह्मण अपनी समर्पित पत्नी के साथ रहता था। ब्राह्मण के एक पुत्र और एक पुत्री थी। उसने अपनी बेटी की शादी एक सुसंस्कृत ब्राह्मण व्यक्ति से कर दी, लेकिन लड़की के पति की असमय मृत्यु हो गई, जिससे लड़की विधवा का जीवन व्यतीत करने लगी। वह अपने पिता के यहां वापस आ गई और फिर वहीं रहने लगी। कुछ दिनों बाद लड़की के पूरे शरीर में कीड़े हो गए। जिसने उसके लिए मुश्किलें खड़ी कर दीं। उसके माता-पिता भी चिंतित हो गए। वे इस समस्या के समाधान के लिए ऋषि के पास गए। प्रबुद्ध ऋषि ने ब्राह्मण की बेटी के पिछले जन्मों में झांका। ऋषि ने ब्राह्मण और उसकी पत्नी से कहा, कि उनकी बेटी ने अपने पिछले जन्म में एक धार्मिक नियम का उल्लंघन किया था। मासिक धर्म के दौरान उसने रसोई के कुछ बर्तनों को छुआ था। ऐसा करके उसने उस पाप को आमंत्रित किया था, जो उसके वर्तमान जन्म में परिलक्षित हो रहा था।
पवित्र शास्त्रों में कहा गया है, जो महिला मासिक धर्म में हैं, उसे धार्मिक चीजों और बर्तनों को नहीं छूना चाहिए। ऋषि ने उन्हें आगे बताया कि लड़की ने ऋषि पंचमी का व्रत भी नहीं किया था, यही कारण है कि उसे इन परिणामों का सामना करना पड़ा। ऋषि ने ब्राह्मण से यह भी कहा कि अगर लड़की पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ ऋषि पंचमी का व्रत रखते हुए अपने पापों के लिए क्षमा मांगती है, तो उसे अपने पिछले कर्मों से छुटकारा मिल जाएगा और उसका शरीर कीड़ों से मुक्त हो जाएगा। लड़की ने वही किया, जो उसके पिता ने उसे बताया और वह कीड़ों से मुक्त हो गई।
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