पितृ पक्ष : पितृ पक्ष में पिंडदान, श्राद्ध, तर्पण करने की परंपरा
धर्म नगरी / DN News
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पितृ पक्ष भाद्रपद पूर्णिमा स्नान के साथ रविवार (7 सितंबर 2025) को आरंभ होगा। इस दिन चंद्र ग्रहण भी लगेगा, जो रात 10:58 बजे से 1:26 बजे तक रहेगा। ग्रहण का सूतक काल दोपहर 12:57 बजे से ही शुरू हो जाएगा। इस अवधि में मंदिरों के कपाट बंद रहेंगे, श्रद्धालु पूजा-अर्चना घरों में ही करेंगे।
पितृ पक्ष को श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है। यह काल पितरों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर है। शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति इस अवधि में पितरों का श्राद्ध करता है, उसे जीवन में तरक्की और संतति सुख प्राप्त होता है। पितृ दोष से मुक्ति पाने का भी यह उत्तम समय है। श्राद्ध कर्म गोशाला, देवालय या नदी तट पर करना विशेष फलदायी माना गया है।
पितृ पक्ष के दिनों पितरों के पिंडदान, श्राद्ध, तर्पण आदि कर्म किए जाते हैं। विशेषकर कौए, गाय और कुत्ते को भोजन देने की, चावल के बने पिंड का दान करने की परंपरा है। श्राद्ध पक्ष के संबंध में कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं। के गया (बिहार) में पिंडदान, श्राद्ध कर्म करने का विशेष महत्व है। पितृ पक्ष से जुड़े कुछ तथ्य गया के तीर्थ पुरोहित पं. गोकुल दुबे के मतानुसार इस प्रकार है-
कौए, गाय व कुत्ते को भोजन खिलाना
सभी पितरों का वास पितर लोक और कुछ समय यमलोक भी रहता है। पितृ पक्ष में यम बलि और श्वान बलि देने का विधान है। यम बलि कौए को और श्वान बलि कुत्ते को भोजन के रूप में दी जाती है। कौए को यमराज का संदेश वाहक माना गया है। यमराज के पास दो श्वान यानी कुत्ते भी हैं। इन्हीं की वजह से कौए और कुत्तों को भोजन दिया जाता है। गाय में सभी देवी-देवताओं का वास है। इस वजह से गाय को भी भोजन दिया जाता है।
श्राद्ध में खीर पूड़ी ही खिलाना
पितृ पक्ष में पके हुए अन्न के दान का विशेष महत्व है। खीर को पायस अन्न माना जाता है। पायस को प्रथम भोग मानते हैं, जिसमें दूध और चावल की शक्ति होती है। धान अर्थात चावल ऐसा अनाज है, जो पुराने होने पर खराब नहीं होता। जितना पुराना होता है, उतना ही अच्छा माना जाता है। चावल के इसी गुण के कारण इसे जन्म से मृत्यु तक के संस्कारों में शामिल किया जाता है। इसलिए पितरों को खीर का भोग लगाते हैं। एक लोक मान्यता भी है, भारतीय समाज में खीर-पूड़ी प्रायः विशेष तीज-त्यौहारों पर बनने वाला पकवान है।
पितृ पक्ष भी पितरों का त्यौहार है। माना जाता है, इन दिनों में पितर देवता हमारे घर पधारते हैं। उनके आतिथ्य सत्कार के लिए खीर-पुड़ी बनाई जाती है। इसका एक व्यावहारिक कारण और है। सावन के महीने को पुराने समय में उपवास का महीना माना जाता था। कई लोग एक महीने तक उपवास करते थे, इससे उन्हें शारीरिक कमजोरी भी होती थी। भादौ मास में श्राद्ध में खीर पूड़ी का भोजन उन्हें शक्ति दे सके इसलिए भी इस परंपरा की शुरुआत की गई।
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पिंड केवल चावल नहीं, कई तरह से बनाए जाते हैं- जौ, काले तिल से भी पिंड बनाए जाते हैं। चावल के पिंड को पायस अन्न मानते हैं। यही प्रथम भोग होता है। अगर चावल न हो, तो जौ के आटे के पिंड बना सकते हैं। ये भी न हो तो केले और काले तिल से पिंड बनाकर पितरों को अर्पित कर सकते हैं।
चावल को अक्षत कहते हैं। अर्थात जो खंडित न हो। चावल कभी खराब नहीं होते। उनके गुण कभी समाप्त नहीं होते। चावल ठंडी तासीर वाला भोजन है। पितरों को शांति मिले और लंबे समय तक वो इन पिंडों से संतुष्टि पा सकें, इसलिए पिंड चावल के आटे से बनाए जाते हैं।
श्राद्ध कर्म में अनामिका उंगली में कुशा पहनना
कुशा को पवित्री कहा जाता है। कुशा एक विशेष प्रकार की घास है। सिर्फ श्राद्ध कर्म में ही नहीं, अन्य सभी कर्मकांड में भी कुशा को अनामिका में धारण किया जाता है। इसे पहनने से हम पूजन कर्म के लिए पवित्र हो जाते हैं। कुशा में एक गुण होता है, जो दूर्वा में भी होता है। ये दोनों ही अमरता वाली औषधि हैं, ये शीतलता प्रदान करती हैं।
आयुर्वेद में इन्हें एसिडिटी और अपच में उपयोगी माना गया है। चिकित्सा विज्ञान कहता है- अनामिका उंगली का सीधा संबंध हृदय से होता है। अनामिका अर्तजत रिंग फिंगर में कुशा बांधने से हम पितरों के लिए श्राद्ध करते समय शांत और सहज रह सकते हैं, क्योंकि ये हमारे शरीर से लगकर हमें शीतलता प्रदान करती है।
श्राद्ध के लिए दोपहर का समय ही श्रेष्ठ
पितृ पक्ष में दोपहर में किया गया श्राद्ध मान्यतानुसार पितर देवता सूर्य के प्रकाश से ग्रहण करते हैं। दोपहर के समय सूर्य अपने पूरे प्रभाव में होता है। इस कारण पितर अपना भोग अच्छी तरह ग्रहण कर पाते हैं। सूर्य को ही इस सृष्टि में एक मात्र प्रत्यक्ष देवता माना गया है, जिसे हम देख और अनुभव कर पाते हैं। सूर्य को अग्नि का स्रोत भी माना गया है। देवताओं को भोजन देने के लिए यज्ञ किए जाते हैं। वैसे ही पितरों को भोजन देने के लिए सूर्य की किरणों को माध्यम माना गया है।
श्राद्ध सबसे बड़े या सबसे छोटा पुत्र द्वारा करना
ऐसा नहीं है, गया तीर्थ क्षेत्र में ऐसा विधान नहीं है। कोई भी पुत्र पिंडदान, श्राद्ध आदि कर्म करवा सकता है। यहां प्रचलित परंपरा के अनुसार, अगर किसी पिता की सभी संतानें अलग-अलग रहती हैं, तो सभी को अलग-अलग पिंडदान आदि कर्म करवाना चाहिए।
मृत्यु के बाद गरुड़ पुराण पढ़ा जाता
गरुड़ पुराण 18 पुराणों में से एक है। इस ग्रंथ में जन्म-मृत्यु से जुड़े रहस्य बताए गए हैं। इसमें कर्मों के आधार पर उनके फलों की जानकारी है। हमें जीवन कैसे जीना चाहिए, क्या काम करें और किन कामों से बचें, ताकि मृत्यु के बाद आत्मा को स्वर्ग की प्राप्ति हो सके, ये सारी बातें गरुड़ पुराण में दी गई हैं।
पवित्र नदियों या कुंडों में स्नान करके तर्पण करें।
सोना, चांदी, तांबा और कांसे के बर्तनों में भोजन बनाएं और ब्राह्मणों को भोजन कराएं।
पलाश के पत्तल में भोजन करने की परंपरा भी शुभ मानी जाती है।
श्राद्ध कर्म के समय सफेद और सुगंधित फूलों का उपयोग करें।
ब्राह्मण, गौ और गरीबों को भोजन कराना और दान देना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है।
शरीर, मन, भूमि और द्रव्य को शुद्ध रखकर ही अनुष्ठान करें।
क्या न करें पितृ पक्ष में
लोहा और मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग श्राद्ध में वर्जित है।
श्राद्ध कर्म के दौरान क्रोध, जल्दबाजी और अपवित्रता से बचें।
लाल और काले रंग के फूलों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
इस काल में अनावश्यक खर्च, दिखावा और दिखावटी कर्मकांड से दूर रहें।
किसी का अपमान या झूठ बोलना इस अवधि में अशुभ माना जाता है।
देशभर के प्रमुख तीर्थस्थलों जैसे गया, वाराणसी, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक और प्रयागराज में इन 16 दिनों के दौरान लाखों श्रद्धालु जुटते हैं। प्रशासन इन जगहों पर श्रद्धालुओं की सुरक्षा, यातायात और स्वास्थ्य सेवाओं की विशेष व्यवस्था करता है। गंगा और अन्य नदियों के घाटों पर पुलिस, गोताखोर और स्वयंसेवक तैनात रहते हैं ताकि कोई दुर्घटना न हो।
पितृ पक्ष केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि परिवार और समाज को जोड़ने का माध्यम भी है। यह हमें हमारे पूर्वजों की याद दिलाता है और उनकी दी हुई शिक्षाओं और संस्कारों को आगे बढ़ाने की प्रेरणा देता है। इस साल पितृ पक्ष की शुरुआत चंद्र ग्रहण के संयोग में हो रही है, जो इसे और भी विशेष बना देती है। श्रद्धा और नियमों का पालन करते हुए किया गया श्राद्ध निश्चित ही पितरों को तृप्त करता है और घर-परिवार में समृद्धि लाता है।
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